मोहन भागवत के बयान पर नाहक ही हो रहा विवाद, असल में कही थी यह बड़ी बात

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बृहस्पतिवार को कहा कि सामाजिक समता और हिन्दू समाज समानार्थक है और उसे (हिन्दू समाज) संगठित करने के लिये समता अनिवार्य पहलू है।

सन्यास रोड हरिद्वार स्थित कृष्णा निवास एवं श्री पूर्णानंद आश्रम के तत्वाधान में आयोजित 6 दिवसीय वेदांत सम्मलेन के अंतिम दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत द्वारा जनसमूह को उदबोधित किया गया। भागवत ने कहा कि इतना मंतव्यनिष्ठ होकर समाज चले, आप उसको ऐसा चलाएंगे आप अपने उदाहरण से इसको ऐसा बनायेंगे, हम हमेशा आपके मंतव्यों को साकार करने के लिए उद्यमरत रहेंगे, समय लगेगा, एकदम सारी बाते नहीं होती जितना बताया गया है।  मेरे पास बिल्कुल सत्ता नहीं है, इसलिए मेरे पास कभी-कभी सत्ता आ जाती है। मेरे पास कुछ नहीं है, है जनता के पास। उनका अंकुश चलता है। वो तैयार होते हैं तो सबकी चाल बदल जाती है। उनको तैयार हम भी कर रहे हैं आप भी करिए। हम उदाहरणस्वरूप बनकर मिलकर ठीक ऐसे ही चलेंगे। ऐसे ही मिलकर चलेंगे, बिना हारे चलेंगे। बिना डरे चलेंगे। सफल होकर चलेंगे।

उन्होंने कहा “दुनिया शक्ति को मानती है। अपनी शक्ति है, होनी चाहिए। दिखनी चाहिए। जागरुक रहकर हम चलेंगे और चल ही रहे हैं।” साथ उन्होंने आवाहन किया “इसी गति से चले तभी गणना से काम होने वाला है। हम थोड़ी गति और बढ़ा देंगे तो आपने 20-25 साल कहा, मैं 10-15 ही कहता हूँ। उसमें जिस भारत का सपना देखकर हम चल रहे थे वो भारत स्वामी विवेकानंद ने जिसको अपने मनुचक्षों से देखा था। और जिसके उदय की  महर्षि योगी अरविंद ने भविष्यवाणी की थी वो हम इसी देह में, इन्हीं आंखों से अपने इस जीवन में देखेंगे। मेरी शुभकामना भी है, ये आप की इच्छा भी है और हम सबका संकल्प भी है।”

हिन्दू समाज को संगठित करने के लिये ‘समता’ अनिवार्य पहलू है: भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बृहस्पतिवार को कहा कि सामाजिक समता और हिन्दू समाज समानार्थक है और उसे (हिन्दू समाज) संगठित करने के लिये समता अनिवार्य पहलू है। उन्होंने कहा कि सत्य, अहिंसा, समता आदि की बात काफी लोग करते हैं, इसके बारे में भाषण देते हैं, लेकिन इसके आधार पर चलने एवं आचरण करने की जरूरत है। सांवली मूर्ति मंदिर में यहां अपने संबोधन में भागवत ने कहा, ‘‘ सत्य, अहिंसा, शांति और समता...ये धर्म के चार स्तम्भ हैं। संघ के स्वयंसेवकों का समर्थन हमेशा से ऐसे कार्यो के लिये रहा है।’’ उन्होंने कहा कि सत्य एवं करुणा का संबंध मन एवं वाणी की पवित्रता से जुड़ा होता है और इसके लिये तपस्या करनी पड़ती है। उन्होंने कहा कि खुद भी जिएं और दूसरों को भी जीने दें, यह अहिंसा है तथा शांति सभी को चाहिए और उससे समृद्धि आती है। आरएसएस प्रमुख ने कहा कि परिवार से राष्ट्र तक कोई छोटा या बड़ा न हो, इसका नाता समता से है। उन्होंने कहा, ‘‘आज 14 अप्रैल को हम जिनका (बी आर आंबेडकर का) जन्मदिवस मना रहे हैं, उनका संबंध भी समानता एवं समता से है और उन्होंने सामाजिक जीवन में विषमता समाप्त करने के लिये योगदान दिया।’’ उन्होंने कहा, ‘‘ सामाजिक समता और हिन्दू समाज समानार्थक है और इसे (हिन्दू समाज को) संगठित करने के लिये समता अनिवार्य पहलू है।’’ भागवत ने कहा कि भारत धर्मपरायण देश है, ऐसे में इन चार बातों को ध्यान में रखना चाहिए और इसके अनुरूप आचरण होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसका विरोध करना मनुष्यता के विरूद्ध है।

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