मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार आदिवासियों की हितैषी सिर्फ विज्ञापनों तक

By दिनेश शुक्ल | Publish Date: Aug 9 2019 6:42PM
मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार आदिवासियों की हितैषी सिर्फ विज्ञापनों तक
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बताया जा रहा है कि जिस जगह कुटीरें स्वीकृत की गई है। वह भूमि अब वन विभाग अपनी बताने लगा है, वन विभाग की आपत्ति के बाद ही आदिवासियों को मिलने वाले प्रधानमंत्री आवास योजना की राशि रोकी गई है। जबकि यहां निवास करने वाले आदिवासियों का कहना है कि उनका परिवार यहां वर्षों से निवास कर रहा है और उनके बुजुर्ग भी यही रहते थे।

विश्व आदिवासी दिवस पर मध्यप्रदेश के सभी प्रमुख समाचार पत्र कांग्रेस शासित कमलनाथ सरकार के विज्ञापनों से पटे पड़े हैं  इन विज्ञापनों में कमलनाथ सरकार ने विश्व आदिवासी दिवस पर आदिवासी समुदाय को शुभकामनाएं और बधाइयां दी है। लेकिन दूसरी तरफ यही आदिवासी समुदाय अपनी वाजिव जरूरतों के लिए सरकार से हाथ फैला कर गुहार लगाता नजर आ रहा है। सरकार दावे कर रही है सरकारी योजनाओं से उनका उत्थान हुआ है किंतु ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही बया कर रही है जो सरकार आज आदिवासी दिवस मनाने का दिखवा कर रही उनकी उसी सरकार की मशीनरी आदिवासियों को बेघर करने पर तुली हुई है।

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मामला मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के अंतर्गत आने वाले आदिवासी बाहुल्य विनेगा गाँव का है। जहां आदिवासी समुदाय बिना छत के घरों में रहने को मजबूर हैं। शासन द्वारा ग्राम पंचायत चंदनपुरा के गाँव विनेगा में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 28 कुटीरें आवंटित की गई थी। जिसकी एनओसी ग्राम पंचायत के सचिव, ग्राम रोजगार सहायक और पंचायत समन्वयक अधिकारी की कमेटी द्वारा दी गई थी। उसके बाद ही इन कुटीरों को बनने के लिए सरकार द्वारा राशि जारी की गई थी और उन कुटीरों का आधा निर्माण भी हो चुका था। लेकिन शेष बची राशि को अचानक से जनपद पंचायत द्वारा रोक दिया गया। जिससे इन आदिवासियों का की छत शासन तंत्र नेेे छीन ली आदिवासी समुदाय पिछले 3 साल से बिना छत का है। केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री योजना के तहत इन आदिवासियों को अपने घर का जो सपना दिखाया था वह अब टूट चुका है।
बताया जा रहा है कि जिस जगह कुटीरें स्वीकृत की गई है। वह भूमि अब वन विभाग अपनी बताने लगा है, वन विभाग की आपत्ति के बाद ही आदिवासियों को मिलने वाले प्रधानमंत्री आवास योजना की राशि रोकी गई है। जबकि यहां निवास करने वाले आदिवासियों का कहना है कि उनका परिवार यहां वर्षों से निवास कर रहा है और उनके बुजुर्ग भी यही रहते थे। यहां रहने वाली आदिवासी राजकुमारी गीता और साहब सिंह का कहना है कि वह दिल्ली और भोपाल दोनों जगह इसकी इसको लेकर चक्कर लगा चुके हैं लेकिन आज तक सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। अब वह थक हार कर बैठ गए हैं।
आदिवासियों बीच काम करने वाले सहरिया क्रांति के संयोजक संजय बैचेन बताते हैं कि शासन द्वारा इन आदिवासियों को बहुत समय पहले उक्त जमीन का पट्टा दे दिया गया था। उसी पट्टे पर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत यह कुटीर स्वीकृत हुई है। फिर यह जमीन वन विभाग की कैसे हो गई। संजय बेचैन आरोप लगाते हैं कि आदिवासियों के घरों के आस-पास कई धनाढ्य और प्रभावशाली लोग आ बसे हैं जिनका यहां पर अवैध कब्जा है और वह इन्हें यहां नहीं बसने देना चाहते, जिसको लेकर यह साजिश रची जा रही है। सहरिया क्रांति के संयोजक संजय बेचैन  बताते हैं कि वर्तमान में छत्तीसगढ़ की राज्यपाल अनुसुइया उईके भी पूरे इस मामले को लेकर इस आदिवासी बस्ती का दौरा कर चुकी हैं। उस समय वह  राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग में उपाध्यक्ष थी।
यही नहीं जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी एच.पी. वर्मा ने भी माना है कि यह आदिवासी काफी लंबे समय से यहाँ रह रहे है। इसलिये इनको आवास स्वीकृत किये गए थे। लेकिन वर्तमान में यह मामला एनजीटी और सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है और वह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद ही कुछ कह पायेंगे।
चूंकि मध्यप्रदेश आदिवासी बाहुल्य राज्य माना जाता है। यहां देश की कुल जनसंख्या का लगभग 20 प्रतिशत “आदिवासी” हैं। जनगणना 2011 की रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश में 43 आदिवासी समूह हैं। मध्य प्रदेश में अभी 19 ऐसे आदिवासी समूह हैं, जिनकी जनसंख्‍या 5000 से भी कम है। इसी तरह 17 आदिवासी समूह हैं, जिनकी जनसंख्‍या वर्ष 2001 से 2011 के बीच में कम हुई है। जनसंख्‍या में कमी के कई भौगोलिक, राजनीतिक और आर्थिक कारण हैं। इनके विस्तार से विश्लेषण की जरूरत है। वही पिछले दो दशकों में मध्य प्रदेश की मौजूदा विशेष जनजातियों (बैगा, सहरिया और भारिया) की जनसंख्‍या में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। यही कारण है कि सरकारें इनके रहने और इनके जीवन यापन की व्यवस्थाओं को लेकर विशेष योजनाएं संचालित करती है।
लेकिन इन्हीं आदिवासियों के साथ शिवपुरी जिले में हो रहे अन्याय को लेकर अगर मानवीय पक्ष की बात की जाए तो पहले प्रशासन द्वारा गरीब आदिवासियों के कच्चे घरों को तोड़ा गया फिर उनके अधूरे घर बनाकर उन्हें बीच में ही छोड़ देना उन आदिवासियों के साथ घिनौना मज़ाक लगता है। राज्य शासन और केंद्र सरकार में अपनी गुहार लगाने के बाद भी यह आदिवासी उन अधूरे घरों में छप्पर डालकर रहने को मजबूर हैं। बरसात के दिनों में तो यह  आदिवासी सांप बिच्छू के डर के साए में जीने को मजबूर हैं और इन जंतुओं से अपने परिवार की रक्षा वह कैसे करें इस सोच में नजर आते हैं। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि जिस सरकार ने उन्हें रहने के पट्टे दिए उस पर मकान बनाने के लिए आवास स्वीकृत किए वहीं सरकार वन भूमि होने का हवाला देकर उन्हें बेघर करने पर तुली हुई है।
 

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