अधिकारियों की जबरन छुट्टी कर क्या दिखाना चाहती है मोदी सरकार?

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अंकित सिंह । Jun 19, 2019 2:56PM
वित्त मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक इन अधिकारियों के खिलाफ या तो पहले से ही सीबीआई की ओर से भ्रष्टाचार के मामले दर्ज थे या इन पर रिश्वतखोरी, जबरन वसूली और आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप हैं।

दोबारा सत्ता में आने के साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वित्त और अन्य मंत्रालयों के शीर्ष अधिकारियों के साथ लगातार बैठक कर रहे हैं। इसका मतलब साफ है कि वह सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने और रोजगार सृजन के मुद्दों पर गहन विचार विमर्श कर रहे हैं। लेकिन इन बैठकों से एक और बात जो सामने निकल कर आ रही है वह यह है कि भ्रष्ट अधिकारियों पर भी नकेल कसने की कवायद की शुरूआत हो गई है। इसी कड़ी में केंद्र सरकार ने केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर व कस्टम बोर्ड के 15 बड़े अधिकारियों को जबरन नियम 56 के तहत रिटायर कर दिया है। सबसे बड़ी बात यह है कि इन अधिकारियों में प्रधान आयुक्त स्तर का भी एक अधिकारी शामिल है। यह सारे अधिकारी सीमा शुल्क एवं केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग में अपनी सेवाएं दे रहे थे। 

वित्त मंत्रालय की माने तो यह कहा गया है कि सरकार ने बुनियादी नियमों के तहत नियम संख्या 56 (जे) का इस्तेमाल करते हुए केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) के प्रधान आयुक्त से सहायक आयुक्त पद तक के अधिकारियों को सेवामुक्त कर दिया है। मंत्रालय के आदेश के मुताबिक इनमें कुछ पहले से ही निलंबित चल रहे थे। वित्त मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक इन अधिकारियों के खिलाफ या तो पहले से ही सीबीआई की ओर से भ्रष्टाचार के मामले दर्ज थे या इन पर रिश्वतखोरी, जबरन वसूली और आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप हैं। जिन अधिकारियों पर यह गाज गिरी है उनमें दिल्ली स्थित सीबीआईसी में प्रधान अतिरिक्त महानिदेशक (ऑडिट) अनूप श्रीवास्तव, संयुक्त आयुक्त नलिन कुमार, कोलकाता में आयुक्त संसार चंद, चेन्नई में आयुक्त जी श्री हर्ष, आयुक्त रैंक के अधिकारियों अतुल दीक्षित एवं विनय बृज सिंह शामिल हैं। इसके अलावा दिल्ली जीएसटी जोन के उपायुक्त अमरेश जैन, अतिरिक्त आयुक्त रैंक के दो अधिकारियों अशोक महीदा एवं वीरेंद्र अग्रवाल, सहायक आयुक्त रैंक के अधिकारियों एस एस पबाना, एस एस बिष्ट, विनोद सांगा, राजू सेगर, मोहम्मद अल्ताफ और दिल्ली के लॉजिस्टिक निदेशालय के अशोक असवाल शामिल हैं।

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इससे पहले भी सरकार ने भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और दुर्व्यवहार के आरोप में 12 आयकर अधिकारियों को नौकरी से निकाल दिया था। पर अब यह सवाल उठ रहा है कि आखिर सरकार ऐसा क्यों कर रही है? लोग यह कह रहे है कि यह आमतौर पर तब ज्यादा देखने को मिलता है जब किसी और की सरकार जाती है और दूसरे की आती है पर मोदी सरकार दोबारा आई है तब ऐसा क्यों हो रहा है? जवाब के तौर पर हम यह कह सकते हैं कि अपने पहले कार्यकाल के दौरान पीएम मोदी ने भ्रष्टाचार को लेकर अपने रुख को कुछ इस तरह जाहिर कर संकेत दे दिया था कि केंद्र में काबिज मोदी सरकार इसे लेकर जीरो टालरेंस की नीति पर हैं और उसी को सरकार आगे बढ़ा रही है। मोदी सरकार -2 'बातें कम और काम ज्यादा' को ज्यादा महत्व दे रही है। हालांकि विपक्ष के अंदर एक बात यह चल रही है कि सरकार उन अधिकारियों के भी पर काट रही है जो कांग्रेस की सरकारों में अहम पद पर रहे हैं और मोदी-शाह अपने और संघ की पंसद के अधिकारियों को बढ़ावा दे रहे हैं।

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मंत्री, सांसद और सचिवों के साथ लगातार प्रधानमंत्री बैठक कर रहे हैं। इसके अलावा यह भी कहा जा रहा है कि मोदी ने अधिकारियों से साफ कह दिया है कि काम से जुड़ी कोई भी फाइल ना अटकनी चाहिए और ना ही भटकनी चाहिए। इसका मतलब साफ है कि सरकार शुरू से ही अपने एजेंडे को स्पष्ट कर के चल रही है। खबरों कि माने तो सरकार फिलहाल अपने 100 दिन के एजेंडा को लेकर आगे बढ़ रही है। वित्त मंत्रालय के अलावा कुछ अन्य मंत्रालयों और नीति आयोग के शीर्ष अधिकारियों को इन एजेंडों पर फोकस रहने के लिए कह दिया गया है। इसके साथ किसानों की आय दोगुना करने, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, प्रधानमंत्री आवास योजना, सबको पेयजल, सबको बिजली समेत प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं पर सरकार एक स्पष्ट नीति के तहत आगे बढ़ रही है। अब यह देखना होगा कि अधिकारियों की छुट्टी कर सरकार भ्रष्टाचार पर कितना लगाम लगा पाती है।

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