विश्वनाथ प्रताप सिंह: राजा मांडा से सत्ता के सिंहासन तक, बोफोर्स से मंडल कमीशन तक...

विश्वनाथ प्रताप सिंह: राजा मांडा से सत्ता के सिंहासन तक, बोफोर्स से मंडल कमीशन तक...

जनता पार्टी की ढहने के बाद निराश जनता को वीपी सिंह में एक उम्मीद दिखाई थी। 1989 का चुनाव ही एक आंदोलन की शक्ल लेने लगा। बात 1989 की है। देश में विश्वनाथ प्रताप सिंह का जादू सिर चढ़कर बोल रहा था।

चुनाव के नतीजों में उलटफेर कर देने वाली लहरे जिन्हें देश ने देखा, वोटर के मन को बदल देने वाली लहरे जिसे साल 2014 में पूरी जनता ने देखा। विपक्ष को सत्ता में लाकर बिठा देने वाली लहरे और सत्ता को विपक्ष में बिठाने वाली लहरे से भी मुखातिब हुआ देश। आज हम हिन्दुस्तान के सियासत को बदलकर रख देने वाली राजनीति के एक किरदार से रूबरू करवाएंगे। जिन्होंने मौसम बदला, माहौल बदला, चुनाव बदला और चुनाव के नतीजे भी बदले। आज बात करेंगे 1989 के उस लहर और उस लहर के रचयिता विश्वनाथ प्रताप सिंह की जिसने रिकार्ड वोटों की सीट के साथ सत्ता में आए राजीव गांधी को सत्ता से बेदखल कर दिया। एक आम चुनाव जिसमें बोफोर्स घोटाला एक बड़ा मुद्दा बना। बाद में मंडल कमीशन के एक फैसले ने देश में जातीय राजनीति के दरवाजे हमेशा के लिए खोल दिए। 

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साल 1989 में देश आम चुनाव के रंग में पूरी तरह रंगा हुआ था। ये वो दौर था जब बोफोर्स घोटाले के दाग से राजीव गांधी का दामन दागदार था और भ्रष्टाचार देश के सामने एक बड़ा मुद्दा बन चुका था। पहली बार देश के प्रधानमंत्री को किसी ने सीधे कटघरे में खड़ा किया था। आजादी के बाद पहली बार एक सत्ता पांच साल पूरे होने से पहले ही लड़खड़ा गई थी। जिसे दो तिहाई बहुमत हासिल था। मामला बोफोर्स तोप की खरीद में कमीशन खाने का था और आरोप लगाने वाला शख्स देश का रक्षा मंत्री वीपी सिंह था। 

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राजा बहादुर राम गोपाल सिंह के पुत्र वीपी सिंह का जन्म 25 जून 1931 को इलाहाबाद में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद एवं पूना विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की थी। विश्वनाथ प्रताप सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन जनता की सेवा कर चुके है। उनका मुख्यमंत्री कार्यकाल 9 जून 1980 से 28 जून 1982 तक ही रहा। 

राजा से सिंहासन तक

राजनीति के दौरान उनका टकराव राजीव गाँधी से हुआ। विश्वनाथ प्रताप सिंह उस समय वित्तमंत्री थे जब राजीव गांधी के साथ में उनका टकराव हुआ। मामला यह था कि विश्वनाथ प्रताप सिंह के पास यह सूचना थी कि कई भारतीयों द्वारा विदेशी बैंकों में अकूत धन जमा करवाया गया है। इस पर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अमेरिका की एक जासूस संस्था फ़ेयरफ़ैक्स की नियुक्ति कर दी ताकि ऐसे भारतीयों का पता लगाया जा सके। जब यह समाचार भारतीय मीडिया तक पहुँचा तो वह प्रतिदिन इसे सिरमौर बनाकर पेश करने लगा। इस 'ब्रेकिंग न्यूज' का उपयोग विपक्ष ने भी ख़ूब किया। उसने जनता तक यह संदेश पहुँचाया कि 60 करोड़ की दलाली में राजीव गांधी की सरकार जांच से भाग रही थी। 

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जनता पार्टी की ढहने के बाद निराश जनता को वीपी सिंह में एक उम्मीद दिखाई थी। 1989 का चुनाव ही एक आंदोलन की शक्ल लेने लगा। बात 1989 की है। देश में विश्वनाथ प्रताप सिंह का जादू सिर चढ़कर बोल रहा था। राजा मांडा के नाम से विख्यात वीपी सिंह नौजवानों की उम्मीद बने हुए थे। लोकसभा और उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव एक साथ हो रहे थे तो फतेहपुर में नारा उछला था, 'राजा नहीं फकीर है देश की तकदीर है'। इस नारे ने गंगा-यमुना के दोआब में बसे जिले में ऐसा जादू किया था कि जनता दल ने सभी 6 सीटें वोटों के भारी अंतर से जीत ली थीं। फतेहपुर से ही सांसद बने वीपी सिंह बीजेपी से सशर्त और लेफ्ट से बिना किसी शर्त के समर्थन से देश के प्रधानमंत्री बन गए। 

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मंडल कमीशन

7 अगस्त 1990, तत्तकालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का ऐलान संसद में किया तो देश जातीय समीकरण के उन्माद से झुलसने लगा। मंडल कमीशन की सिफारिश के मुताबिक पिछड़े वर्ग को सरकारी नौकरी में 27 फीसदी आरक्षण देने की बात कही गई। जो पहले से चले आ रहे अनुसूचित जाति-जनजाति को मिलने वाले 22.5 फीसदी आरक्षण से अलग था। समाज टुकड़ों में बंटने लगा और बंटते-बंटते लहू-लुहान होना भी शुरू हो गया। सवर्ण तबके के छात्रों ने  वीपी सिंह हाय हाय, मंडल कमीशन डाउन डाउन के नारे लगाने शुरू कर दिए। वीपी सिंह के इस फैसले ने देश की सियासत बदल दी। सवर्ण जातियों के युवा सड़क पर उतर आए। आरक्षण विरोधी आंदोलन के नेता बने राजीव गोस्वामी ने आत्मदाह कर लिया। कई हमेशा-हमेशा के लिए अपनी पहचान खोते चले गए। तो कई नए नेता उभरे जिनकी पहचान की बुनियाद जातिवादी वोटबैंक पर टिकी थी। कांग्रेस पार्टी ने वीपी सरकार के फैसले की पुरजोर मुखालफत की और राजीव गांधी मणिशंकर अय्यर द्वारा तैयार प्रस्ताव लेकर आए, जिसमें मंडल कमीशन की रिपोर्ट को पूरी तरह से खारिज किया गया। जिस वक्त यह फैसला आया तब वीपी सिंह की सरकार को बीजेपी बाहर से सशर्त समर्थन दे रही थी। वीपी प्रधानमंत्री तो बन गए लेकिन तब तक अयोध्या में राम मंदिर का सवाल सरकार के सिने में चुभने लगा था। वीपी सिंह जिस वक्त लाल किले पर पहुंचे तो मंडल के जवाब में कमंडल की राजनीति फूटने लगी थी। जिसके बाद बिफरी बीजेपी ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया और बोफोर्स घोटाले के नाम वाला पुर्जा वीपी सिंह की जेब में दबा ही रह गया।





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