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समझ से परे है मोदी सरकार की पाकिस्तान नीति

By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Publish Date: May 8 2017 11:47AM

समझ से परे है मोदी सरकार की पाकिस्तान नीति
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भारत की पाकिस्तान-नीति क्या है, कुछ समझ में नहीं आता। भारत के दो फौजियों के सिर काट लिए गए लेकिन, भारत सरकार की प्रतिक्रिया इतनी ठंडी है कि वह है भी या नहीं, यह जानना ही मुश्किल हो रहा है। सरकारी प्रवक्ता के चलताऊ बयान और पाकिस्तानी उच्चायुक्त को दिए गए औपचारिक पत्र की तुलना जरा आम जनता के गुस्से से कीजिए। इन शहीद जवानों की अंत्येष्टि में शामिल हुए हजारों लोगों से पूछिए। शहीदों के परिवारों पर क्या गुजर रही है और वे क्या मांग कर रहे हैं, क्या इसका पता नेताओं को है? क्या हमारे नेताओं को इस बात का जरा भी अंदाजा है कि नियंत्रण-रेखा पर गश्त दे रहे हमारे जवानों का मनोबल कितना गिर रहा है? पिछले सात माह में ऐसी तीन घटनाएं हो चुकी हैं। भारत के फौजी जवानों का खून खौल रहा है लेकिन, वे क्या करें? उन्हें अपने फैसले खुद करने का अधिकार नहीं है। वे हरी झंडी का इंतजार कर रहे हैं।

फौज को हरी झंडी दे देने का अर्थ यह नहीं कि वह पाकिस्तान पर हमला कर दे। लेकिन, इतना तो हो ही सकता है कि यदि ईंट का जवाब पत्थर से न दिया जाए तो न सही, ईंट से तो दिया ही जाए। ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का ढोल पीटने वाले नेताओं से देश पूछ रहा है कि यदि आपने सचमुच सर्जिकल स्ट्राइक की होती तो क्या पाकिस्तानी फौजियों की इतनी हिम्मत पड़ती कि वे भारत की सीमा का हर हफ्ते कई बार उल्लंघन करते? वे बार-बार भारतीय फौजियों के सिर काटकर ले जाते? वे भारतीय सैन्य-शिविरों पर बार-बार हमला करते? सर्जिकल स्ट्राइक के बाद उसी स्थान पर आतंकियों के शिविरों की संख्या 35 से बढ़कर 55 कैसे हो गई? इजरायल ने 1967 में मिस्र पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की थी। अब उसे 50 साल पूरे हो रहे हैं। क्या आपने सुना कि उसके बाद मिस्र ने कभी इजरायल में घुसपैठ की, कभी हमला किया, कभी आतंकी भेजे? भारत सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक का इतना ढिंढौरा पीटा लेकिन, आज तक उसका एक भी प्रमाण पेश नहीं किया, जबकि पाकिस्तान ने अमेरिकी और यूरोपीय पत्रकारों को ले जाकर वे सब स्थान दिखाए, जिन्हें नष्ट करने का दावा भारत सरकार ने किया था। अब भी पाकिस्तानी सरकार दावा कर रही है कि उसके फौजियों ने हमारे जवानों के सिर नहीं काटे। यह खबर झूठी है। पाकिस्तान के इस दावे में जरा भी दम नहीं है लेकिन, भारत सरकार ने देश की जनता और दुनिया के देशों को पाकिस्तानी फौज की बर्बरता से परिचित कराने के लिए क्या किया? पाकिस्तान के नेताओं और सेनापति से हमारे नेताओं ने अभी तक फोन पर सीधी बात क्यों नहीं की?
 
किसी फौजी का सिर काट लेना या उसके शव को क्षत-विक्षत करना अंतरराष्ट्रीय कानून के भी विरुद्ध है। मरे हुए को मारना इंसानियत का घोर अधःपतन है। यह इस्लामी सिद्धांतों का भी उल्लंघन है। इस मामले को संयुक्त राष्ट्र और मानव अधिकार संगठन में ले जाया जाना चाहिए था। सारे इस्लामी और गैर-इस्लामी देशों को पाकिस्तानी फौज की इस बर्बरता से अवगत करवाया जाना चाहिए था लेकिन, फौजी तो फौजी, कूटनीतिक मोर्चे पर भी भारत सरकार किंकर्तव्यविमूढ़ दिखाई पड़ रही है। भारत सरकार कहीं इस दुविधा में तो नहीं है कि वह यदि पाकिस्तानी फौज के खिलाफ कुछ कार्रवाई करेगी तो मियां नवाज़ शरीफ की मुसीबतें बढ़ जाएंगी। पहले ही पनामा पेपर्स की वजह से शरीफ की हालत खस्ता हो रही है। हालांकि पाक-सुप्रीम कोर्ट ने सारे मामले पर जांच बिठा दी है। इससे शरीफ को कुछ राहत जरूर मिली है लेकिन, आज वे इस हालत में नहीं हैं कि वे अपनी फौज पर लगाम लगा सकें। फौज के दिल की बात ही पाक प्रवक्ता अपने मुंह पर लाए रहते हैं। वे कहते हैं कि भारत सरकार अपने जवानों के सिर काटने की बात इसीलिए फैला रही है कि वह कश्मीर की बगावत से अपनी जनता का ध्यान हटाना चाहती है। ऐसी मूर्खतापूर्ण बात पाक-फौज ही कर सकती है। दुनिया की कौन-सी फौज है, जो अपने ही जवानों के सिर काटने का घिनौना काम करेगी? भारत-जैसे लोकतंत्र में फौज वैसी स्वेच्छाचारी नहीं हो सकती, जैसी कि वह पाकिस्तान में है। यहां एक प्रश्न यह भी दिमाग में कौंधता है कि ऐसे नाजुक मामले में दोनों देशों के सेनापति सीधी बातचीत क्यों नहीं करते?
 
जिस घटना का सीधा असर करोड़ों लोगों की भावना पर हो रहा है, उसे दो जवानों की मौत कहकर दरी के नीचे सरकाया नहीं जा सकता। जन-आक्रोश पर ध्यान देते हुए ही विदेश मंत्रालय ने भारत-दर्शन के लिए आए हुए पाकिस्तानी छात्रों को तुरंत ही वापस लौट जाने के लिए प्रेरित किया। इस फौजी बर्बरता ने जितना गुस्सा पाकिस्तान के विरुद्ध पैदा किया है, उतना ही मोह-भंग मोदी सरकार से भी किया है। ढाई साल पहले अपनी पाकिस्तान-यात्रा के दौरान मैंने पाकिस्तान के सर्वोच्च नेताओं, फौजियों और नीति-निर्माताओं के सामने नए प्रधानमंत्री की जो इस्पाती छवि पेश की थी, उस पर काई का थक्का-सा जमता लग रहा है। भारत की जनता भी समझ नहीं पा रही है कि हमारे विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री क्या कर रहे हैं? उस 56 इंच के सीने का क्या हुआ, जिसकी हुंकार सुनकर ढाई साल पहले पाकिस्तान की नींद हराम हो रही थी। जनवरी 2013 में जो सुषमा स्वराज एक सिर के बदले दस सिर काट लाने की बात कर रही थीं, अब वे बात करना ही क्यों भूल गईं? विदेश नीति के मामले में जिस गहरी सोच, दूरदर्शिता और दृढ़ता की जरूरत होती है, वह अनुपस्थित दिखाई दे रही है। वरना क्या वजह थी कि तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन कश्मीर के मामले में अपनी टांग अड़ाने की घोषणा कर गए? वे सुरक्षा परिषद में भारत के साथ-साथ पाकिस्तान को भी बिठाने की वकालत कर गए। चीन तो हर मामले में पाकिस्तान की पीठ थपथपा रहा है लेकिन, ट्रम्प को क्या हुआ है? अमेरिका ने कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी?
 
पाकिस्तान के मामले में सरकार आज जितनी हतप्रभ है, कश्मीर के मामले में भी उतनी ही ठप हो गई है। वह कश्मीर को सिर्फ ‘आतंकवाद का मसला’ कहकर छुट्‌टी पाना चाहती है। उसे समझ नहीं पड़ रहा कि पत्थरफेंकू नौजवानों से कैसे निपटें, अलगाववादियों से बात करें या न करें। सरकार के पास योग्य और अनुभवी लोगों का टोटा है, जो उसको मार्गदर्शन और सलाह दे सकें। पाकिस्तानियों और कश्मीरियों से अंदरूनी बात करने के लिए मोदी सरकार को तुरंत ही एक समानांतर गोपनीय चैनल कायम करना चाहिए, वरना ये शेष दो-ढाई साल भी रोते-गाते निकल जाएंगे।
 
- डॉ. वेदप्रताप वैदिक 

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