ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन रहे देश में उच्चायुक्त और अन्य देशों में राजदूत क्यों नियुक्त होते हैं? क्राउन के प्रति निष्ठा है इसकी वजह?

ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन रहे देश में उच्चायुक्त और अन्य देशों में राजदूत क्यों नियुक्त होते हैं? क्राउन के प्रति निष्ठा है इसकी वजह?

आपने अधिकतर सुना होगा कि किसी देश में भारत का राजदूत है और किसी देश में भारत का उच्चायुक्त है। लेकिन क्या कभी आपने इस तरफ ध्यान दिया कि राजदूत और उच्चायुक्त में क्या अंतर होता है। दरअसल, जो देश राष्ट्रमंडल के सदस्य हैं उन देशों के दूतावासों को उच्चायोग कहा जाता है और राजदूत को उच्चायुक्त।

भारत कब स्वतंत्र हुआ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब 15 अगस्त 1947 सभी देशवासियों के जुबना पर जैसे रटा-बसा है। लेकिन फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत के एक बयान की वजह से हालिया दिनों में आजादी की तारीख एक बड़ा मुद्दा बनी। जब कंगना ने 10 नवंबर 2021 को एक न्यूज चैनल पर भारत की आजादी पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अब तक शरीर में खून तो बह रहा था, लेकिन वो हिन्दुस्तानी खून नहीं था…और जो (भारत को) आजादी मिली थी वो भीख में मिली आजादी थी। कंगना के इस बयान ने देशभर में खूब सुर्खियां बटोरी। लेकिन इन सारी कवायदों के बीच एक सवाल जिसके बारे में जानना हर किसी के लिए जरूरी है। आपने अधिकतर सुना होगा कि किसी देश में भारत का राजदूत है और किसी देश में भारत का उच्चायुक्त है। लेकिन क्या कभी आपने इस तरफ ध्यान दिया कि राजदूत और उच्चायुक्त में क्या अंतर होता है। आखिर क्या वजह है कि कई देशों में दूतावास को उच्चायोग और राजदूत को उच्चायुक्त कहा जाता है? 

उच्चायुक्त

दरअसल, जो देश राष्ट्रमंडल के सदस्य हैं उन देशों के दूतावासों को उच्चायोग कहा जाता है और राजदूत को उच्चायुक्त। जैसे ऑस्ट्रेलिया में भारत का दूतावास नहीं उच्चायोग है लेकिन जापान में दूतावास है, क्योंकि जापान राष्ट्रमंडल का सदस्य नहीं है।  राष्ट्रमण्डल के सदस्य देश वे देश हैं जिनपर ब्रिटेन का राज्य रहा है। राष्ट्रमण्डल देशों में भारत के प्रतिनिधि उच्चायुक्त कहलाते हैं। 

राजदूत

राष्ट्रमण्डल देशों के अलावा जो भी देश हैं, वहां पर भारत सरकार के प्रतिनिधि को राजदूत कहा जाता है। जैसे अमेरिका और जापान में भारत सरकार के प्रतिनिधि को राजदूत कहा जाता है। इन देशों में स्थित भारतीय विदेश मंत्रालय के कार्यालय को दूतावास कहा जाता है। राजदूत भी भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी होते हैं।

कामनवेल्थ और क्राउन के प्रति निष्ठा

‘राष्ट्रमंडल’ वस्तुत: अंतरराष्ट्रीय संगठन नहीं है। यह ब्रिटेन की गुलामी में रहे देशों का एक मंच है। लार्ड रोजबरी नाम के एक ब्रिटिश राजनीतिक चिंतक ने 1884 में ‘ब्रिटिश साम्राज्य’ को ‘कामनवेल्थ आफ नेशंस’ बताया। ब्रिटेन ने अपना वैचारिक आधिपत्य बनाए रखने के लिए 1931 में कनाडा, आयरिश राज्य, दक्षिण अफ्रीका व न्यूफाउंड लैंड के साथ मिलकर ‘ब्रिटिश कामनवेल्थ’ बनाया। ब्रिटेन का राजा ही इसका प्रमुख था। 1946 में ब्रिटिश शब्द हटा, यह ‘कामनवेल्थ आफ नेशंस’ हो गया। लंदन में इसका मुख्यालय है। सेक्रेटरी जनरल संचालक हैं। 54 देश इसके सदस्य हैं। भारत की संविधान सभा में ‘कामनवेल्थ’ की सदस्यता पर भारी विवाद उठा था। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पंडित नेहरू ‘लंदन घोषणापत्र’ पर हस्ताक्षर करके लौटे थे। नेहरू ने राष्ट्रमंडल सदस्यता संबंधी प्रस्ताव रखा और लंदन घोषणापत्र पढ़ा कि राष्ट्रमंडल देश क्राउन के प्रति समान रूप से निष्ठावान हैं, जो स्वतंत्र साहचर्य का प्रतीक है। संविधान सभा के वरिष्ठ सदस्य शिब्बन लाल सक्सेना ने कहा, ‘भारत उस राष्ट्रमंडल का सदस्य नहीं बन सकता, जिसके कई सदस्य अब भी भारतीयों को निम्न प्रजाति का समझते हैं, रंगभेद अपनाते हैं।’ पंडित नेहरू ने अंतरराष्ट्रीय संधियों पर संशोधन लाना गलत बताया।





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