CBI प्रमुख के खिलाफ सीवीसी की जांच रिपोर्ट में कुछ ‘बहुत प्रतिकूल’ निष्कर्ष भी हैं

  •  प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क
  •  नवंबर 16, 2018   18:40
CBI प्रमुख के खिलाफ सीवीसी की जांच रिपोर्ट में कुछ ‘बहुत प्रतिकूल’ निष्कर्ष भी हैं

उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि सीबीआई के निदेशक आलोक कुमार वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने वाले केन्द्रीय सतर्कता आयोग की रिपोर्ट में कुछ ‘बहुत प्रतिकूल’ नतीजे भी हैं

नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि सीबीआई के निदेशक आलोक कुमार वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने वाले केन्द्रीय सतर्कता आयोग की रिपोर्ट में कुछ ‘बहुत प्रतिकूल’ नतीजे भी हैं और वह इन कुछ आरोपों की जांच के लिये अधिक समय चाहता है। साथ ही आयोग की रिपोर्ट में कुछ बहुत सराहनीय नतीजे भी हैं। केन्द्रीय सतर्कता आयोग के निष्कर्षो को कुल मिलाकर मिलाजुला बताते हुये न्यायालय ने इसे विस्तृत गोपनीय रिपोर्ट बताया और कहा कि इसकी एक प्रति संलग्नकों के साथ सीलबंद लिफाफे में आलोक वर्मा को दी जाये। न्यायालय ने कहा कि इस पर जवाब दाखिल करने के लिये इसे वही खोलेंगे और 19 नवंबर को अपराह्न एक बजे तक फिर से सीलबंद कर देंगे। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति के एम जोसफ की पीठ ने केन्द्रीय सतर्कता आयोग की विस्तृत प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के नतीजों में कुछ ‘अनुकूल’, कुछ ‘बहुत अनुकूल नहीं’ और कुछ ‘बहुत ही प्रतिकूल’ हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘सीवीसी ने विस्तृत रिपोर्ट पेश की है। रिपोर्ट को वर्गीकृत किया गया है और कुछ आरोपों के बारे में यह काफी अनुकूल है, कुछ आरोपों के बारे में उतनी अनुकूल नहीं है और कुछ आरोपों के बारे में बहुत ही प्रतिकूल है। सतर्कता आयोग की रिपोर्ट कहती है कि कुछ आरोपों की जांच की आवश्यकता है और इसके लिये उन्हें वक्त चाहिए।’’ इसके साथ ही न्यायालय ने इस मामले को 20 नवंबर के लिये सूचीबद्ध कर दिया।

शीर्ष अदालत आलोक वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से उन्हें उनके अधिकारों से वंचित करके अवकाश पर भेजने के सरकार के निर्णय को चुनौती देने वाली सीबीआई प्रमुख की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। आलोक वर्मा पर जांच ब्यूरो के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना ने आरोप लगाये थे ,जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों में प्राथमिकी दर्ज की गयी है। सरकार ने वर्मा के साथ अस्थाना को भी सभी अधिकारों से वंचित करते हुये अवकाश पर भेज दिया था।

शीर्ष अदालत के आदेश पर उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश ए के पटनायक की निगरानी में केन्द्रीय सतर्कता आयोग ने वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच की और अपनी रिपोर्ट 12 नवंबर को न्यायालय को सौंप दी। इस मामले में सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट किया कि केन्द्रीय जांच ब्यूरो संस्था की शुचिता बनाये रखने और इसे बचाये रखने तथा इसके प्रति जनता के भरोसे की रक्षा के लिये केन्द्रीय सतर्कता आयोग की रिपोर्ट की गोपनीयता जरूरी है।

पीठ ने केन्द्रीय सतर्कता आयोग की रिपोर्ट संलग्नकों के साथ सीलबंद लिफाफे में अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल और सीवीसी की ओर से पेश सालिसीटर जनरल तुषार मेहता के कार्यालय को भी सौंपने का निर्देश दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि केन्द्रीय सतर्कता आयोग की रिपोर्ट पर सिर्फ आलोक वर्मा को ही जवाब दाखिल करना होगा। पीठ ने कहा, ‘‘इस समय, हम केन्द्र सरकार या किसी अन्य पक्ष को केन्द्रीय सतर्कता आयोग की रिपोर्ट पर जवाब दाखिल करने के लिये कहने के इच्छुक नहीं हैं और सिर्फ याचिकाकर्ता आलोक कुमार वर्मा को ही न्यायालय जवाब दाखिल करने की अनुमति दे रहा है।

हालांकि, पीठ ने सीवीसी की रिपोर्ट राकेश अस्थाना को भी सौंपने के उनके वकील वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी के अनुरोध को ठुकरा दिया। रोहतगी ने कहा कि वर्मा के खिलाफ शिकायत करने के कारण अस्थाना आपराधिक मामले का सामना कर रहे हैं और उन्हें भी रिपोर्ट मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अस्थाना ने ही सीबीआई निदेशक के खिलाफ कैबिनेट सचिव से शिकायत की थी जिसे बाद में केन्द्रीय सतर्कता आयोग के पास भेजा गया था।

रोहतगी ने कहा, ‘‘यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला नहेीं है। यह रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में क्यों रखी जानी चाहिए?’’। इस पर पीठ ने शुरू में कैबिनेट सचिव के पास सीबीआई निदेशक की शिकायत करने की मंशा पर सवाल उठाया और पूछा, ‘‘कानून के किस अधिकार के तहत आपने कैबिनेट सचिव के पास शिकायत की थी?’’। रोहतगी ने जब कहा, ‘‘यह (शिकायत) मैं दायर कर सकता हूं तो पीठ ने टिप्पणी की, ‘‘कोई भी शिकायत कर सकता है।’’आलोक वर्मा के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता फली नरीमन ने कहा कि सीवीसी की रिपोर्ट पर वह 19 नवंबर को अपना जवाब दाखिल कर देंगे। उन्होंने कहा, ‘‘जितनी जल्दी इसे सुलझा लिया जाये, बेहतर है।’’इस पर पीठ ने कहा, ‘‘जैसे ही हमारे पास आपका (वर्मा) जवाब होगा, हम इस पर निर्णय लेंगे।’’

गैर सरकारी संगठन कॉमन काज की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने पीठ से कहा कि उन्होंने पहले दावा किया था कि कार्यवाहक निदेशक एम नागेश्वर राव ने शीर्ष अदालत के आदेश के बावजूद नीतिगत निर्णय लिये हैं और फैसलों की सूची भी दाखिल नहीं की है। इस संगठन ने जांच ब्यूरो के अधिकारियों के खिलाफ विशेष जांच दल से जांच कराने के लिये अलग से याचिका दायर की है।

पीठ ने कहा, ‘‘हम यह मानकर चलते हैं कि उन्होंने (राव) ने कोई बड़ा नीतिगत फैसला नहीं लिया है क्योंकि आपने उनके द्वारा लिये गये निर्णयों की सूची पेश नहीं की है।’’ पीठ ने कहा कि राव पहले ही 23 से 26 अक्टूबर के दौरान उनके द्वारा लिये गये फैसलों की सूची दाखिल कर चुके हैं। दवे ने कहा कि वह राव द्वारा लिये गये फैसलों की सूची दाखिल करेंगे। इस पर पीठ ने कहा कि राव द्वारा दी गयी सूची के स्थान पर सूची दायर करने का काम कोई भी कर सकता है । पीठ ने कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और जांच ब्यूरो के पुलिस उपाधीक्षक ए के बस्सी के आवेदनों पर भी विचार किया। बस्सी का तबादला पोर्ट ब्लेयर कर दिया गया है।

पीठ ने कहा कि इस मामले पर अगली तारीख पर विचार किया जायेगा। शीर्ष अदालत ने इस मामले में केन्द्र और सतर्कता आयोग को नोटिस जारी कर वर्मा की याचिका पर जवाब भी मांगा था। यही नहीं, न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि जांच ब्यूरो के कार्यवाहक निदेशक नागेश्वर राव कोई भी बड़ा या नीतिगत फैसला नहीं करेंगे और वह सिर्फ रोजमर्रा के काम ही देखेंगे। इस बीच, राकेश अस्थाना ने भी इस मामले में अलग से याचिका दायर कर आलोक वर्मा को जांच ब्यूरो के निदेशक पद से हटाने का अनुरोध किया है। इस विवाद में कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी चार नवंबर को एक आवेदन दायर कर दलील दी थी कि आलोक वर्मा को उनके अधिकारों से वंचित करना गैर कानूनी और मनमाना है।





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