Prabhasakshi
रविवार, जून 24 2018 | समय 14:26 Hrs(IST)

स्तंभ

संसद की कार्यवाहियों से सांसदों की अनुपस्थिति चिंता का विषय

By ललित गर्ग | Publish Date: Aug 3 2017 11:50AM

संसद की कार्यवाहियों से सांसदों की अनुपस्थिति चिंता का विषय
Image Source: Google

संसद में सदस्यों की अनुपस्थिति का मसला एक बार फिर सवालों के घेरे में है। राज्यसभा में क्रिकेट के मसीहा सचिन तेंदुलकर और प्रख्यात अदाकारा रेखा की लगातार अनुपस्थिति का मसला जोर−शोर से उठा। सदस्यों ने सवाल उठाया कि अगर इन के पास वक्त नहीं है तो सांसद बनते ही क्यों हैं? या उन्हें सांसद बनाया ही क्यों जाता है? दोनों की ही राज्यसभा में मौजूदगी नाम मात्र की रही या न के बराबर रही है। अब तक इस गंभीर विषय पर संसद के बाहर ही चर्चा होती रही थी लेकिन शुक्रवार को संसद में यह प्रश्न उठना, इस विषय पर किसी निर्णायक स्थिति में पहुंचने की आवश्यकता को व्यक्त कर रहा है। प्रश्न केवल सितारों का नहीं है बल्कि सभी दलों के सांसदों की संसद में उपस्थिति के विषय पर बरती जा रही लापरवाही एवं संसद के प्रति अरुचि का है। जरूरत है एक ऐसा कानून बनाने की जो कम से कम 100 दिन की सक्रिय उपस्थिति को सांसदों के लिए अनिवार्य करे। संसदीय कार्यवाहियों को सुचारू रूप से चलाने एवं उनमें समुचित जन−प्रतिनिधित्व के लिए यह बहुत जरूरी है ताकि संसदीय कार्यों के प्रति अरुचि व लापरवाही खत्म हो।

सांसदों की उपस्थिति को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बहुत सख्त हैं और इस विषय को लेकर उन्होंने सांसदों को चेताया भी है। वे कई बार सांसदों को उपस्थित रहने के लिए कह भी चुके हैं। लेकिन सांसदों पर इसका कोई असर नहीं दिख रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने ओबीसी बिल पर वोटिंग के वक्त बीजेपी सांसदों की गैरहाजिरी को गंभीरता से लिया है। प्रश्न किसी दल का नहीं, प्रश्न किसी बिल को बहुमत से पारित कराने का भी नहीं है। प्रश्न लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में लोकतांत्रिक प्रतिनिधियों की जबावदेही एवं जिम्मेदारी का है। सबके लिये नियम बनाने वाले, सबको नियमों का अनुशासन से पालन करने की प्रेरणा देने वाले सांसद या विधायक यदि स्वयं अनुशासित नहीं होंगे तो यह लोकतंत्र के साथ मखौल हो जाएगा। जब नेताओं के लिये कोई मूल्य मानक नहीं होंगे तो फिर जनता से मूल्यों के पालन की आशा कैसे की जा सकती है?
 
मास्टर−ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर और बॉलिवुड की तारिका रेखा को यूपीए सरकार ने बड़े शोरगुल के साथ राज्यसभा के लिए मनोनीत किया। अक्सर फिल्मी सितारों को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत करने की हमारे यहां परम्परा−सी बन गयी है। जबकि उनके पास समय की कमी की शिकायत हर समय बनी रहती है। जिन उद्देश्यों से उन्हें राज्यसभा में लाया जाता है, शायद वे उद्देश्य भी पूरे होते हुए नहीं देखे गये हैं।
 
सचिन अप्रैल 2012 में जब राज्यसभा सांसद बने थे तो उनका ये कहना था कि उनकी पहली प्राथमिकता क्रिकेट ही रहेगी, वो क्रिकेट की वजह से राज्यसभा के सदस्य बने हैं इसलिए वे क्रिकेट पर ही ध्यान लगाएंगे। उम्मीद की जा रही थी कि सचिन रिटायरमेंट के बाद शायद संसद में दिखने लगे, पिछले साल नवंबर में ही वे क्रिकेट से रिटायर भी हो गए, लेकिन फिर भी कुल 10 संसद सत्र के दौरान उनकी उपस्थिति सिर्फ तीन दिन की रही, उन्होंने राज्यसभा में ना तो कोई सवाल पूछा ना ही किसी बहस में हिस्सा लिया। हालांकि रेखा का रिकॉर्ड इस मामले में सचिन के मुकाबले थोड़ा मजबूत है वे 7 दिन आई हैं। अप्रैल 2012 में राज्यसभा में नामित की गईं अभिनेत्री ने न कोई सवाल पूछा है और न ही किसी चर्चा में हिस्सा लिया है। इसीलिये दोनों साथी सांसदों के निशाने पर हैं। वे केवल सांसदों के निशाने पर ही नहीं हैं बल्कि आम जनता के निशाने पर भी हैं। मामला सिर्फ रेखा और सचिन तक ही सीमित नहीं है, ऐसे कई और भी चेहरे हैं। अब मांग ये उठ रही है कि राज्यसभा में ऐसे सदस्यों को नामांकित किया जाए जो कम से कम अपने काम को गंभीरता से ले सकें, जो संसद को पूरा समय दें, जो संसद में आएं और सत्र में कुछ बोलें। अपने अनुभव बांटें और अपने क्षेत्र या राष्ट्र की समस्याओं को सरकार के सामने रखें। हालांकि सचिन तेंदुलकर ने इस बवाल के बाद कहा कि उनके बड़े भाई की बाईपास सर्जरी हुई और इसी वजह से वे संसद नहीं आ सके।
 
संसद देश की सर्वोच्च संस्था है। सांसद देश की संसद का सम्मान करते हैं या नहीं, यह गहराई से सोचने की बात है। सांसद सरकार से सुख−सुविधा प्राप्त करें, यह बहुत गौण बात है। प्रमुख काम है देश के सामने आने वाली समस्याओं का डटकर मुकाबला करना। अपना समुचित प्रतिनिधित्व करते हुए देश को प्रगति की ओर अग्रसर करना, उसे सशक्त बनाना। लेकिन ऐसा न होना दुर्भाग्यपूर्ण है, लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को कमजोर करना है। संसद देश को उन्नत भविष्य देने का मंच है। सरकार इस पर जनता की गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च करती है। इसका अर्थ है कि लोकसभा सत्र में भाग लेने वाले दिनों में भत्ते सहित प्रत्येक लोकसभा सांसद पर करीब 270,000 रुपए का मासिक खर्च होता है। जब संसद सत्र चल रहा होता है, तब सांसदों को प्रतिदिन 2,000 रुपए का दैनिक भत्ता भी मिलता है। हालांकि इस पूरे मामले में अन्य भत्ते जैसे कि मुफ्त आवास, चिकित्सा देखभाल, यातायात और दूरसंचार सुविधाएं शामिल नहीं हैं। सत्र के दौरान संसद चलाने में सरकारी खजाने से प्रत्येक मिनट 250,000 रुपए का खर्च लगता है। इसलिये संसद का प्रति क्षण तभी कारगर, उपयोगी एवं संतोषजनक हो सकता है जब चुना हुआ या मनोनीत प्रत्येक सदस्य अपनी प्रभावी एवं सक्रिय भागीदारी निभाये।
 
देश जल रहा हो और नीरो बंशी बजाने बैठ जाये तो इतिहास उसे शासक नहीं, विदूषक ही कहेगा। ठीक वैसा ही पार्ट आज की अति संवेदनशील स्थितियों में सांसद अदा कर रहे हैं। चाहिए तो यह है कि आकाश भी टूटे तो उसे झेलने के लिये सात सौ नब्बे सांसद एक साथ खड़े होकर अमावस की घड़ी में देश को साहस एवं उजाला दें। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है, यह विडम्बनापूर्ण है। हर दिन किसी न किसी विषय पर विवाद खड़ा कर संसद का कीमती समय गंवाया जा रहा है। महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर सार्थक चर्चा की बजाय हो−हल्ला करके संसद की कार्रवाही को स्थगित करने का प्रचलन चल रहा है। कोई भी नहीं सोच रहा है कि इन स्थितियों में देश कहां पहुंचेगा? यह कर्तव्य−च्युति, असंसदीय गतिविधियां क्या संसदीय इतिहास में एक काली रेखा नहीं होगी? निश्चित ही सांसदों की गैर−जिम्मेदाराना हरकतों से संसद अपने कर्तव्य से चूक रही है।
 
देश का भविष्य संसद एवं सांसदों के चेहरों पर लिखा होता है। यदि वहां भी अनुशासनहीनता, अशालीनता एवं अपने कर्त्तव्यों के प्रति अरुचि का प्रदर्शन दिखाई देता है तो समझना होगा कि सत्ता सेवा का साधन नहीं, बल्कि विलास का साधन है। यदि सांसद में विलासिता, आलस्य और कदाचार है तो देश को अनुशासन का पाठ कौन पढ़ायेगा? आज सांसदों की अनुपस्थिति के परिप्रेक्ष्य में इस विषय पर भी चिन्तन होना चाहिए कि जो वास्तविक रूप में देश के लिये कुछ करना चाहते हैं, ऐसे व्यक्तियों को संसद के पटल पर लाने की व्यवस्था बने। कोरा दिखावे न हो, बल्कि देश को सशक्त बनाने वाले चरित्रसम्पन्न व्यक्ति राज्यसभा में जुड़ें, इसके लिये नये चिन्तन की अपेक्षा है। हर कीमत पर राष्ट्र की प्रगति, विकास−विस्तार और समृद्धि को सर्वोपरि महत्व देने वाले व्यक्तित्वों को महत्व मिले, जो संसद के हर क्षण को निर्माण का आधार दे सकें।
 
- ललित गर्ग

रहना है हर खबर से अपडेट तो तुरंत डाउनलोड करें प्रभासाक्षी एंड्रॉयड ऐप



Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his/her private capacity and do not necessarily reflect the opinions, beliefs and viewpoints of Prabhasakshi and do not in any way represent the views of Prabhasakshi.

शेयर करें: