Prabhasakshi
शुक्रवार, मई 25 2018 | समय 19:52 Hrs(IST)

स्तंभ

जलियांवाला कांड के दोहराव जैसी थी हाशिमपुरा की त्रासदी

By कुलदीप नैय्यर | Publish Date: May 31 2017 12:45PM

जलियांवाला कांड के दोहराव जैसी थी हाशिमपुरा की त्रासदी
Image Source: Google

 ह शिमपुरा की त्रासदी 1984 के सिख विरोधी दंगों जितनी ही गहरी है। दोनों अल्पसंख्यक समुदायों ने अपने घावों को भरने की इजाजत नहीं दी है क्योंकि ये उन्हें उस समय हुए नरसंहारों की याद दिलाते रहते हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस की प्रोविंसियल आर्म्ड कोंस्टाबुलारी (पीएसी) इस इंतजार में है कि मामला आज न कल शांत हो जाएगा और राष्ट्र इसे इतिहास का काला पन्ना मानकर आगे चल पड़ेगा। 

मुझे सब कुछ अच्छी तरह याद है। यह मई की आखिर का एक दिन था जब मैं नरसंहार के कारण 1987 में मेरठ गया। लौटते वक्त शहर के बाहर कुछ लोगों ने मुझे रोका और हाशिमपुरा मुहल्ले की की ओर इशारा किया। उनका कहना था कि इस जगह पीएसी ने 42 मुसलमानों की जानबूझ कर, खुलेआम हत्या की है। मैं स्तब्ध रह गया जब मैंने नहर और हिंडन नदी में कुछ लाशें तैरतीं पायीं। लोगों ने बताया कि यह सुनियोजित हत्या थी। 
 
कहानी यह है कि सेना और पुलिस ने मेरठ के मुस्लिम−बहुल हाशिमपुरा मोहल्ले से लोगों के एक समूह को पकड़ लिया और उसे पीएसी के हवाले कर दिया। इसमें से एक ट्रक को नहर किनारे ले जाया गया और लोगों को नजदीक से गोली मार दी गई। शायद आजाद भारत में पुलिस हिरासत में हुए सबसे बड़े नरसंहारों से यह एक था और इसमें 42 लोग मारे गए। लेकिन 30 साल पहले की उस तनाव भरी दुपहरी से पहले हुर्इ घटनाओं पर गहरी नजर डालने से इस नरसंहार के पीछे के उद्देश्यों के कुछ उन पहलुओं की झलक मिलती है जो ज्यादातर रिपोर्ट नहीं हुई हैं।
 
घटना के पीछे के उद्देश्यों को लेकर आम राय वही है जिसका उल्लेख उत्तर प्रदेश पुलिस की चार्जशीट में है। इसमें कहा गया है कि उस दिन पीएसी पर हमला किया गया था और उनकी दो रायफलें छीन ली गई थीं। चार्जशीट के मुताबिक, ''इसके बाद, 22 मई 1987 को अवैध हथियार बरामद करने के लिए हाशिमपुरा में खोज शुरू की गई।'' लेकिन एक और पहलू था, जिसका भी चार्जशीट में जिक्र है। इसकी ज्यादा तहकीकात नहीं की गई। यह पहलू था प्रभात कौशिक नामक युवक की मौत जो अचानक आर्इ गोली लगने से उस समय हुई जब वह हाशिमपुरा मोहल्ले से सटे एक मकान की छत पर खड़ा था।
 
विशेषज्ञों ने, जिसमें कुछ पुलिस कर्मचारी भी शामिल हैं, इस घटना को भारत में पुलिस हिरासत में होने वाली हिंसा की सबसे बुरी घटनाओं में से एक बताया है। सुनवाई 1996 में जाकर शुरू हुई और कुछ ही साल पहले सत्र न्यायालय ने फैसला दिया और सभी अभियुक्तों को सभी अपराधों से बरी कर दिया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं की राय में यह न्याय की विफलता है।
 
स्वाभाविक है कि जिंदा बचे या मारे गए लोगों के रिश्तेदारों की प्रतिक्रिया भी वही थी जिसकी उम्मीद की जा सकती थी क्योंकि फैसला देने में 28 साल लगाया गया और सभी अभियुक्तों को छोड़ दिया गया। बहुत सारे परिवारों को यह उम्मीद नहीं है कि कुछ नया होगा और वे कहते हैं कि जांच में लापरवाही हुई।
 
वास्तव में, मेरठ के तत्कालीन सुपरिटेंडेंट आफ पुलिस विभूतिनारायण राय ने घटना पर एक किताब लिखी है जिसमें उन्होंने कहा है, ''मुझे यह महसूस करने में पांच−छह साल लग गए कि मेरा यह विश्वास कि हत्यारों को कठोर सजा मिलेगी, महज एक विश्वास ही था। जैसे−जैसे समय आगे बढ़ा, यह साफ हो गया कि भारतीय शासन दोषियों को सजा देने में कोर्इ दिलचस्पी नहीं रखता। शासन के सभी हिस्सेदार अपनी जिम्मेदारियों से बच रहे थे, और उसे पूरा नहीं कर रहे थे। कइयों ने अपने को आपराधिक लापरवाही के पीछे छिपा लिया। और यह उनके काम आया।''
 
रिपोर्ट बताती हैं कि आज भी हाशिमपुरा में रहने वाले उस दिन की घटना से आहत हैं और कहते हैं कि पीएसी संगठित थी और योजना बना कर आई थी। यह क्षेत्र यू−आकार का है और यहां से लोगों का भागना कठिन है। हथकरघा की आवाज यहां की रोज की जिंदगी का हिस्सा है। ज्यादातर मकान खराब हालत में हैं और उनके रंग उजड़ गए हैं। मानो लोगों को अच्छी जिंदगी की उम्मीद नहीं रह गई है।
 
यह हमें जालियांवाला बाग हादसे की याद दिलाता है जिसमें 1500 निर्दोष लोग चहारदीवारी के भीतर मार दिए गए थे (राजकमुार फिलिप जब घटना के बाद अपनी पत्नी, महारानी के साथ जालियांवाला बाग आए तो उनकी टिप्पणी थी कि संख्या बढ़ा−चढ़ा कर बताई गई है)। बाद में, मैं जब जनरल ओडायर से मिला और उससे नरसंहार का उल्लेख किया तो उसने कोई पछतावा नहीं दिखाया।
 
हाशिमपुरा की घटना में बच गए लोगों का ब्यौरा सनुने पर हृदय फट जाता है। कुछ लोग बताते हैं कि सैंकड़ों लोगों को कई सप्ताह तक जेल में रखा गया, उनसे पूछताछ की गई और उन्हें मारा−पीटा गया क्योंकि वे मुसलमान थे। लोगों को उनके घर से घसीट कर बाहर लाया गया और पुलिस स्टेशन ले जाया गया। चश्मदीद गवाहों के मुताबिक, हत्याएं दो चरणों में की गईं− एक मुरादनगर के गंग नहर और दूसरी हिंडन पर। 
 
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों के दौरान दिल्ली में तीन हजार लोगों के मारे जाने की सरकारी घोषणा हुई थी। संख्या अधिक भी हो सकती है। अपराध करने वालों में शीर्ष कांग्रेसी भी शामिल थे। यहां तक राजीव गांधी पर भी उंगली उठी थी कि उनके निर्देश पर सेना को देर से तैनात किया गया ताकि दंगाइयों को खुली छूट मिल सके। वे मुकदमे खोले जा रहे हैं जिन्हें बंद कर दिया गया था। लेकिन किसी को अब तक सजा नहीं मिली है। अधिकारियों की मिली भगत के कारण सबूत मिटाने दिया गया।
 
1984 के दंगों के बहुत से पीड़ित अभी भी पुनर्वास पाने की कोशिश में हैं। हाशिमपुरा में भी कोई अंतर नहीं है। हादसे से बचे लोग सामान्य जीवन के लिए अभी भी संघर्ष कर रहे हैं। नाउम्मीदी के बीच भी उम्मीद है कि दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित याचिका पर उन्हें आज न कल न्याय मिलेगा।
 
मेरा अनुभव है कि हादसा कुछ समय तक लोगों के सामने रहता है। फिर यह पृष्ठभूमि में चला जाता है। एक और हादसा होता है तो अतीत फिर से जिंदा हो जाता है। कोर्इ स्थायी समाधान दिखाई नहीं देता। मैं असंख्य दंगों का मूक गवाह हूं जिसमें पुलिस की मिलीभगत साफतौर पर है।
 
हाशिमपुरा को रोका जा सकता है अगर दोनों समुदाय यह महसूस करें कि उनके बीच की दुश्मनी से देश का बंटवारा हुआ। इसे दोहराया नहीं जा सकता, लेकिन लगातार दुश्मनी एक से दूसरी चीज की ओर ले जाएगा और देश के मूल्यों− सेकुलरिज्म और लोकतंत्र को नष्ट करेगा। यह कोशिश होनी चाहिए कि देश का अल्पसंख्यक समुदाय अपने को बराबर का भागीदार महसूस करे और वह संविधान से मिले उन अधिकारों का उपभोग करे जो इसने सभी नागरिकों को दिए हैं।  
 
- कुलदीप नैय्यर

रहना है हर खबर से अपडेट तो तुरंत डाउनलोड करें प्रभासाक्षी एंड्रॉयड ऐप



Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his/her private capacity and do not necessarily reflect the opinions, beliefs and viewpoints of Prabhasakshi and do not in any way represent the views of Prabhasakshi.