अस्का लोकसभा सीट पर द्विपक्षीय मुकाबला, बीजद-भाजपा आमने-सामने

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Publish Date: Apr 15 2019 1:50PM
अस्का लोकसभा सीट पर द्विपक्षीय मुकाबला, बीजद-भाजपा आमने-सामने
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बीजद ने स्वयं सहायता समूह की 68 वर्षीय सदस्य प्रमिला बिसोई को इस सीट पर उम्मीदवार बनाया है जबकि भाजपा ने ओडिशा के पूर्व मंत्री एवं दिग्गज नेता राम कृष्ण पटनायक की बेटी अनिता सुभादर्शिनी को उतारा है।

अस्का। सत्तारूढ़ बीजू जनता दल (बीजद) का गढ़ माने जाने वाली दक्षिणी ओडिशा की अस्का लोकसभा सीट पर नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली पार्टी और भाजपा के बीच इस बार दिलचस्प मुकाबला देखने को मिल सकता है। बीजद ने स्वयं सहायता समूह की 68 वर्षीय सदस्य प्रमिला बिसोई को इस सीट पर उम्मीदवार बनाया है जबकि भाजपा ने ओडिशा के पूर्व मंत्री एवं दिग्गज नेता राम कृष्ण पटनायक की बेटी अनिता सुभादर्शिनी को उतारा है। कांग्रेस भाकपा के रामकृष्ण पांडा का समर्थन कर रही है। भाकपा पहले इस सीट से एक बार जीत चुकी है।

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अस्का लोकसभा सीट से भावनात्मक जुड़ाव रखने वाले मुख्यमंत्री और बीजद अध्यक्ष नवीन पटनायक ने कहा कि अस्का में इतिहास बनेगा और यह स्वयं सहायता समूह की एक महिला को संसद और चार महिलाओं को विधानसभा में भेजकर पूरे देश को एक रास्ता दिखाएगा। अस्का लोकसभा सीट काफी प्रतिष्ठित मानी जाती है, क्योंकि नवीन पटनायक और उनके पिता दिवंगत बीजू पटनायक इस सीट से सांसद रह चुके हैं। मुख्यमंत्री की महिला सशक्तिकरण मुहिम का चेहरा माने जाने वाली प्रमिला ने अपनी जीत का भरोसा जताया है। सत्तारूढ़ पार्टी को 2014 के चुनाव में 60 फीसदी वोट मिले थे। 

नवीन पटनायक को अपना ‘‘तुरुप का इक्का’’ बताते हुए प्रमिला ने कहा कि बीजद के विकास कार्य मुख्य चुनावी मुद्दा है। पहला चुनाव लड़ रही भाजपा प्रत्याशी अनिता सुभादर्शिनी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि और अपने पिता-माता के प्रभाव को भुनाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि हालांकि मैं पहली बार चुनाव लड़ रही हूं लेकिन मैंने कई बार अपने पिता और मां के चुनावों की कमान संभाली है।



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दूसरी ओर कांग्रेस के समर्थन के साथ भाकपा उम्मीदवार इस सीट को फिर से हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। भाकपा के दुती कृष्ण पांडा 1971 में इस सीट से निर्वाचित हुए थे। भाकपा प्रत्याशी रामाकृष्ण पांडा ने कहा कि इलाके के लोग बीजद और भाजपा दोनों को नकार देंगे क्योंकि ‘झूठे वादे’ करने के कारण उनसे मोहभंग हो गया है। यह सीट पिछले दो दशकों से बीजद का गढ़ रही है। कांग्रेस ने इस सीट से आखिरी बार 1991 में जीत का स्वाद चखा था। 

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