कंपनियों की साख निर्धारित करने वाली रेटिंग एजेंसियां खुद सवालों के घेरे में

By दीपक गिरकर | Publish Date: Jan 17 2018 1:57PM
कंपनियों की साख निर्धारित करने वाली रेटिंग एजेंसियां खुद सवालों के घेरे में

क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को स्वतंत्रता और स्वायत्तता इसलिए दी गई है कि ये एजेंसियाँ किसी के दबाव में आए बिना स्वतंत्र रूप से सही रेटिंग प्रदान कर सकें। रेटिंग एजेंसियाँ रेटिंग की कार्यप्रणाली का खुलासा भी नहीं कर रही हैं।



क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने पिछले दो दशकों से निवेशकों के बीच और वित्तीय बाजार में अपनी धाक जमा रखी है। आजकल रेटिंग प्रदान करना मुनाफ़े का कारोबार बन गया है। रेटिंग उधार लेने वालों की वित्तीय हालत और बाजार की हालत पर निर्भर होती है। रेटिंग एजेंसियाँ रेटिंग देने के लिए भारी भरकम फीस लेती हैं। इन रेटिंग एजेंसियों की कार्यप्रणाली के कारण भी बैंकों के एनपीए में बढ़ोतरी हुई है। इन रेटिंग एजेंसियों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता नहीं है। ये रेटिंग एजेंसियाँ ऋण लेने वाली कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन के मूल्यांकन के आधार पर रेटिंग देती हैं जिसके तहत उधार लेने वाले की माली हालत और उधारी लौटाने की क्षमता का मूल्यांकन किया जाता है।

यदि किसी कंपनी की रेटिंग नीचे गिरती है तो उसे पूंजी की दिक्कत हो सकती है क्योंकि रेटिंग कम होने पर निवेशक कंपनियाँ निवेशों को निकालना शुरू कर देती हैं। ऐसा करने से उस कंपनी के शेयर्स की कीमत गिर जाती है और बैंक कर्ज़ की राशि पर ब्याज दर बढ़ा देते हैं। सेबी ने वर्ष 2010 में अधिक से अधिक पारदर्शिता के लिए रेटिंग एजेंसियों को रेटिंग की कार्यप्रणाली का खुलासा करने और रेटिंग में पारदर्शिता बढ़ाने के निर्देश दिए थे। सेबी के अनुसार रेटिंग एजेंसियों को साल में दो बार रेटिंग के आधारों का खुलासा करना था लेकिन रेटिंग एजेंसियाँ इनका पालन नहीं कर रही हैं।
 
रेटिंग एजेंसियों में व्यवसाय के हिसाब से क्रिसिल हमारे देश में प्रथम स्थान पर है। भारत के कुल रेटिंग व्यवसाय में क्रिसिल का लगभग 60 फीसदी हिस्सा है। भारत में क्रेडिट रेटिंग का व्यवसाय कर रही अन्य क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ हैं- आईसीआरए, केयर, इक्रा, फिच, स्मेरा। रेटिंग एजेंसी विभिन्न मापदंडों के आधार पर किसी कंपनी की एक निश्चित अवधि की साख निकालती हैं। रेटिंग एजेंसी उधार लेने वाली कंपनी की विभिन्न प्रकार की जोखिम जैसे वित्तीय, औद्योगिक, प्रबंधन इत्यादि क्षेत्रों के विभिन्न बिंदुओं पर ध्यान देकर रेटिंग निकालती हैं। क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ सामान्यत: 8 प्रकार की रेटिंग प्रदान करती हैं ये हैं- एएए अर्थात उच्चत्तम सुरक्षित, एए अर्थात उच्च सुरक्षित, ए अर्थात पर्याप्त सुरक्षित, बीबीबी अर्थात मध्यम स्तर पर सुरक्षित, बीबी अर्थात मध्य स्तर पर जोखिम चूक, बी अर्थात उच्च जोखिम चूक, सी अर्थात उच्चत्तम जोखिम चूक, डी अर्थात पूर्णरूपेण जोखिम चूक।
 


अभी कुछ दिन पूर्व ही सेबी ने क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की आज़ादी बनाए रखने के लिए कई उपायों की घोषणा की है। सेबी ने अपनी बोर्ड मीटिंग में कई अहम फ़ैसले लिए हैं। अब सेबी ने इन रेटिंग एजेंसियों को एक ही एक्सचेंज पर शेयरों और कमोडिटी के ट्रेडिंग की इजाज़त दे दी है। फारेन पोर्टफोलियो इनवेस्टर्स के निवेश के लिए आसान नियम बना दिए हैं, होल्डिंग कंपनियों को एसपीवी में 50 फीसदी तक निवेश की इजाज़त दे दी है, एआरसी की तरफ से जारी सिक्योरिटी रिसीट की लिस्टिंग को हरी झंडी दे दी गई है, इन रेटिंग एजेंसियों के प्रमोटरों को लिस्टेड कंपनियों में 25 फीसदी पब्लिक होल्डिंग नार्म्स के मद्देनजर क्यूआईपी और ब्लाक डील की अनुमति दी गई है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को स्वतंत्रता और स्वायत्तता इसलिए दी गई है कि ये एजेंसियाँ किसी के दबाव में आए बिना स्वतंत्र रूप से सही रेटिंग प्रदान कर सकें। रेटिंग एजेंसियाँ रेटिंग की कार्यप्रणाली का खुलासा भी नहीं कर रही हैं और रेटिंग में पारदर्शिता भी नहीं है। इस संबंध में सेबी ने इन एजेंसियों के विरूद्ध कोई भी कार्यवाही नहीं की है और न ही कोई जुर्माना लगाया है। अधिकतर रेटिंग एजेंसियों में कुशल और ट्रेंड प्रोफेशनल्स की कमी है।
 
इन एजेंसियों ने अपना व्यवसाय बढ़ाने के लिए फील्ड में ज़्यादा कर्मचारी लगा रखे हैं। रेटिंग एजेंसियों की आपस में प्रतिस्पर्धा के कारण भी ये एजेंसियाँ सही और यथार्थ रेटिंग नहीं दे पाती हैं। सेबी पर इन एजेंसियों की देखरेख, निरीक्षण और नियंत्रण की जवाबदारी है लेकिन सेबी किन कारणों से अपनी जवाबदारी नहीं निभा पा रही है? सेबी एक नियामक संस्था है। क्या सरकार को सेबी के ऊपर एक और नियामक संस्था बैठानी होगी? 


 
रेटिंग एजेंसी को क्रेडिट रेटिंग फीस का भुगतान उसी कंपनी द्वारा डायरेक्ट किया जाता है जिसकी क्रेडिट रेटिंग, रेटिंग एजेंसी द्वारा निकाली जाती है और रेटिंग एजेंसी क्रेडिट रेटिंग की रिपोर्ट भी उसी कंपनी को देती है जिसकी रेटिंग निकाली गयी है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी रेटिंग रिपोर्ट भी बैंक या निवेशकों को डायरेक्ट नहीं देती है और न ही बैंक या निवेशकों से रेटिंग के संबंध में कोई चर्चा करती है। रेटिंग एजेंसी द्वारा बैंक या निवेशकों से रेटिंग के संबंध में चर्चा करने का कार्य सबसे महत्वपूर्ण है। कंपनी की वार्षिक साधारण बैठक (एजीएम) में कंपनी के शेयर होल्डर्स को रेटिंग एजेंसी द्वारा विस्तृत रिपोर्ट पेश करनी चाहिए लेकिन रेटिंग एजेंसी द्वारा यह कार्य भी नहीं किया जाता है।
 
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी द्वारा की गई सारी रेटिंग्स, क्रेडिट रेटिंग एजेंसी को अपनी वेबसाइट पर डालनी चाहिए लेकिन रेटिंग एजेंसियाँ यह कार्य भी नहीं कर रही हैं। लेकिन यदि ये एजेंसियाँ रेटिंग की पारदर्शिता बनाए रखने के साथ रेटिंग के हर बिंदु पर बैंकों, निवेशकों से चर्चा करें तो बैंकों, निवेशकों को कर्ज़ देने या निवेश करने के निर्णय लेने में आसानी होगी। क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ जो रेटिंग प्रदान करती हैं उससे सिर्फ़ निवेशकों, बैंकों को संबंधित कंपनी में निवेश करने के निर्णय लेने में सहायता मिलती है। वैसे बैंकों की अपनी क्रेडिट रेटिंग की आंतरिक प्रणालियाँ हैं।
 


सरकार ने सेबी, ट्राई जैसी नियामक इकाइयों तथा विभिन्न न्यायाधिकरणों में अध्यक्ष या सदस्य के चयन के पूर्व उनका सत्यापन ख़ुफ़िया ब्यूरो द्वारा करवाने का निर्णय लेकर इस दिशा में एक सराहनीय कदम उठाया है। सरकार के इस कदम से नियामकों और न्यायाधिकरणों में ईमानदार और ट्रेंड प्रोफेशनल्स अपनी सेवाएं दे सकेंगे। इसके बावजूद भी संबंधित मंत्रियों और अधिकारियों के द्वारा भी इन नियामकों और न्यायाधिकरणों का समय-समय पर नियंत्रण एवं निगरानी भी अति आवश्यक है। सेबी के पास अधिक कार्य का बोझ होने के कारण सेबी इन क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों पर कम ध्यान दे पा रही है। अत: बैंकों के बढ़ते हुए एनपीए और देश में बढ़ते हुए वित्तीय बाजार को देखते हुए अब इन रेटिंग एजेंसियों के लिए एक अलग नियामक की स्थापना के बारे में सरकार और हमारे नीति निर्माता विचार करें। 
 
- दीपक गिरकर

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