CJI की मौजूदगी में बोले रविशंकर प्रसाद, कार्यपालिका के क्षेत्र में आता है शासन

  •  प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क
  •  नवंबर 27, 2018   08:57
CJI की मौजूदगी में बोले रविशंकर प्रसाद, कार्यपालिका के क्षेत्र में आता है शासन

प्रधान न्यायाधीश की मौजूदगी में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सोमवार को कहा कि न्यायपालिका को यह तय करना है कि शासन से जुड़े मुद्दों के अधिकार अपने हाथ में लेने के लिए वह कितनी दूर तक जा सकती है।

नयी दिल्ली। प्रधान न्यायाधीश की मौजूदगी में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सोमवार को कहा कि न्यायपालिका को यह तय करना है कि शासन से जुड़े मुद्दों के अधिकार अपने हाथ में लेने के लिए वह कितनी दूर तक जा सकती है। इसके साथ ही उन्होंने जोर दिया कि संविधान के सभी अंगों को लक्ष्मण रेखा के अंदर रहने की आवश्यकता है। प्रसाद उच्चतम न्यायालय द्वारा आयोजित संविधान दिवस समारोह को संबोधित कर रहे थे। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायालय के अन्य न्यायाधीश भी समारोह में मौजूद थे।

प्रसाद ने कहा, ‘शासन एक बेहद जटिल कवायद है, हो सकता है कि अपने अंदर ही यह विचार करने की आवश्यकता है कि न्यायपालिका को कितनी दूर तक जाने की जरूरत है,। यह फैसला न्यायपालिका को करना है।’ उन्होंने कहा कि बहुत से प्रतिस्पर्धी हित हैं, बहुत से जटिल दावे, कई अन्य निहित हित" हैं जिन्हें सरकार चलाने के दौरान समझने की जरूरत है।

उन्होंने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार ने उच्चतम न्यायालय के फैसले को स्वीकार कर लिया है लेकिन इसे रद्द करने के लिए बताए गए कुछ कारणों पर उसे आपत्ति है। उल्लेखनीय है कि न्यायालय ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून को रद्द कर दिया था। प्रसाद ने जनहित याचिकाओं का भी जिक्र किया और कहा कि मूल विचार हाशिए पर के और वंचित लोगों को सुनने की अनुमति देना था।

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प्रसाद ने अधीनस्थ न्यायपालिका में और प्रतिभाशाली लोगों को शामिल करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रवेश परीक्षा की वकालत की। उन्होंने कहा कि अखिल भारतीय परीक्षा से प्रतिभाशाली युवा वकीलों को अधीनस्थ न्यायपालिका का हिस्सा बनने का मौका मिलेगा। प्रसाद ने आपातकाल के दौर को भी याद किया और न्यायमूर्ति एच आर खन्ना को श्रद्धांजलि दी। उस वक्त न्यायमूर्ति खन्ना ने पांच सदस्यीय संविधान पीठ के बहुमत वाले फैसले से अलग राय व्यक्त की थी। पीठ ने फैसला दिया था कि जीवन जीने और स्वतंत्रता के अधिकार को भी निलंबित किया जा सकता है।





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