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कॅरियर

मैरीन इंजीनियरिंग का क्षेत्र चुनौती भरा पर वेतन आकर्षक

By अमित भंडारी | Publish Date: Jun 16 2017 4:42PM

मैरीन इंजीनियरिंग का क्षेत्र चुनौती भरा पर वेतन आकर्षक
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जिस प्रकार सुरक्षित विमान यात्रा पायलट पर बहुत हद तक निर्भर करती है उसी प्रकार समुद्री पोतों का कुशल संचालन मैरीन इंजीनियरों के हाथ में रहता है। इस चुनौती भरे कॅरियर में प्रवेश के लिए अभ्यर्थी को मैरीन इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम के तहत प्रशिक्षित होना आवश्यक है। इस पाठ्यक्रम में प्रवेश पाने के इच्छुक उम्मीदवार की न्यूनतम शैक्षणिक अर्हता गणित, भौतिकी और रसायन के साथ 10़2 की परीक्षा पास होना तय है।

एक मैरीन इंजीनियर का काम जलयानों, पोतों तथा सामुद्रिक सुविधाओं संबंधी तमाम विद्युत व यांत्रिक उपकरणों की देखभाल करना है बल्कि उनकी फिटिंग, सेंटिग, आपरेटिंग और चेकिंग आदि जिम्मेदारी भरे कार्य पूरी मेहनत तथा लगन से करना होता है इसलिए मैरीन इंजीनियर बनने के इच्छुक अभ्यर्थी में बेहतर मनोवृति, संगठनात्मक क्षमता, कड़ी मेहनत उसकी दिनचर्या रहे, आपातकाल में वह शांतचित रहे और संवाद संप्रेषण में माहिर हो, आंकड़ों व अंकों के साथ खेलना उसका स्वभाव हो और औजार उसका पसंदीदा हथियार हो तब वे मैरीन इंजीनियर बनने के निःसंदेह अनुकूल है।
 
मैरीन इंजीनियरिंग में प्रवेश के इच्छुक अभ्यर्थी को शारीरिक रूप से स्वस्थ होना भी आवश्यक है। सामान्यतः स्वस्थ छात्र को इस पाठ्यक्रम के योग्य माना चाहता है। न्यूनतम लंबाई 150 सेंटी मीटर एवं इसके अनुसार वजन होना चाहिए। छाती का फुलाव, कद काठी के अनुकूल होना चाहिए। बिना चश्मे के छात्र की दोनों आंख की दृष्टि 6/6 रहनी चाहिए। वर्णाधंता की बीमारी, हृदय रोग, एनीमिया एक्वाफोबिया आदि के मरीज छात्र को प्रथम दृष्टि में ही अस्वीकृत कर दिया जाता है।
 
मैरीन इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में प्रवेश मिलने वाले अभ्यर्थी को सामन्यतः मैरीन पाठ्यक्रम में सिद्धांत, प्रयोगशाला कक्षाएं एवं गहन शारीरिक ट्रेनिंग होती है। सैद्धांतिक सत्र की अवधि में शिपिंग इंजीनियरिंग, ड्राईंग और वायुमंडलीय विज्ञान के बारे में मुख्यतः बताया जाता है। एक छात्र यहां आमतौर पर बुनियादी जलयान संरचना, मैरीन बायलर्स, शिप आपरेशन्स तथा मैनेजमेंट, नेवल आर्किटेक्चर, भौगोलिक भू दृश्य चित्रण तथा अभियांत्रिकी चित्रण वगैरह के बारे में उच्च शिक्षा व्यवहारिक कक्षाओं के साथ पाते हैं। इसके अलावा उन्हें लम्बी पारियों में लगकर यंत्रों की मरम्मती का प्रशिक्षण दिया जाता है।
 
शिप पर रात्रिकालीन पारियों में छात्रों को जगाकर यंत्रों की देखभाल करने की ट्रेनिंग मिलती है। जलयान आपस में किन गलतियों से टकराते हैं। वे क्यों डूबते हैं, हिमखंडों में फंसकर कैसे खंडित हो जाते हैं, यह सब बातें छात्रों को बतायी जाती हैं। अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लैंग्वेज अंग्रेजी है और पृथ्वी पर उपस्थित संचार के समस्त संसाधन शिप पर रहते हैं। एक मैरीन इंजीनियर को बतौर डेक कैडेट कम्प्यूटर का ज्ञान, इंटरनेट के बारे में जानकारी भी होनी चाहिए। जहाज के इंजन कक्ष में मैरीन इंजीनिर्यस की नियुक्ति सहायक के पद पर या फिर चौथे, तीसरे, दूसरे या मुख्य अभियंता के बतौर होती है। मैरीन इंजीनियरिंग को कभी बैठना नहीं पड़ता है। क्योंकि विश्व भर में मांग के वनस्थित 50 प्रतिशत मैरीन इंजीनिर्यस कम हैं। 
 
मैरीन इंजीनियर्स अंतरराष्ट्रीय स्तर के वेतन पाते हैं। वह भी पूर्णतः कर मुक्त क्योंकि यह पेशा वैश्विक नियम कानून से संचालित होता है। आमतौर पर एक सहायक अभियंता 64,000−85,000 रुपए की नौकरी पाता है। इसके अलावा आवास, चिकित्सा और अन्य सुविधांए निःशुल्क पाता है। एक मुख्य मैरीन अभियंता का वेतन अनुभव एवं व्यक्तिगत रिकार्ड के अनुसार लाखों में होता है।
 
भारत में मैरीन इंजीनियरों के लिए अनेक शिक्षण संस्थान हैं। यहां नियमित रूप से पाठ्यक्रम की पढ़ाई होती है। पत्राचार कोर्स विश्व में किसी स्थान पर नहीं है। मैरीन इंजीनियरिंग का डिग्री पाठ्यक्रम 3 वर्ष का और डिप्लोमा 1 वर्ष का होता है। सभी संस्थानों में प्रवेश लिखित और साक्षात्कार के द्वारा ही मिलता है। भारत के दो प्रमुख संस्थान हैं। मैरीन इंजीनियरिंग एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट कोलकाता और टीएस चाणक्या मुंबई। इनमें नामांकन की एकमात्र प्रक्रिया आईटीजेई है।
 
मैरीन इंजीनियरिंग इन संस्थाओं से किया जा सकता है−
टोएस चाणक्या, मुंबई
तोलानी मेरी टाइन इंस्टीट्यूट
इंटरनेशनल मेरीटाइन इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली
कोलकाता टेकनिकल स्कूल कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
नेवल कालेज ऑफ इंजीनियरिंग लोनावाला
 
अमित भंडारी

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