सदन में उच्छृंखल आचरण के लिए कोई जगह नहीं : उच्चतम न्यायालय

Supreme Court
पीठ ने कहा कि चर्चा के दौरान आक्रामक होना, कानून का शासन से संचालित होने वाले देश में कोई स्थान नहीं है और यहां तक कि एक जटिल मुद्दे का सौहार्द्रपूर्ण माहौल में एक दूसरे के प्रति सम्मान और मतभेद प्रदर्शित करते हुए समाधान करने की जरूरत है।

नयी दिल्ली|  (भाषा)उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि संसद और राज्य विधानसभा को ‘पवित्र स्थान’ माना जाता है तथा सदन में उच्छृंखल आचरण के लिए कोई जगह नहीं है, जहां सदस्यों से शिष्ट व्यवहार प्रदर्शित करने की उम्मीद की जाती है।

न्यायालय ने कहा कि सदन में होने वाली गतिवधियां समकालिक सामाजिक तानाबाना को प्रदर्शित करती हैं और यह सुनना आम हो गया है कि सदन अपना निर्धारित कामकाज पूरा नहीं कर सका तथा उसका ज्यादातर वक्त रचनात्मक एवं ज्ञानवर्द्धक चर्चा के बजाय हंगामे या व्यक्तिगत आक्षेपों की भेंट चढ़ गया।

न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर, न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति सी.टी. रविकुमार की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा, ‘‘आम आदमी के बीच यह धारणा मजबूत होती जा रही है। यह अवलोकन करने वालों को बेहद निराश करने वाला है।’’ शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र से भारतीय जनता पार्टी के 12 विधायकों की याचिकाओं पर 90 पृष्ठों के अपने फैसले में यह टिप्पणियां कीं।

इन विधायकों ने राज्य विधानसभा के पीठासीन अधिकारी से कथित दुर्व्यव्यवहार करने को लेकर सदन से एक साल के लिए निलंबित किये जाने के फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी। न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को जुलाई 2021 में हुए मॉनसून सत्र की शेष अवधि से आगे निलंबित करने का निर्देश देने वाला प्रस्ताव कानून की नजरों में असंवैधानिक, अमान्य, अवैध और अतार्किक है।

पीठ ने कहा, ‘‘ हमें इन रिट याचिकाओं को स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है और जुलाई 2021 में हुए संबंधित मानसून सत्र की शेष अवधि से आगे के लिए इन सदस्यों को निलंबित करने वाला प्रस्ताव कानून की नजर में असंवैधानिक, काफी हद तक अवैध और तर्कहीन है।’’

न्यायालय ने हालांकि अपने फैसले में कहा, ‘‘सदन के सुचारू कामकाज को सुनिश्चित करने के लिए इस तरह के आचरण से सख्ती से निपटा जाना चाहिए।

लेकिन कार्रवाई अवश्य ही संवैधानिक, विधिक, तर्कसंगत और कानून की स्थापित प्रक्रिया के अनुरूप होनी चाहिए।’’ न्यायालय ने कहा कि अवलोकन करने वालों को ऐसा लगता है कि यह उचित समय है कि सभी संबद्ध एवं निर्वाचित प्रतिनिधि सदन की गरिमा बहाल करने के लिए पर्याप्त कदम उठाएं। साथ ही, वे उच्चतम स्तर के बौद्धिक मानदंड वाली चर्चा के लिए सुधारात्मक कदम उठाएं। पीठ ने कहा कि प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के जरिए लोगों के बीच सांसद, विधायक या विधान पार्षद ज्यादातर समय शत्रुतापूर्ण माहौल में नजर आते हैं।

न्यायालय ने कहा, ‘‘संसद/राज्य विधानसभा सभा अधिक से अधिक दुराग्राही स्थान बनते जा रहे हैं। एक दूसरे से असहमत होने के लिए सहमत होने का दार्शनिक सिद्धांत चर्चा के दौरान नहीं के बराबर देखने को मिल रहा है।’’ पीठ ने कहा यह जिक्र करना अनावश्यक है कि संसद और राज्य विधानसभा को पवित्र स्थान माना जाता है, ठीके वैसे ही, जैसे कि अदालत को न्याय का मंदिर माना जाता है।

पीठ ने कहा कि आम आदमी को जिस प्रथम स्थान पर न्याय मिलता है वह संसद या राज्य विधानमंडल है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा संचालित होते हैं। न्यायालय ने कहा, ‘‘समाज के व्यवहार की पद्धति चर्चा के दौरान सदन के सदस्यों की विचार प्रक्रियाओं और गतिविधियों में प्रदर्शित होती है। ’’

पीठ ने कहा कि चर्चा के दौरान आक्रामक होना, कानून का शासन से संचालित होने वाले देश में कोई स्थान नहीं है और यहां तक कि एक जटिल मुद्दे का सौहार्द्रपूर्ण माहौल में एक दूसरे के प्रति सम्मान और मतभेद प्रदर्शित करते हुए समाधान करने की जरूरत है।

पीठ ने कहा, ‘‘सदस्यों को सदन के समय का अधिकतम सदुपयोग करना चाहिए जो कि बहुत मूल्यवान है और वक्त की दरकार है, खासतौर पर तब, जब हम भारत के लोग धरती पर सबसे पुरानी सभ्यता होने औरविश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र (जनसांख्यिकीय रूप से) होने का श्रेय ले रहे हैं। ’’

पीठ ने कहा कि सदन में सदस्य का लक्ष्य राष्ट्र के लोगों का कल्याण और खुशहाली सुनिश्चित करना होना चाहिए।

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