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स्तंभ

बंगाल में माँ, माटी और मानुष का हो रहा है अपमान

By तरुण विजय | Publish Date: Apr 16 2018 2:27PM

बंगाल में माँ, माटी और मानुष का हो रहा है अपमान
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बंग भूमि हिन्दूमन के जागरण की साक्षी है तो उसके आहत होने की भी। उसने देश जगाया तो वहीं कम्युनिस्ट शासन की प्रायः तीन दशक को स्पर्श करती विभीषिका भी लोगों को झेलनी पड़ी। बंगाल ने अग्नि धर्मा क्रांतिकारी भी दिए, आध्यात्मिक जागरण के पुरोधा दिए, विज्ञान, साहित्य एवं कला के विश्वविख्यात हस्ताक्षर दिए तो अंततः ममता दी भी दीं- जिनका कार्यकाल हिंदुओं पर आघातों के लिए जाना जाएगा, जब मुहर्रम के लिए दुर्गा विसर्जन ही रोक दिया गया।

किसी को बंगाल के अकाल की याद है? तीस लाख भारतीयों को चर्चिल और उसके ब्रिटिश कारिन्दों ने तड़प-तड़प कर मरने पर मजबूर किया था। वह संसार का सबसे भीषण मानव निर्मित अकाल था। यद्यपि कुछ  विश्लेषक मृतकों की आंकड़ा 20-25 लाख के बीच बताते हैं- उस समय चर्चिल ने कहा था 'मैं हिन्दुस्तानियों से नफरत करता हूं। वे पशुतुल्य लोग हैं जिनका धर्म भी पशुवत है। बंगाल का दुर्भिक्ष उनकी अपनी करनी का फल था जो खरगोश की तरह बच्चे पैदा करते हैं।'
 
यह दुर्भिक्ष आजादी के बाद कुशासन तथा अराजक राजनीति के रूप में फैला। जो बंगाल विधानचंद्र राय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे राजनेताओं के लिए जाना गया, शीघ्र ही नक्सलवाद-माओवाद के रक्त रंजित दौर में डूबा। तीन हजार से ज्यादा लोग मारे गए, साढ़े तीन लाख जनजातीय लोग विस्थापित हुए। यह आजादी के बाद का बंगाल था- जिसने 1946 में मुस्लिम लीग के नेता जिन्ना के उकसाने पर हजारों हिन्दुओं को मारे जाते देखा था। वह तारीख थी 16 अगस्त 1946।
 
पहले अंग्रेज, फिर मुसलमान कट्टरपंथी, उसके बाद प्रायः साढ़े तीन दशक-33 वर्ष तक चला कम्युनिस्ट शासन। धर्म पर आघात, गरीबों का शोषण, शिक्षा संस्थानों में मार्क्सवादी यूनियनों का इतना दखल तथा सरकारी दमन कि रामकृष्ण मिशन जैसी संस्था को भी स्वयं को अहिन्दू और नया सम्प्रदाय घोषित कर अल्पसंख्यक बनने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल करनी पड़ी। हिंदुओं के लिए दुखों का पहाड़ था कम्युनिस्ट शासन।
 
जब ममता दीदी ने परिवर्तन का उद्घोष कर 'मां-माटी-मानुष' का राजनीतिक नारा दिया तो कम्युनिस्ट शासन से त्रस्त जनता ने उनको भारी मतों से जिताया। लगा आतंक, भ्रष्टाचार, अहिन्दू आक्रमणों से बंगाल बचेगा। लेकिन सिर्फ नाम परिवर्तन हुआ- राज परिवर्तन नहीं। गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार एक ओर तो दूसरी ओर मुस्लिम जिहादी तत्वों का हिन्दुओं पर आघात बढ़ा। हुगली के आसपास के क्षेत्र पर एक नजर दौड़ाएं तो बंगाल के दुर्भिक्ष जैसा दृश्य दिखता है। फटे कपड़ों में भूखे चेहरों वाले बच्चे, वृद्ध, टूटी-ध्वस्त प्रायः प्लास्टिक की बदबू वाली झोपड़ियां, गंदगी में रहते लाखों लोग। यह है बंगाल का 2018 का कटु सत्य। सारदा चिट फंड जैसे अनेक घोटालों में फंसे तृणमूल कांग्रेस के दिग्गज नेता तो मात्र एक छोटी सी बानगी हैं। 
 
राज्य की 42 हजार पंचायत सीटों के चुनाव देश की राजनीति पर असर डालेंगे। अपने राजनीतिक भविष्य को हिलते देख तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता पुलिस को दरकिनार कर खुलकर गुंडागर्दी, हिंसा और दमन पर उतर आये हैं। सोमवार 9 अप्रैल को दक्षिण 24 परगना जिले के बरूइपुर तालुक में भाजपा कार्यकर्ता परिवार से एक महिला को बाजार में पीटा गया। अभियुक्त का नाम शब्बीर मुल्ला, लेकिन कहीं किसी चैनल पर इसकी चर्चा नहीं।
 
बंगाल निश्चित रूप से एक बड़े परिवर्तन से गुजर रहा है। उसे प्रगतिशील, विज्ञानसम्मत, बहुलतावादी, भारतीय समाज के रूप में जीवित रहना है या नहीं? वहां मां दुर्गा, विवेकानंद के भक्तों का जीवन सुरक्षित रहेगा या नहीं? मुस्लिम कट्टरवाद को पहले अंग्रेजों का सहारा मिला फिर कम्युनिस्टों ने उसे पाला पोसा और अब ममता बंद्योपाध्याय, जो मुस्लिम बहुल इलाकों में मुस्लिम स्कार्फ पहन 'अल्लाहो अकबर' तक का नारा लगाती हैं। अब हिंदू विरोधी जिहादी अभियानों को मानो सरकारी संरक्षण मिल गया है।
 
बंगाल आज देश के सबसे पिछड़े और उद्योगविहीन प्रदेशों में शामिल हुआ है। इंफोसिस, टाटा जैसे बड़े उद्योग जो लाखों लोगों को रोजगार देने वाले उद्यम स्थापित करने के लिए विख्यात हैं, बंगाल छोड़ चुके हैं। प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था तृणमूल कार्यकर्ताओं के दबंगपन से चरमरा गई है। गोरखा लैंड आंदोलन में दार्जिलिंग के साथ अन्याय और देशभक्त हिंदू निष्ठ गोरखाली समाज के प्रति अन्यायपूर्ण नीति अपनाने के लिए तृणमूल सरकार की काफी आलोचना हुई थी।
 
यह बंगाल के संस्कृतनिष्ठ समाज के जागरण की बेला है, जो अपनी आंखों में आमार शोनार बांगला का स्वप्न संजोये है- उनके लिये यह समय लोकतांत्रिक युद्ध के रणांगन में कूद पड़ने का है। विजय प्राप्त करने के अलावा और कोई विकल्प है ही नहीं।
 
यह शोनार बांगला नहीं, यहां मां, माटी और मानुष तीनों का अपमान होता है, यहां सुभाष बोस की स्वातंत्र्य ज्वाला पर मुस्लिम जिहाद की राख फेंकी जाती है, यहां प्रीतिलता वाड्डेदार जैसे क्रांतिकारिणी की आत्मा सिसकती है। वह शोनार बांगला, जो कवि गुरु रवींद्र ठाकुर की वाणी में गुंजित हुआ, जिसे श्यामाप्रसाद और नजरूल इस्लाम की मित्रता ने नूतन आभा दी, आज भ्रष्ट, विधर्मी, विद्रूप तत्वों का शिकार बना है। जाग रे भारत जाग और कभी तुझे जगाने वाले बंगाल की व्यथा को सुन। उसे आमानुष, महिषासुरी, माटी-विरोधी तत्वों से मुक्त कर कवि गुरु की इस मधुर प्रार्थना को साकार कर- जहां मन भयमुक्त और मस्तक सम्मान से उठा हो-- उस स्वातंत्र्य के स्वर्ग में हे प्रभु, मेरा देश जागृत कर दो!
 
-तरुण विजय

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