• 1897 में लड़ा गया था सारागढ़ी का युद्ध, इस वजह से शुरू हुआ था विद्रोह

सैन्य इतिहास के सबसे बड़े अंत वाले युद्धों में माना जाने वाला सारागढ़ी का युद्ध 12 सितंबर 1897 को ब्रिटिश भारतीय सेना और अफगान के मध्य वर्तमान के खैबर परवतुन्खवा( पाकिस्तान )में लड़ा गया था।

सैन्य इतिहास  के सबसे बड़े अंत वाले युद्धों में माना जाने वाला सारागढ़ी का युद्ध 12 सितंबर 1897 को ब्रिटिश भारतीय सेना और अफगान के मध्य वर्तमान के खैबर परवतुन्खवा( पाकिस्तान )में लड़ा गया था।

1897 में  गुल  बादशाह के नेतृत्व में अफगान आक्रांता द्वारा भारत को लूटने के प्रयास में यह विद्रोह शुरू हुआ था । हालांकि 27 अगस्त से 11 सितंबर के मध्य अफगानी पश्तून  ओं  द्वारा किलो पर कब्जा करने के कई जोरदार प्रयासों को ब्रिटिश सेना की 36 वें सिख रेजीमेंट ने विफल कर दिया था।

 

1897 में अफगान ,भारत में अंग्रेजों और भारतीयों के मध्य मतभेद और अंग्रेजो के खिलाफ बड़े विद्रोह और आकस्मिक गतिविधियों का फायदा उठा कर ,भारता को लूटना चाहता था।। जिसके चलते 3 तथा 9 सितंबर को अफरीदी आदिवासियों ने अफगान  के साथ मिलकर अंग्रेजी सेना पर गुलिस्तान फोर्ट पर हमला किया और किए गए इन दोनों हमलों को अंग्रेजी सेना द्वारा नाकाम कर दिया गया था।

 

इस बीच कई ब्रिटिश भारतीय सेना की ओर से लड़ रहे सिख सैनिकों ने 10,000 अफगान आक्रमणकारियों के खिलाफ लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी। तब से 12 सितंबर को हर साल उन वीर सपूतों की याद में सारागढ़ी दिवस मनाया जाता है।

अभी हाल ही में पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सारागढ़ी की लड़ाई में शहीद हुए वीर जवानों को याद करते हुए फिरोजपुर में सारागढ़ी गुरुद्वारा क्षेत्र का दौरा किया। और सारागढ़ी की पौराणिक लड़ाई की 124 वीं वर्षगांठ पर इस लड़ाई में अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।।

उन्होंने ट्विटर पर सिख सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हुए कुछ तस्वीरें साझा की और लिखा कि 36 सिखों (अब 4 सिख)को आदर पूर्वक श्रद्धांजलि। जिन्होंने 10000  से अधिक आफगानों के हमले का सामना करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए ।और आत्मसमर्पण की बजाय अपनी मौत को चुनाव ।1897में इस दिन लड़ी गई है लड़ाई हमेशा वीरता के प्रतीक के रूप में सैन्य इतिहास के पन्नों पर दर्ज रहेगी।