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समसामयिक

बेहतर बाल साहित्य नहीं तभी तो गैजेट्स से खेलते हुए बढ़ रहे हैं बच्चे

By कौशलेंद्र प्रपन्न | Publish Date: Jan 3 2018 3:00PM

बेहतर बाल साहित्य नहीं तभी तो गैजेट्स से खेलते हुए बढ़ रहे हैं बच्चे
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साल भर साहित्य की विभिन्न विधाओं में पुस्तकें खूब लिखी और छापी जाती हैं। इसका उदाहरण है हर साल हज़ारों किताबें छपती और पाठकों के हाथों में आती हैं। कुछ की समीक्षाएं पत्र−पत्रिकाओं में प्रकाशित भी होती हैं। इससे मालूम चलता है कि किस लेखक की कौन सी कविता, कहानी, उपन्यास आदि की किताबें इस वर्ष आईं। साहित्य दरअसल कई आयामों पर हमारे साथ चलता है। दूसरे शब्दों में साहित्य न केवल भाषायी संपदा में बढ़ोत्तरी करता है बल्कि माना जाता है कि वह पाठकों की संवेदना भी बरकरार रखने में मदद करता है। वहीं बच्चों के साथ साहित्य जब जुड़ता है तब साहित्य का मकसद और व्यापक हो जाता है। भाषाविदों और बाल मनोवैज्ञानिकों एवं बाल कथाकारों का मानना है कि साहित्य से बच्चों में कल्पनाशीलता और सृजनशीलता का विकास होता है। यदि कल्पनाशीलता और सृजनात्मक शक्ति में साहित्य मदद करता है तब तो यह दरपेश हो जाता है कि बाल साहित्य की पड़ताल की जाए।

 
आखिर बाल साहित्य किस प्रकार का लिखा जा रहा है और किस प्रकार की बाल कहानियां और बाल कविताएं प्रकाशित हो रही हैं यह जानने के लिए इस दुनिया की यात्रा की जाए। बाल कहानियां और बाल कविताएं दूसरे शब्दों में बाल साहित्य की दुनिया में प्रवेश करना चाहते हैं तो हमारे पास इस भूगोल का मानचित्र लगभग अस्पष्ट सा है। क्योंकि कुछ विद्वानों का मानना है कि बाल कविताएं, बाल कहानियां नैतिक मूल्य, शिक्षा, समाज की चेतना को विकसित करने वाल होनी चाहिए आदि। वहीं आधुनिक और शैक्षिक विमर्शकारों की मानें तो कहानियां आत्मतोष और कल्पनाशीलता को बढ़ाने वाली तो हों ही साथ ही बच्चों में यथार्थ की समझ और तर्कशीलता में मदद करने वाली होनी चाहिए आदि। इन दो पाटन के बीच में बच्चे कहानियों से रू ब रू होते रहे हैं।
 
हर साल साहित्य की विभिन्न विधाओं में प्रकाशित कविता, कहानी, उपन्यास, डायरी आदि की खबर अखबारों, पत्रिकाओं में पढ़ने को मिला करती हैं। इस साल भी कुछ अखबारों में ऐसे लेख प्रकाशित किए गए। हाल में प्रसिद्ध लेखक, पत्रकार पंकज चतुर्वेदी का फोन आया कि बच्चों की किताबों के लेखक, प्रकाशक और कवर पेज उनके साथ साझा करूं। मैंने भी अपनी पूरी कोशिश की कि कुछ बाल किताबों का खंगाल सकूं और पंकज जी की मदद करूं। लेकिन अफसोस कि मैं ऐसा करने में सफल नहीं हो सका। तमाम प्रकाशकों की पुस्तक कैटलॉग छान मारा लेकिन दो चार किताबों के बाद सन्नाटा पसरा मिला। हालांकि पूरे साल बाल कविताओं, बाल कहानियां, बाल उपन्यास आदि पर नज़र रखता रहा हूं। इन सब के बावजूद मेरा हाथ खाली ही रहा। मैं सोचता हूं क्या यह मेरी हार थी? क्या यह मेरी व्यक्तिगत असफलता थी? जब इस सवाल को समग्रता में देखता और महसूसता हूं तो एक गहरे विमर्श में डूबता चला जाता हूं कि हम अपने बच्चों को किस प्रकार की साहित्यिक दुनिया सौंपने का दंभ भर रहे हैं। वह कौन सा साहित्य है जो बच्चों को अपनी ओर लुभाने वाला है।
 
इसमें कोई दो राय नहीं कि हम सब का बचपन कोई न कोई बाल पत्रिकाओं को उलटते पलटते बीता है। कभी साबू, चाचा चौधरी, फैंटम आदि पढ़ते हुए स्कूली किताबों को पीछे धकियाते हुए हमने इन पत्रिकाओं को पढ़ा है वहीं आज हमारे बच्चे टैब, फोन में स्क्रीन को सरकाते खेल में अपना वक्त गुजार रहे हैं। इन ऑनलाइन व स्मार्ट फोन में कैद गेम्स में बच्चों की सृजनात्मकता कितनी बढ़ती है, मालूम नहीं किन्तु हमारे बच्चे हिंसक जरूर हो रहे हैं। उन्हें यदि फोन न मिले तो आसमान सिर पर उठा लेते हैं। उनके हाथों में किताबें होनी थीं लेकिन गैजेट्स की इतनी लत लग चुकी हैं कि किताबों को महज अपनी स्कूली बैगों में कैद रखा करते हैं। 
 
यदि पूछा जाए कि बाल पत्रिकाएं आपने देखीं हैं? क्या नाम बता सकेंगे? दो तीन चार से आगे हमारी याददाश्त शायद मदद न कर सके। नंदन, चंपक, बाल हंस, चकमक से आगे न बढ़ पाएं। जबकि देशभर से कई बाल पत्रिकाओं का सफल प्रकाशन किया जा रहा है। कम संसाधनों में ही सही किन्तु बाल साहित्य में अपनी भूमिका और जिम्मेदारी तय कर रहे हैं। एक ओर हमारा ध्यान कौशल विकास की ओर है वहीं दूसरी ओर हमारे बच्चे बिना बेहतर बाल साहित्य के बढ़ रहे हैं। बाल साहित्य सृजन में लगे कुछेक लोगों के कामों को जब नज़रअंदाज़ किया जाता है तब एक टीस उठती है कि कम से कम इनके कामों की सराहना तो की जाए।
 
हरिकृष्ण देवसरे, विभा देवसरे, दिविक रमेश, रमेश तैलंग, शेरजंग गर्ग, पंकज चतुर्वेदी, बलराम अग्रवाल, मनोहर चमोली, महेश पुनेठा, प्रकाश मनु, क्षमा शर्मा, देवेंद्र मेवाडी जैसे लोग तमाम उपेक्षाओं के बावजूद बाल साहित्य सृजन में लगे हुए हैं। इन पंक्तियों के लेखक से प्रसिद्ध शिक्षाविद और लेखक कृष्ण कुमार ने तकरीबन बीस साल पहले कहा था कि बाल लेखन क्षेत्र में सूखा पसरा है। कोई इस क्षेत्र में आना चाहता है तो उसे कम से कम अपनी पहचान बनाने में बीस एक साल तो लग ही जाते हैं। लेकिन इस क्षेत्र में बहुत कम लेखक आना चाहते हैं। लेखक ज़्यादा जल्दीबाजी में प्रसिद्ध होना चाहते हैं किन्तु बच्चों की दुनिया में उतने तेजी नहीं से प्रसिद्धि नहीं मिला करती। दम साध कर जिसने भी समय दिया है उसकी पहचान तय है। शायद यही कारण है कि वयस्कों की दुनिया को लुभाने के लिए रोज़दिन कविताएं, कहानी, उपन्यास आदि की रचना तो होती है लेकिन बाल कहानियां, कविताएं आदि कम ही लिखी जाती हैं। जो लिखी जाती हैं उन्हें प्रकाश में लाने के प्रयास शिद्दत से नहीं किए जाते हैं।
 
कुछ बाल पत्रिकाओं के बारे में जान लेने में कोई हर्ज़ नहीं है। इन पत्रिकाओं को कुछेक पाठक वर्ग तक सीमित कर देना कहीं न कहीं बाल साहित्य को कमतर कर के आंकना है। देवपुत्र, इन्दौर से निकलने वाली इस पत्रिका को देखना पढ़ना दिलचस्प है। वहीं आविष्कार पत्रिका पूरी तरह से विज्ञान की समझ और तर्कशीलता को बढ़ावा देने वाली बाल पत्रिका है। प्लूटो, दिल्ली से निकलने वाली यह पत्रिका अपनी चित्रात्मकता और कंटेट के लिए खासी प्रसिद्ध है। स्नेह यूं तो भोपाल से निकलती है कि लेकिन यह देश भर में पढ़ी जाने वाली पत्रिका है। उजाला, इंडिया लिटरेसी बोर्ड, लखनऊ से प्रकाशित होती है। यह पत्रिका खासकर नवाक्षरों और ताज़ा ताज़ा अक्षर पढ़ने वाले पाठकों के लिए है। बाल किलकारी, पटना से निकलने वाली बाल पत्रिका है जो बिहार तो बिहार पूरे राज्य से बाहर निकल कर अपने कंटेंट के लिए जानी जाती है। वहीं बाल साहित्य की धरती, ऊधमसिंह नगर, उत्तराखंड़ से प्रकाशित होने वाली पत्रिका अपने नए मिज़ाज के लिए बच्चों में पढ़ी जाती है। चकमक, भोपाल से प्रकाशित बाल पत्रिका अपने नवाचार और नए नए आलेखों, चित्रों आदि के लिए दिलचस्पी से पढ़ी जाती है। वहीं लखनऊ से प्रकाशित होने वाली प्रारम्भ पत्रिका बाल साहित्य के सरोकारों को शिद्दत से उठाती है। ये बातें कुछ उन बाल पत्रिकाओं के बारे में थी जो किसी ने किसी माध्यम से हमार बीच आने में सफल हो पाती हैं। वहीं कुछ ऐसी भी बाल पत्रिकाएं हैं जो अपनी चौहद्दी नहीं पार कर पातीं। किन्तु स्थानीय स्तर पर ही सही लेकिन बच्चों और वयस्कों में पढ़ी जाती हैं।
 
दिविक रमेश के बाल साहित्य में योगदान को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इन्होंने बाल कहानियां और बाल कविताएं प्रचुर संख्या में लिखी हैं। इनकी बाल रचनाओं का अन्य भाषाओं में अनुवाद भी उपलब्ध है। वहीं पंकज चतुर्वेदी को हरिकृष्ण देवसरे बाल कथा साहित्य पुरस्कार भी मिल चुका है। वह देशभर में विभिन्न स्थानीय भाषा−बोली के लेखक, शिक्षकों के बीच बाल कथा साहित्य सृजन कार्यशालाएं करते रहे हैं। वहीं बच्चों की किताबों की दुनिया कैसी हो, बाल किताबों का प्रकाशन और छपाई कैसी हो आदि पर इनके काम को नकारा नहीं जा सकता। रमेश तैलंग और शेरजंग गर्ग की बाल गीतों की चर्चा न की जाए तो यह पूरा विमर्श अधूरा रहेगा। इन्होंने बाल गीतों की रचना और बाल नाटकों के सृजन से बाल साहित्य को समृद्ध ही किया है। वहीं क्षमा शर्मा की बाल सृजनशीलता को भी रेखांकित किया जाना चाहिए। इन्होंने बच्चों की दुनिया को हमेशा ही सूक्ष्म नज़रों से जांचने परखने का किया है।
 
नाम तो और भी गिनाए जा सकते हैं किन्तु यहां मकसद नामों की सूची तैयार करना नहीं बल्कि बच्चों की साहित्यिक दुनिया की यात्रा करना है। बच्चों को हम किस प्रकार की साहित्यिक दुनिया प्रदान कर रहे हैं इस पर ठहर कर चिंतन करने की आवश्यकता है। वरना साहित्य और कविताएं कहानियां महज पाठ्यपुस्तकों की सामग्री तक महदूद रह जाएंगी। ऐसे समय में जब वयस्कों की रचनाएं और साहित्य की गहमा गहमी हो इसी माहौल में नेशनल बुक ट्रस्ट पिछले कुछ सालों में प्रसिद्ध लेखकों की चुनी हुई बाल कहानियों की दस दस कहानियों की श्रृंखला प्रकाशित करने की योजना पर काम कर रहा है। इसमें अमर गोस्वामी, चित्रा मुद्गल आदि शामिल हैं। वहीं देवेंद्र मेवाडी, आदीब सूरती, संजीव जैसवाल आदि बाल साहित्य में अपना योगदान दे रहे हैं। प्रकाश मनु को कोई कैसे भूल सकता है जो नंदन में रहते हुए वर्षों से बाल साहित्य सृजन, संपादन कर्म से जुड़े रहे हैं।
 
और अंत में प्रार्थना इतनी ही है कि बाल साहित्य को बचाने में लेखकों, संपादकों, पत्रकारों और कवियों आदि को आगे आना होगा। नहीं तो एक वक्त़ ऐसा भी आने वाला है जब बच्चा प्रेमचंद से निकल कर किसी और लेखक को पहचान तक न पाए। बाल साहित्य को इसलिए भी बचाने और सिरजने की आवश्यकता है क्योंकि इनमें न केवल कल्पनालोक सुरक्षित रहा करता है बल्कि इन्हें पढ़ने से बच्चों की दुनिया सृजनमना रहती है और उनमें तर्कपूर्ण चिंतन को बढ़ावा मिलता है।
 
-कौशलेंद्र प्रपन्न

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