किशोर न्याय बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण संशोधन विधेयक में क्या है नए प्रावधान? यहां पढ़े

किशोर न्याय बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण संशोधन विधेयक में क्या है नए प्रावधान? यहां पढ़े

महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने मंगलवार को विपक्ष के भारी हंगामे के बीच किशोर न्याय संशोधन विधेयक 2021 को पेश किया था। सवाल है कि विपक्षी द्वारा इस विधेयक पर इतना विवाद क्यों बढ़ रहा है और क्या है किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) संशोधन बिल?

किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2021 को संसद की मंजूरी मिलने के बाद से विवाद और बढ़ता जा रहा है। राज्यसभा में विभिन्न मुद्दों पर विपक्षी दलों के सदस्यों के हंगामे के बीच इस विधेयक को ध्वनिमत से मंजूरी दी गई। लोकसभा में यह विधेयक 24 मार्च को पारित हो चुका है। महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने मंगलवार को विपक्ष के भारी हंगामे के बीच किशोर न्याय संशोधन विधेयक 2021 को पेश किया था। सवाल है कि विपक्षी द्वारा इस विधेयक पर इतना विवाद क्यों बढ़ रहा है और क्या है किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) संशोधन बिल? 

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किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) संशोधन बिल बच्चों की देखभाल और संरक्षण की जरूरत वाले बच्चों से संबंधित प्रावधान हैं। यह विधेयक एक तरीके से बच्चों के सरंक्षण को मजबूत करने के लिए अधिक महत्वपूर्ण उपाय बताता है। इस कानून के मुताबिक, अगर कोई किशोरी अपराध करता है और वह आरोपी तय होता है तो किशोर न्याय बोर्ड द्वारा ऐसे अपराधी बच्चों की जांच पड़ताल होगी। गंभीर अपराध के लिए बच्चे को तीन से सात वर्ष तक की जेल की सजा दी जाती है और बिल में लिखा गया है कि गंभीर अपराधों में ऐसे अपराध शामिल किए जाएंगे जिनमें 7 साल से ज्यादा की सजा होगी अधिकतम होगी और न्यूनतम सजा सात साल से कम होगी।बता दें कि  2012 के दिल्ली गैंगरेप के बाद इस प्रावधान को बल मिला, जिसमें एक आरोपी की उम्र महज 18 साल थी, और इसलिए उस पर एक किशोर के रूप में मुकदमा चलाया गया।

राज्य सभा में विधेयक पेश करने वाली महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा कि यह बदलाव देश में गोद लेने की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए और जिला स्तर पर बच्चों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए किए जा रहे हैं। संशोधन के अनुसार, अतिरिक्त जिलाधिकारियों सहित जिला मजिस्ट्रेट अब जेजे अधिनियम की धारा 61 के तहत गोद लेने के आदेश जारी कर सकते हैं। बता दें कि इस वक्त गोद लेने की प्रक्रिया में काफी लंबा समय लगता है और गोद लेने के मामले को पारित होने में सालों लग जाते है।

2015 के अधिनियम के तहत, किशोरों द्वारा किए गए अपराधों को जघन्य अपराध, गंभीर अपराध और छोटे अपराधों के रूप में डिवाइड किया गया है। गंभीर अपराधों में तीन से सात साल की कैद के साथ अपराध शामिल हैं। अधिकांश जघन्य अपराधों में न्यूनतम या अधिकतम सात साल की सजा होती है। किशोर न्याय अधिनियम 2015 के अनुसार, जघन्य अपराध जिनकी आयु 16-18 वर्ष के बीच होगी, उन पर वयस्कों के रूप में मुकदमा चलाया जाएगा और उन्हें वयस्क न्याय प्रणाली के माध्यम से संसाधित किया जाएगा। विधेयक में कहा गया है कि गंभीर अपराधों में ऐसे अपराध भी शामिल होंगे जिनके लिए अधिकतम सजा सात साल से अधिक की कैद है, और न्यूनतम सजा निर्धारित नहीं है या सात साल से कम है। बता दें कि अधिकांश लोगों ने इस संशोधनों का स्वागत किया है, जरूरत की देखभाल में बच्चों को बेहतर सुरक्षा प्रदान करने के प्रयास में, माना जाता है कि डीएम को बहुत अधिक जिम्मेदारियां देने की चुनौती है।

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स्मृति ईरानी ने विधेयक पर बढ़ रहे विवाद को लेकर कहा कि, एक्ट लाने का केंद्र सरकार को पूरा अधिकार है। इस विधेयक के लिए राज्यों से बात की गई और केरल ने भी इसका समर्थन किया। उन्होंने कहा कि बाल कल्याण समितियों को ज्यादा ताकत दी जा रही है। इससे बच्चों का बेहतर ढंग से संरक्षण में मदद मिलेगी। उल्लेखनीय है कि इस विधेयक के माध्यम से किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 में संशोधन किया जा रहा है। इसके माध्यम से बच्चों के संरक्षण के ढांचे को जिलावार एवं प्रदेशवार मजबूत बनाने के उपाए किये गए हैं। इन प्रस्तावित संशोधनों में जे जे अधिनियम की धारा 61 के तहत गोद लेने के मुद्दे को जिला मजिस्ट्रेट, अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट को अधिकृत किया गया है ताकि ऐसे मामलों का तेजी से निपटारा किया जा सके और जवाबदेही तय की जा सके। इसके तहत जिला अधिकारियों को कानून के तहत निर्बाध अनुपालन सुनिश्चित करने और कठिनाई में पड़े बच्चों के लिये सुसंगत प्रयास करने के लिये अधिकार सम्पन्न किया गया है।





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