‘पाइका विद्रोह’ को आजादी का प्रथम संग्राम का दर्जा देने पर इतिहासकारों ने उठाए प्रश्न

Kerala historians question move to give ‘Paika Bidroha’ first war of independence tag
केरल के कुछ इतिहासकारों ने ओडिशा के 1817 पाइका विद्रोह को आजादी का प्रथम संग्राम का दर्जा देने के केन्द्र के फैसले पर प्रश्न उठाया और कहा कि ‘‘इस विद्रोह से पहले भी दक्षिणी राज्य में विदेशी ताकतों के खिलाफ अनेक विद्रोह हो चुके हैं लेकिन उन्हें कभी उचित मान्यता नहीं मिली।

तिरुवनंतपुरम। केरल के कुछ इतिहासकारों ने ओडिशा के 1817 पाइका विद्रोह को आजादी का प्रथम संग्राम का दर्जा देने के केन्द्र के फैसले पर प्रश्न उठाया और कहा कि ‘‘इस विद्रोह से पहले भी दक्षिणी राज्य में विदेशी ताकतों के खिलाफ अनेक विद्रोह हो चुके हैं लेकिन उन्हें कभी उचित मान्यता नहीं मिली। अभी तक 1857 के ‘सिपाही विद्रोह’ को ही आजादी का प्रथम संग्राम माना जाता है लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि ‘सिपाही विद्रोह’ से पहले भी इस तटीय राज्य में विदेशी ताकतों के खिलाफ अनेक छोटे-बड़े विद्रोह हो चुके हैं। कुछ इतिहासकारों का मनना है कि ‘अत्तिंगल विद्रोह’ को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का दर्जा दिया जाना चाहिए।

यह विद्रोह1721 में तत्कालीन वेनादी रियासत में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ हुआ था और इसमें इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी के कम से कम 133 सैनिक मारे गए थे। राज्य के इतिहासकारों का मानना है कि यह देश में विदेशी ताकतों के खिलाफ पहला सुनियोजित विद्रोह था। उन्होंने कहा कि मालाबार के शासक वर्मा पझासी राजा का अंग्रेजों के साथ 1795-1805 का संघर्ष, 1804 में त्रावणकोर में नायर ब्रिगेड का विद्रोह और त्रावणकोर के दीवान विलूथाम्बी दलावा की अगुवाई में 1809 में हुआ विद्रोह कुछ ऐसे मामले हैं जो राज्य में काफी पहले हुए थे।

राज्य की संस्था ‘हिस्ट्री प्रोटेक्शन काउंसिल’ राज्य सरकार को एक ज्ञापन सौंपने की तैयारी में हैं जिसमें ‘पाइका विद्रोह’ को देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम का दर्जा देने की बजाय ‘अत्तिंगल विद्रोह’ को यह दर्जा देने की घोषणा करने के लिए केन्द्र पर दबाव बनाने की मांग की जाएगी। जाने माने इतिहासकार एंव इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टॉरिकल रिसर्च के पूर्व अध्यक्ष एमजीएस नारायणन ने बातचीत में कहा कि ओडिशा के ‘पाइका विद्रोह’ को पहले संग्राम का दर्जा देने के पहले तथ्यों की अच्छी तरह जांच की जानी चाहिए। वहीं इतिहासकार के एन गणेश ने ऐतिहासिक आंदोलनों और संघर्षों की प्रमुखता और मूल्य के बारे में निर्णय लेने के सरकार के अधिकार पर ही प्रश्न खड़ा कर दिया।

उन्होंने कहा, ‘‘मैं पाइका विद्रोह के महत्व पर प्रश्न नहीं उठा रहा हूं.....लेकिन कैसे कोई सरकार हतिहास के विद्रोह, संघर्ष और आंदोलन के गुण और महत्व के बारे में निर्णय ले सकती है।’’ उन्होंने कहा कि इस पर निर्णय शिक्षाविदों को और इतिहास शोघ परिषद जैसी संस्थाओं को लेना चाहिए। संबंधित इतिहासकारों और शिक्षाविदों से परामर्श लिए बिना कोई मंत्री यूं ही नहीं कह सकता कि पाइका विद्रोह देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम था।

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