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स्तंभ

महाराष्ट्र में हो रही हिंसा का कारण अंग्रेजों का 'बोया बीज' है

By राकेश सैन | Publish Date: Jan 3 2018 3:29PM

महाराष्ट्र में हो रही हिंसा का कारण अंग्रेजों का 'बोया बीज' है
Image Source: Google

जो समाज अपने अतीत की गलतियों से नहीं सीखता वह इतिहास दोहराने को अभिशप्त होता है, इसकी ज्वलंत उदाहरण है महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव की घटना जहां हुए जातीय टकराव में एक युवक की मौत हो गई, कई घायल और अरबों की संपत्ति स्वाहा हुई। सबसे बड़ी क्षति इस घटना से सामाजिक एकता को हुई जिसकी क्षतिपूर्ति होने में लंबा समय लगेगा। 1 जनवरी, 1818 को ब्रिटिश सेना की ओर से लड़ते हुए जाति व्यवस्था से पीड़ित महारों ने बाजीराव पेशवा (द्वितीय) की सेना को परास्त किया था। 'फूट डालो और राज करो' की राजनीति के आविष्कारक ब्रिटिश शासकों ने भारतीय समाज की इस फूट का लाभ देश के खिलाफ भाई को भाई से लड़ा कर लिया। होना तो चाहिए था कि इस घटना की 200वीं वर्षगांठ भूल सुधार और सामाजिक एकता के रूप में मनाई जाती परंतु हुआ उलट। इस युद्ध के 200 साल पूरे होने पर 1 जनवरी सोमवार को कार्यक्रम रखा गया था। कार्यक्रम में भारी संख्या में लोग पहुंचे और दो गुटों मे बंटे लोगों में भयंकर झड़प हो गई। दोनों ओर से पत्थर चले। 

पहले अंग्रेजों ने इस एतिहासिक टकराव से भारतीय समाज को बांटा और आज ये काम वह सेक्युलर व कुछ उस तरह के संगठन करते दिखाई दे रहे हैं जो बैनर बाबा साहिब भीमराव अंबेदकर का लगाते हैं परंतु एजेंडा अल कायदा का आगे बढ़ाने का है। बाबा साहिब ने अपने जीवनकाल में सामाजिक एकता के लिए काम किया परंतु आज कुछ संगठन उनके नाम से समाज में विभाजन के बीज बोने का काम करते दिख रहे हैं।
 
गुजरात के ऊना में सितंबर 2017 को कुछ अपराधी किस्म के लोगों ने गऊ रक्षा के नाम पर वंचित वर्ग के लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार किया था। इस मामले में सरकार ने तत्परता दिखाई और तुरंत कार्रवाई की परंतु मौके का लाभ उठाने की फिराक में बैठी कुछ ताकतों ने इसे हाथ से नहीं जाने दिया। इसके खिलाफ दलित उत्पीड़न के नाम पर गुजरात में जो आंदोलन हुआ उसकी उपज रहे जिग्नेश मेवाणी दिसंबर 2017 में गुजरात के वडगाम निर्वाचन क्षेत्र से विधायक भी बन गए। मेवाणी एंड पार्टी अब इसी प्रयोग को महाराष्ट्र में दोहराने की फिराक में दिख रही है। दिखने को चाहे महाराष्ट्र में पैदा हुए आंदोलन की कमान डॉ. भीमराव अंबेदकर के पौत्र प्रकाश अंबेदकर के हाथ में है परंतु आग में घी डालने का काम मेवाणी व उमर खालिद जैसे लोग कर रहे हैं। पुणे पुलिस ने इन दोनों के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने के आरोप में पर्चा भी दर्ज किया है। खालिद जेएनयू का वही विद्यार्थी नेता है जिस पर भारत के टुकड़े होने व आतंकी अफजल गुरु के पक्ष में नारे लगाने के आरोप लगे हैं और वह वामपंथी नेता कन्हैया के सह अभियुक्त हैं।
 
यह कोई एकमात्र उदाहरण नहीं है जहां कथित अंबेदकरवादी संगठनों के अलकायदावादी एजेंडे का भंडाफोड़ हुआ हो। हैदराबाद विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल के जाधवपुर विश्वविद्यालय में पहले ही इनका पर्दाफाश हो चुका है। गुजरात चुनाव में जिग्नेश मेवाणी पर एक विवादित संगठन से चेक लेने की कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं। इनमें मेवाणी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीएफआई) के एक नेता से चेक लेते नजर आ रहे हैं। एसडीएफआई पीएफआई का राजनीतिक मोर्चा है। यह संगठन दक्षिण भारत विशेषकर केरल में सक्रिय है। इन संगठनों पर सीरिया के आतंकी संगठन आईस से संपर्क का आरोप है, जिसकी जांच राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनआईए) कर रही है। बता दें कि पीएफआई ने केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक में अपनी अच्छी खासी मौजूदगी दर्ज कराई है। एनआईए को शक है कि ये संगठन आईएस के लिए भारत से कैडर की नियुक्ति करता है। केरल में इस संगठन पर सशस्त्र ट्रेनिंग कैंप चलाने का आरोप है। जिहादी आतंकवाद को प्रोत्साहन देने वाले इस्लामिक विद्वान जाकिर नाइक भी इसी संगठन का करीबी है।
जिग्नेश को केवल एसडीएफआई से ही नहीं बल्कि विवादित सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ से भी गुजरात चुनाव के दौरान 3 लाख रूपये चंदे के रूप में मिल चुके हैं। सीतलवाड़ वह अभियानवादी कार्यकर्ता रही हैं जिन पर साल 2002 में हुए गुजरात दंगों के दौरान भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने के आरोप लगे। केवल इतना ही नहीं सीतलवाड़ पर गुजरात दंगों के दौरान दुनिया भर से एकत्रित हुए फंड में गड़बड़ी करने के भी आरोप हैं जिसके चलते अदालत को उनके बैंक खाते सील करने पड़े थे।
 
देशविरोधी जिहादी शक्तियों से हाथ मिलाने की गलती कर रहे कथित दलित संगठनों व उनके नेताओं को पाकिस्तान के पहले विधि व श्रम मंत्री और मुस्लिम लीग के हिंदू नेता जोगेंद्रनाथ मंडल का हश्र ध्यान में रखना चाहिए। भारत को बाबा साहिब भीमराव अंबेदकर के रूप में पहला विधि मंत्री दलित नेता मिला तो पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री जोगेंद्रनाथ मंडल भी दलित थे। 29 जनवरी, 1904 में बंगाल में जन्मे मंडल ने मुस्लिम लीग से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरु की। पाकिस्तान बनाने की मांग को लेकर वे लीगियों के साथ मिल कर संघर्ष करते रहे। पाकिस्तान निर्माण के बाद वे वहां के विधि के साथ-साथ श्रम, राष्ट्रमंडल और कश्मीर मामलों के मंत्री बने, लेकिन शीघ्र ही उनका पाक व मुस्लिम लीग से मोहभंग हो गया। उन्होंने अपने देश में विभाजन के बाद दलित हिंदुओं पर मुस्लिम लीगियों के अत्याचार रोकने के भरसक प्रयास किए परंतु उन्हें निराशा व अपमान के अतिरिक्त कुछ हाथ न लगा। स्वतंत्रता के कुछ साल बाद ही वह लियाकत अली खां की सरकार में मंत्रीमंडल से त्यागपत्र देकर भारत लौट आए। पछतावे व अपमानजनक स्मृतियों के साथ 5 अक्तूबर, 1968 को पश्चिमी बंगाल में उनका स्वर्गवास हो गया। वे सारी उम्र मुस्लिम लीग का साथ देने व देश बंटवारे के अपराधबोध से मुक्त नहीं हो पाए।
 
पाकिस्तान में आज दलित हिंदुओं की जो स्थिति है वह किसी से छिपी नहीं है। भारत में आज फिर वही मुस्लिम लीगी मानसिकता सिर उठा रही है तो दलित संगठनों व दलित नेताओं को इनके हाथ का हथियार बनने से अपने आपको बचाना होगा।
 
रही बात मराठाओं व महारों के बीच हुए युद्ध की तो यह देश में कोई एकमात्र उदाहरण नहीं है कि जहां अंग्रेजों ने भाई के खिलाफ भाई को इस्तेमाल न किया हो। ब्रिटिश-अफगान और ब्रिटिश-सिख युद्ध के दौरान उन्होंने अवध की शक्तिशाली सेना को पठानों व सिखों के खिलाफ प्रयोग किया। 1857 में देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों ने गोरखा, सिख व पठान सैनिकों का शेष भारतीयों के खिलाफ प्रयोग किया। वीर क्रांतिकारी संथालों के खिलाफ स्थानीय जनजाति के सिपाहियों को ही तो लगाया गया। ब्रिटेन ने दो विश्वयुद्ध भारतीय सैनिकों के बल पर लड़े, क्या क्रांतिकारी सुभाषचंद्र बोस की स्वतंत्र भारत सेना के खिलाफ मोर्चा लेने वाले ब्रिटिश सैनिक भारतीय ही नहीं थे? ब्रिटिश शासनकाल के समय भारत में ब्रितानिया से आए लोगों की संख्या तो कुछ लाख थी, अंग्रेज हमारे ही लोगों को तो हमारे ही लोगों के खिलाफ इस्तेमाल करते रहे और खुद शासन करते रहे। अगर उस समय हुए युद्धों का हिसाब-किताब आज किया जाए तो देश में गृहयुद्ध छिड़ सकता है। आज स्वर्ग में बैठी डलहौजी से लेकर माउंटबेटन तक जैसे लाट साहिबों की आत्माएं हम पर अट्टाहस कर रही होंगी कि भारतीय कितने मासूम हैं कि उनकी सदियों पुरानी 'बांटो और राज करो' की नीति का आज भी पालन कर रहे हैं।
 
भीमा कोरेगांव में दो सौ साल पहले हुई लड़ाई भारतीय समाज के बिखराव, आपसी संघर्ष व ब्रिटेन की 'बांटो और राज करो' की नीति की मिसाल है। यह हमारे लिए राष्ट्रीय एकता का स्तंभ बननी चाहिए। भविष्य में मराठा व ब्रिटिश युद्ध की वर्षगांठ मनाई जाए तो पेशवाई और वीर महार एक साथ मनाएं। नई नस्लों को बताएं कि किस तरह अंग्रेजों ने दो वीर जातियों को लड़ा कर अपना उल्लू सीधा किया। यह विजयस्तंभ भारत का विजय स्तंभ बने, ऐसा स्तंभ जो पूरी दुनिया को संदेश दे कि हम इतिहास से सीखने वाले लोग हैं न कि उसको दोहराने की गलती करने वाले।
 
-राकेश सैन

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