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समसामयिक

अमेरिका में नाच-गाना तो है लेकिन संस्कृति नहीं है, इसलिए हिंसा बढ़ रही

By ललित गर्ग | Publish Date: Oct 7 2017 12:55PM

अमेरिका में नाच-गाना तो है लेकिन संस्कृति नहीं है, इसलिए हिंसा बढ़ रही
Image Source: Google

आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि यहां हिंसा इतनी सहज बन गयी है कि हर बात का जवाब सिर्फ हिंसा की भाषा में ही दिया जाता है। देश एवं दुनिया में हिंसा का परिवेश इतना मजबूत हो गया है कि आज अपने ही घर में हम इतने असुरक्षित हो गए हैं कि हर आहट पर किसी आतंकवादी हमले या फिर किसी सिरफिरे व्यक्ति की सनक से किसी बड़ी अनहोनी का अंदेशा होता है। आस्थाएं एवं निष्ठाएं इतनी जख्मी हो गयीं कि विश्वास जैसा सुरक्षा-कवच मनुष्य-मनुष्य के बीच रहा ही नहीं। साफ चेहरों के भीतर कौन कितना बदसूरत मन समेटे है, कहना कठिन है। अमेरिका की हथियारों की होड़ एवं तकनीकीकरण की दौड़ पूरी मानव जाति को ऐसे कोने में धकेल रही है, जहां से लौटना मुश्किल हो गया है। अब तो दुनिया के साथ-साथ अमेरिका स्वयं ही इन हथियारों एवं हिंसक मानसिकता का शिकार है।

अमेरिका के लास वेगास में अंधाधुंध गोलीबारी की घटना के पीछे अभी तक किसी आतंकी समूह के होने की बात सामने नहीं आई है। गौरतलब है कि वेगास स्ट्रिप में एक संगीत समारोह के दौरान वहां बीस हजार से ज्यादा लोग मौजूद थे और वहीं पास के एक होटल की बत्तीसवीं मंजिल पर स्थित कमरे से स्टीफन पैडॉक नाम के एक व्यक्ति ने लगातार गोलीबारी की, एक ऐसा खूनी खेल खेला जिससे पूरी मानवता कांप उठी। इस घटना में साठ लोगों की मौत हो गई और पांच सौ से ज्यादा घायल हुए। जब तक पुलिस अधिकारी उस तक पहुंचते, तब तक उसने खुद को खत्म कर लिया। जाहिर है, इसके बाद यह पता लगाना ज्यादा मुश्किल हो गया है कि हमला किसी आतंकी साजिश का नतीजा था या फिर एक सिरफिरे व्यक्ति ने अपनी सनक में इतने लोगों को मार डाला। जिस कमरे से उसने हमला किया था, वहां से दस राइफलों के साथ-साथ उन्हें स्वचालित करने वाली तकनीक भी बरामद होना भले ही सुनियोजित साजिश की ओर संकेत करता है। लेकिन संभावना यह भी है कि अमेरिका आज दुनिया में अपराध का सबसे बड़ा अड्डा है और हिंसा की जो संस्कृति उसने दुनिया में फैलाई, आज वह स्वयं उसका शिकार है।
 
लास वेगास जैसी घटनाएं, कमोबेश, अमेरिका में अक्सर होती रहती हैं। जाहिर है कि यह इस्लामी आतंकवाद की घटना नहीं थी, तो फिर यह क्या थी? यह ऐसा सवाल है, जो अमेरिकी सभ्यता को बेनकाब कर देता है। स्टीफन पेडॉक नामक इस गोरे ने इतने लोगों की जान क्यों ली? क्या यह अमेरिका की भौतिकतावादी संस्कृति की निष्पत्ति है? यदि पेडॉक जिंदा पकड़ा जाता तो अनेक प्रश्नों के उत्तर मिल जाते, अब तो अंधेरे में तीर ही चलाये जायेंगे। लेकिन यह निश्चित है कि आस्था का गहरापन, एकाग्रता एवं मानवीयता के अभाव में व्यक्ति बहुत जल्दी भटक जाता है, कुछ मीलों चलकर ही थक जाता है। पेडॉक के साथ भी ऐसा ही हुआ। वह कोई गरीब आदमी नहीं था। उसका अपना हवाई जहाज है, अपना मकान है, अच्छी-खासी नौकरी भी रही है। तो क्या वजह हो सकती है, उसकी इस पशुता की? उसकी इस क्रूरता की? उसकी इस हिंसक मानसिकता की? ‘मन जो चाहे वही करो’ की मानसिकता वहां पनपती है जहां इंसानी रिश्तों के मूल्य समाप्त हो चुके होते हैं, जहां व्यक्तिवादी व्यवस्था में बच्चे बड़े होते-होते स्वछन्द हो जाते हैं।
 
‘मूड ठीक नहीं’ की स्थिति में घटना सिर्फ घटना होती है, वह न सुख देती है और न दुःख। ऐसी स्थिति में आदमी अपनी अनंत शक्तियों को बौना बना देता है। यह दकियानूसी ढंग है भीतर की अस्तव्यस्तता को प्रकट करने का। ऐसे लोगों के पास सही जीने का शिष्ट एवं अहिंसक सलीका नहीं होता। वक्त की पहचान नहीं होती। ऐसे लोगों में मान-मर्यादा, शिष्टाचार, संबंधों की आत्मीयता आदि का कोई खास ख्याल नहीं रहता। भौतिक सुख-सुविधाएं ही जीवन का अंतिम लक्ष्य बन जाता है। अमेरिकी नागरिकों में इस तरह का एकाकीपन उनमें गहरी हताशा, तीव्र आक्रोश और विषैले प्रतिशोध का भाव भर रहा है। वे मानसिक तौर पर बीमार हो जाते हैं और इस तरह के हत्याकांड कर बैठते हैं। 
 
अमेरिका संस्कृतिविहीन देश बनता जा रहा है- भौतिक विकास एवं शस्त्र संस्कृति पर सवार है यह राष्ट्र। वहां के नागरिक अपने पास जितने चाहें, उतने शस्त्र रख सकते हैं। कुछ जगहों शस्त्रों के लाइसेंस की भी जरूरत नहीं होती। अमेरिका में बहुत कम घर ऐसे हैं, जिनमें बंदूक या पिस्तौल न हो। अमेरिका की यह शस्त्र-संस्कृति उसके जन्म के साथ जुड़ी हुई है। इसी शस्त्र संस्कृति पर वह समृद्ध बना है, दुनिया पर उसने हुकूमत की है। आज वही हिंसक शस्त्र संस्कृति उसके स्वयं के लिये भारी पड़ रही है। इसी प्रकार जो देश और समाज सांस्कृतिक मूल्यों, आध्यात्मिक परम्पराओं एवं मानवीय रिश्तों को भूल जाता है, वह नष्टप्रायः हो जाता है। स्थिति यह भी विस्फोटक होती है पर उसका विस्फोट जब दिखाई देता है तो भयावह होता है, काफी देर हो चुकी होती है।
 
असल में अमेरिका संस्कृतिविहीन है। क्योंकि नाच-गाना आदि सांस्कृतिक कार्यक्रम हैं, संस्कृति नहीं है। कला, पेंटिंग, साहित्य आदि भी संस्कृति नहीं है बल्कि सांस्कृतिक पक्ष हैं। वे संस्कृति को समझने के माध्यम हैं। संस्कृति तो हमारी प्राणवायु है। साहित्य, संगीत, इतिहास और दर्शन में ही नहीं वेशभूषा, खान-पान, उठने-बैठने और बोलने-बतियाने के ढंग से भी वह झलकती रहती है। किसी का पारिवारिक व्यवहार कैसा है। गुरु, माता, पिता, पत्नी के प्रति वह आदर, करुणा, दया एवं आत्मिक सम्बन्धों के तहत साक्षात्कार करता है या नहीं? उत्तर नकारात्मक है तो समझना चाहिए कि उसमें जानवर विद्यमान है। ऐसा व्यक्ति किसी का प्रिय नहीं हो सकता। जिसमें संस्कृति नहीं जीती, वह सभ्य नहीं है। 
 
हम कितने ही शिक्षित हो जाएं, पर एक टिकट के लिए भीड़ में कितना गुत्थम-गुत्था हो जाते हैं। नाली में पड़ा रुपया उठा लेंगे, मेज पर पड़ी पुस्तक नहीं। वर्तमान भौतिकतावादी व्यवस्था में सत्ता के लिए जो छीना-झपटी चल रही है, उसमें संस्कृति पीछे धकेली जा रही है। अमेरिका दुनिया पर आधिपत्य स्थापित करने एवं अपने शस्त्र कारोबार को पनपाने के लिये जिस अपसंस्कृति को उसने दुनिया में फैलाया है, उससे पूरी मानवता कराह रही है, पीड़ित है। अमेरिका ने नई विश्व व्यवस्था (न्यू वर्ल्ड आर्डर) की बात की है, खुलेपन की बात की है लगता है ”विश्वमानव“ का दम घुट रहा है और घुटन से बाहर आना चाहता है। विडम्बना देखिये कि अमेरिका दुनिया का सबसे अधिक शक्तिशाली और सुरक्षित देश है लेकिन उसके नागरिक सबसे अधिक असुरक्षित और भयभीत नागरिक हैं। वहां की जेलों में आज जितने कैदी हैं, दुनिया के किसी भी देश में नहीं हैं। ऐसे कई वाकये हो चुके हैं कि किसी रेस्तरां, होटल या फिर जमावड़े पर अचानक किसी सिरफिरे ने गोलीबारी शुरू कर दी और बड़ी तादाद में लोग मारे गए।
 
2014 में अमेरिका में हत्या के कुल दर्ज करीब सवा चौदह हजार मामलों में 68 फीसद में बंदूकों का इस्तेमाल किया गया था। खुद सरकार की ओर से कराए गए एक अध्ययन में यह तथ्य सामने आया था कि अमेरिका में सत्रह साल से कम उम्र के करीब तेरह सौ बच्चे हर साल बंदूक से घायल होते हैं। ब्रिटिश अखबार ‘गार्जियन’ का आकलन है कि अमेरिका में वर्ष 2013 से लेकर अब तक सरेआम गोलीबारी की ऐसी वारदातों में 1700 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और 6500 से अधिक घायल हुए हैं। हथियारों के प्रति अमेरिका जैसी महाशक्ति की उदारता खुद उसके समाज के लिए घातक साबित हो रही है, बंदूक संस्कृति तो लहूलुहान भी कर रही है। यह बेवजह नहीं है कि लास वेगास की घटना को भी वहां बंदूक रखने के गैरजरूरी शौक से होने वाले नुकसान से जोड़ कर देखा जा रहा है। हालांकि वहां हथियार रखने के शौक का विरोध भी होता रहा है। लेकिन इसे अब तक नियंत्रित नहीं किया जा सका है। अमेरिकी प्रशासन को ‘बंदूक संस्कृति’ ही नहीं बल्कि हथियार संस्कृति पर भी अंकुश लगाना होगा, अन्यथा इस तरह के खूनी खेल एवं हिंसक घटनाएं बार-बार त्रासदी बनकर कहर ढाती रहेगी। अब तो दुनिया को जीने लायक बनने दो।
 
- ललित गर्ग

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