हारकर जीतने वाले को बाजीगर नहीं स्मृति कहते हैं

By अनुराग गुप्ता | Publish Date: May 24 2019 4:23PM
हारकर जीतने वाले को बाजीगर नहीं स्मृति कहते हैं
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साल 2003 में भाजपा के कद्दावर नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बेहद करीबियों में से एक प्रमोद महाजन के कहने पर स्मृति भाजपा में शामिल हुईं और 2004 में कांग्रेस के दिग्गज नेता कपिल सिब्बल के खिलाफ चांदनी चौक से मुकाबला करने मैदान में उतर गईं।

साल 2003 में टीवी के पर्दे से शुरुआत करने वाली स्मृति ईरानी की स्मृति में आज भी वो यादें हैं जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की थी। 'क्योंकि सांस भी कभी बहू थी ' टीवी धारावाहिक में तुलसी का किरदार निभाने वाली स्मृति के मन में अमेठी का सपना उस समय जगा जब नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रधानमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाया गया। साल 2003 में भाजपा के कद्दावर नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बेहद करीबियों में से एक प्रमोद महाजन के कहने पर स्मृति भाजपा में शामिल हुईं और 2004 में कांग्रेस के दिग्गज नेता कपिल सिब्बल के खिलाफ चांदनी चौक से मुकाबला करने मैदान में उतर गईं। यह वो दौर था जब अंधेरे छटेगा, सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा का शोर चारों ओर सुनाई दे रहा था।

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लोकसभा चुनावों में मात खाने के बाद भी स्मृति ने लोगों के प्रति अपनी विनम्रता को कभी कम नहीं होने दिया और साल 2014 में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के हाथों एक लाख से अधिक मतों से हार के बावजूद उनका स्नेह कभी भी अमेठी के प्रति कम नहीं हुआ।  हालांकि उस वर्ष स्मृति ईरानी की डिग्री को लेकर काफी विवाद हुआ था। जिसके बाद उन्होंने साल 1994 में दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त करने का दावा भी किया। स्मृति ईरानी को अमेठी से मिली हार के बावजूद भाजपा ने गुजरात से राज्यसभा भेजकर नरेंद्र मोदी सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री बनाया और बाद में वह सूचना प्रसारण और फिर कपड़ा मंत्री रहीं। ईरानी को उनकी शैक्षणिक योग्यता को लेकर या बतौर मंत्री कार्यकाल में कई विवादों का सामना करना पड़ा था। 

एक नजर 2019 के आम चुनाव पर



गांधी परिवार के गढ़ में घुसकर स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को 55,120 मतों के अंतर से हराया। जीत मिलने के तुरंत बाद ही उन्होंने दुष्यंत कुमार की पंक्तियों को ट्वीट करते हुए लिखा कि कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता... अगर हम दुष्यंत कुमार की इन पंक्तियों को पूरा करें तो आएगा कि कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों। स्मृति ने राहुल को हराकर गांधी परिवार की प्रतिष्ठा पर सुराख तो कर ही दिया है। अगर हम आंकड़ों पर गौर करें तो कांग्रेस ने अमेठी में 17 बार लोकसभा चुनाव और 2 उपचुनाव लड़ा और इन चुनावों में उन्हें 16 बार जीत मिली। 

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इस चुनाव में सबसे ज्यादा किसी के साथ अगर स्मृति ईरानी का वाकयुद्ध हुआ है तो वह प्रियंका गांधी वाड्रा हैं। इस दौरान आरोप-प्रत्यारोप की काफी राजनीति भी हुई। प्रियंका ने उन पर तो राहुल का अपमान करने के लिए जूते बंटवाने का आरोप भी लगाया और कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष की लोकसभा सीट के मतदाता भिखारी नहीं हैं। लेकिन जिस तरीके से नतीजे सामने आए हैं वो यह दर्शा रहे हैं कि वो राहुल गांधी से खुश नहीं थे। ऊपर से राहुल ने अपने लोगों को वक्त भी नहीं दिया। सबसे दिलचस्प आंकड़ा तो यह है कि राहुल गांधी के सांसद रहते हुए यहां पर राजीव गांधी द्वारा शुरू कराई गई परियोजनाएं और कार्यक्रम बंद होने लगे और धीरे-धीरे हजारों लोगों के रोजगार पर इसका असर पड़ा। जिसकी वजह से यहां से लोगों ने पलायन भी किया। हालांकि राहुल गांधी उसी वक्त हार गए थे जब अमेठी के अंतगर्त आने वाली 5 विधानसभा सीटों में से 4 पर भाजपा ने कब्जा कर लिया था।

अब स्मृति के सामने गांधी परिवार के गढ़ को भाजपा का गढ़ बनाने की चुनौती होगी और ऐसा तभी मुमकिन है जब स्मृति यहां के लोगों को मुख्यधारा में लाकर पलायन जैसी समस्याओं को खत्म कर दें। हालांकि स्मृति को ऐसा करने में परेशानी नहीं होगी क्योंकि उन्होंने साल 2014 से लेकर 2019 तक अमेठी में बहुत वक्त गुजारा है और वहां के लोगों से जुड़ गई हैं। रोजगार पैदा करने के साथ-साथ बिजली-पानी की समस्या और सड़क जैसी समस्याओं का निपटारा करना पड़ेगा। आजाद भारत आज भी लोग रोटी, कपड़ा और मकान के लिए जूझ रहे हैं।



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