अमेरिका ने पाकिस्तान को डॉलर फ्री में नहीं दिये, कीमत भी वसूली

By कुलदीप नैय्यर | Publish Date: Jan 10 2018 12:56PM
अमेरिका ने पाकिस्तान को डॉलर फ्री में नहीं दिये, कीमत भी वसूली

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान में शायद कुछ सच्चाई हो कि उनके देश ने ''''मूर्खतावश'''' पाकिस्तान को 15 सालों में 33 अरब डालर की सहायता की। लेकिन उनका यह कहना गलत है कि बदले में अमेरिका को कुछ नहीं मिला।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान में शायद कुछ सच्चाई हो कि उनके देश ने ''मूर्खतावश'' पाकिस्तान को 15 सालों में 33 अरब डालर की सहायता की। लेकिन उनका यह कहना गलत है कि बदले में अमेरिका को कुछ नहीं मिला। जाहिर है पाकिस्तान ने उन्हें डालर में पैसे वापस नहीं किए, न ही अमेरिका इसकी उम्मीद करता था। लेकिन सैनिक कार्रवाई के लिए पाकिस्तान ने अमेरिका को आधार मुहैय्या कराया।

राष्ट्रपति ट्रंप गैर−जरूरी ढंग से कठोर हैं जब वह यह कहते हैं कि बदले में उनके देश को झूठ और मक्कारी के अलावा कुछ नहीं मिला और उन्होंने नेताओं का उल्लेख मूर्ख के रूप में किया। शीत युद्ध के समय जब दुनिया दो खेमों में बंटी थी, पाकिस्तान अमेरिका की तरफ था। रावलपिंडी उस सेंट्रल ट्रीटी आरगेनाइजेशन (सेन्टो), एक कम सफल गठबंधन का हिस्सा था जिसे 1955 में ईरान, इराक, पाकिस्तान, तुर्की तथा यूनाइटेड किंगडम जैसे बेमेल सहयोगियों के साथ मिलकर बनाया गया था।
 
जाने−माने तथा ज्यादा सफल नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी आर्गेनाइजेशन (नाटो) की तरह सेन्टो का उद्देश्य भी सोवियत यूनियन को काबू में रखना तथा मध्य पूर्व में उसके प्रसार को रोकना था। संधि के सदस्यों को आपसी सहयोग तथा सुरक्षा के लिए सहमत होना पड़ता था। लेकिन उन देशों की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के मद्देनजर सबसे दिलचस्प बात यह थी कि उन्हें इस बात के लिए सहमत होना पड़ता था कि वे एक दूसरे के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देंगे।
 


इस समूह का मूल नाम बगदाद संधि था और इसी से पता चलता है कि इसका मुख्यालय बगदाद था। लेकिन 1958 में एक तख्तापलट का नतीजा यह हुआ कि इराक इस समूह से बाहर निकल गया। इस वजह से इसका नाम बदल कर सेन्टो रखना पड़़ा और मुख्यालय कम कट्टरपंथी तुर्की की राजधानी अंकारा में स्थानांतरित कर दिया गया। सेन्टो सिक्स−डे तथा योम किप्पुर के युद्धों से अलग रहा जबकि इराक पहले वाले में सक्रिय हमलावर था और दूसरे में युद्ध में मदद करने वाला। लेकिन उस समय वह सेन्टो से बाहर निकल गया था।
 
सेन्टो ने 1965 तथा 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में दखल नहीं दिया और दावा किया कि यह एक सोवियत यूनियन−विरोधी संधि है, भारत−विरोधी नहीं। अंत में 1979 में सेन्टो को भंग कर दिया गया जब वह 1974 में तुर्की के साइप्रस पर हमले तथा ईरानी इस्लामिक क्रांति को रोक नहीं पाया।
 
उचित ही था कि पाकिस्तान ट्रंप के ट्वीट को स्वीकार नहीं कर पाया और उसने तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त की। विदेश मंत्री ख्वाजा एम आसिफ ने ट्वीट किया। ''हम लोग राष्ट्रपति ट्ंप के ट्रवीट पर जल्द ही प्रतिक्रिया देगें...ईंशाल्लाह दुनिया को पूरी सच्चाई बताएंगे...वास्तविकता तथा कहानी में अंतर।'' इसके तुरंत बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कियाः ''पाकिस्तान ऐसे बेबुनियाद आरोपों को खारिज करता है जो जमीनी सच्चाई को झूठा साबित करते हैं और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की पाकिस्तान की कोशिशों तथा क्षेत्र में शांति, स्थिरता बनाए रखने में हमारे अतुलनीय त्याग को महत्वहीन बनाते हैं।''
 


इंतजार में बैठे चीन ने इसका भरपूर फायदा उठाया और आतंकियों को सुरक्षित ठिकाना देने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की पाकिस्तान की घोर निंदा के एक दिन के बाद पाकिस्तान के बचाव में चीन यह कह कर सामने आया कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में उसके सदा के दोस्त के ''असाधारण योगदान'' को विश्व समुदाय को स्वीकार करना चाहिए।
 
पाकिस्तान पर प्रशंसा की बरसात करते हुए चीन ने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में इस्लामाबाद ने काफी प्रयास तथा बलिदान किए हैं और उसने आतंकवाद विरोधी वैश्विक मुहिम में असाधारण योगदान किया है। ''अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह स्वीकार करना चाहिए,'' चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जेंग सुआंग ने कहा, जब उनसे ट्रंप की ओर से पाकिस्तान की आलोचना के बारे में पूछा गया। उन्होंने यह भी जोड़ा कि पाकिस्तान आतंकवाद विरोध सहित अंतरराष्ट्रीय सहयोग में आपसी सम्मान के साथ लगा है ताकि क्षेत्रीय शांति तथा स्थिरता में योगदान कर सके।
 
''चीन तथा पाकिस्तान हर परिस्थिति में दोस्त हैं। हम चौतरफा सहयोग को बढ़ाने तथा गहरा करने के लिए तैयार खड़े हैं ताकि दोनों पक्षों को फायदा हो सके'' चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा। ऐसी ही उम्मीद थी क्योंकि चीन−पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की 50 अरब डालर की परियोजना, जिसके पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरने की वजह से भारत ने आपत्ति उठायी है, के तहत पाकिस्तान में काफी निवेश कर रहा है। चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के विदेश मंत्रियों की अभी तक की पहली त्रिपक्षीय बैठक में पिछले सप्ताह चीन ने चीन−पाक आर्थिक गलियारे को भारत के साथ नजदीकी संबंध रखने वाले अफगानिस्तान तक आगे बढ़ाने की अपनी योजना की घोषणा की।


 
लेकिन अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हमीद करजाई ने ट्रंप की नाराजगी भरे बयान का स्वागत किया और सिर्फ अफगानिस्तान ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र में शांति बहाल करने के लिए पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान पर दबाव डालने के उद्देश्य से अमेरिका के साथ एक संयुक्त क्षेत्रीय गठबंधन बनाने की अपील की। अफगानिस्तान ने भी पाकिस्तान पर तालिबानी कट्टरपंथियों को पनाह देने का आरोप लगाया था जिसकी वजह से दोनों देशों के बीच लंबे दौर तक आरोप−प्रत्यरोप की शुरूआत हुई। त्रिपक्षीय यंत्रणा के जरिए चीन दोनों पड़ोसियों के बीच मध्यस्थता करना चाहता हैं।
 
विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा रहा है क्योंकि पाकिस्तान ने अरब सागर तथा हिंद महासागर तक पहुंचने की सहूलियत देने वाले सामरिक महत्व के चीन−पाकिस्तान आर्थिक गलियारे में भारी निवेश की इजाजत देकर चीन के साथ अपना गठबंधन मजबूत कर लिया है। लेकिन साझे−हितों की वजह से, यह स्वाभाविक था कि चीन तथा पाकिस्तान, बाद में अफगानिस्तान, ने आपस में संवाद बढ़ाया।  
 
आखिरकार चीन समझता है कि पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान भौगोलिक रूप से एक दूसरे से एकदम जुड़े हुए हैं। जाहिर है तीनों कई मुद्दों पर सहमत हुए जिसमें आतंकवाद के विरोध तथा आतंकवाद के खिलाफ, इसके सभी रूपों तथा तरीकों के खिलाफ लड़ना शामिल है।
 
यह संभावित था कि आतंकवाद को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति के पाकिस्तान को संदेश का भारत स्वागत करता। जहां तक आतंकवाद को जारी रखने में पाकिस्तान की भूमिका का सवाल है, ट्रंप प्रशासन के फैसले ने भारत की राय को पूरी तरह सही साबित किया है क्योंकि आखिरकार आतंकवादी आतंकवादी है, आतंक आंतक है....यह किसी राष्ट्र, किसी देश, किसी क्षेत्र को नहीं बख्शता'' प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा।
 
यह साफ है कि राष्ट्रपति ट्रंप एक नई अमेरिकी नीति शुरू कर रहे हैं। यह राष्ट्रपति क्लिंटन की केंद्र से बायीं ओर झुकी नीति के मुकाबले धुर दक्षिणपंथी नीति है। पुराने मूल्य अब प्रासंगिक नहीं हैं। और डोनाल्ड ट्रंप वाशिंगटन को दक्षिणपंथी युग में वापस ले जा रहे हैं। भारत की बायीं ओर झुकी नीति का ट्रंप की नीति से टकराव है।
 
इसी बीच यह देखना है कि पाकिस्तान बिना अमेरिकी मदद के टिक सकता है या नहीं। इस्लामाबाद ने कहा है कि वह इसका हिसाब लगा रहा है कि उसने अमेरिका से कितनी मदद पाई है ताकि वह उसे लौटा सके। लेकिन यह साफ है कि पाकिस्तान ऐसा करने में सक्षम नहीं है।
 
- कुलदीप नैय्यर

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