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वन बेल्ट वन रोड परियोजना साकार हुई तो भारत की बढ़ेगी मुश्किल

By अनीता वर्मा | Publish Date: May 19 2017 12:57PM

वन बेल्ट वन रोड परियोजना साकार हुई तो भारत की बढ़ेगी मुश्किल
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21वीं सदी में विश्व महाशक्ति बनने की चाह रखने वाला चीन अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना वन बेल्ट वन रोड को यर्थाथ के धरातल पर उतारने की कोशिश में लगा है क्योंकि वन बेल्ट वन रोड के माध्यम से एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ने का प्रयास है। इसी संदर्भ में चीन ने बीजिंग में 14-15 मई 2017 दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया था। इस सम्मेलन में 29 देशों के नेताओं समेत संयुक्त राष्ट्र जनरल सेक्रेटरी, विश्व बैंक के प्रेसिडेंट इत्यादि लोगों ने शिरकत की। भारत इस सम्मेलन का हिस्सा नहीं बना लेकिन भारत के पड़ोसियों को चीन एक मंच पर लाने में सफल रहा। इस सम्मेलन में नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान, मालदीव, म्यांमार और बांग्लादेश सम्मिलित हुए।

ज्ञात हो कि चीन म्यांमार और श्रीलंका में भारी निवेश कर रहा है। खासकर बंदरगाह बनाने में। चीन नेपाल और बांग्लादेश में भी गहरी पैठ बनाने हेतु प्रयासरत है। अभी हाल में नेपाल ने केरुंग काठमांडु  पोखरा लुम्बिनी रेल परियोजना को चीन के "वन बेल्ट वन रोड" का हिस्सा बनाने हेतु प्रस्ताव दिया है। सिल्क रोड परियोजना पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति ने कहा कि सभी देशों को अपने गुणों के साथ तरक्की करने का अधिकार होना चाहिए। उन्होंने इस मौके पर 124 अरब डॉलर खर्च कर सड़क, रेल, जल, वायु मार्ग को विकसित कर एशिया, यूरोप, अफ्रीका और दूर दराज के इलाकों को जोड़ने की घोषणा की। उन्होंने यह भी कहा कि सिल्क रूट अपने पुराने स्वरूप में विकसित नहीं होगा बल्कि वह विश्व में सभी देशों की भागीदारी वाला होगा जिसमें अफ्रीका और अमेरिका भी शामिल होंगे। ब्रिटेन और पाकिस्तान ने वन बेल्ट वन रोड की सराहना की। ज्ञात हो कि चीन और पाकिस्तान इस परियोजना को केवल आर्थिक प्रयोजन हेतु बताने में लगे हैं लेकिन ऐसा प्रतीत नहीं होता है क्योंकि यह केवल आर्थिक प्रयोजन है तो चीन और पाकिस्तान दक्षिण एशिया में भारत के खिलाफ मोर्चा बनाने की तैयारी में क्यों जुटे हैं। इस सम्मेलन में रूस और अमेरिका ने भी शिरकत की।
 
सिल्क रोड परियोजना में कई यूरोपीय देशों ने भी शिरकत की लेकिन जल्दबाजी में कोई समझौता करने से इंकार कर दिया। चीन की वन बेल्ट वन रोड की परियोजना पर अगला सम्मेलन 2019 में प्रस्तावित है।
 
दरअसल सिल्क रोड के नाम का इस्तेमाल 19वीं सदी में जर्मन भूगोलज्ञ ने किया। तब उसमें केवल चीन के झिनजियांग से लेकर मध्य एशिया तक सड़क मार्ग शामिल था। लेकिन धीरे धीरे इसके विस्तार के फलस्वरूप यह मार्ग पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरोप पहुंचा। ज्ञात हो कि वर्तमान के न्यू सिल्क रोड में केवल सड़क मार्ग ही नहीं बल्कि समुद्री मार्ग भी सम्मिलित है। समुद्री सिल्क रोड के विचार को 16वें आसियान शिखर सम्मेलन के दौरान ली केकियांग के भाषण के दौरान रेखांकित किया गया और 2013 में भी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के एक भाषण के दौरान सामने आया। दरअसल चीन इस परियोजना को लेकर काफी गंभीर है इसलिए चीन की सिन्हुआ समाचार एजेंसी ने वन बेल्ट वन रोड के प्रस्तावित नक्शे को जारी किया है। जिसमें सिल्क रोड को दो भागों में बांटा गया है। एक न्यू सिल्क रोड और दूसरा नया समुद्री सिल्क रोड जिसे सिल्क रोड आर्थिक बेल्ट के रूप में जाना जाता है।
 
भारत को वन बेल्ट वन रोड परियोजना से आपत्ति क्या है?
 
दरअसल चीन द्वारा निर्माण किया जा रहा चीन पाकिस्तान इकोनामिक कारिडोर भारत के पाक अधिकृत कश्मीर से गुजर रहा है और पाक अधिकृत कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। ऐसे में भारत की संप्रभुता और अखंडता प्रभावित होती है। दूसरा मसूद अजहर के मामले में भारत चीन के मध्य मतभेद है। यह वही मसूद अजहर है जिसको चीन ने संयुक्त राष्ट्र में आतंकवादी घोषित होने से रोकने हेतु वीटो किया। चीन का मानना है कि मसूद अजहर के खिलाफ ठोस प्रमाणों का अभाव है। तीसरा मतभेद- चीन का मानना है कि एनएसजी में सदस्यता के लिए आवेदन करने से पूर्व भारत को परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करना चाहिए। यदि चीन वन बेल्ट वन रोड परियोजना को अमली जामा पहनाने में सफल हो जाता है तो दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन की स्थिति धराशायी होगी। जो भारत के लिए बेहद गंभीर स्थिति होगी।
 
चीन की आक्रामक विस्तारवादी नीति तो जगजाहिर है। चीन अरुणाचल के कुछ भाग को दक्षिणी चीन कहता है। अभी हाल में बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा से बौखलाये चीन ने भारत से कड़ी आपत्ति जताई और अपने नक्शे में अरुणाचल के छह जगहों के नाम बदले जिसे वह चीन का दक्षिणी हिस्सा कहता है। चीन ने यहां तक कह दिया यदि भारत अरुणाचल में दखल देगा तो चीन कश्मीर में भी दखल दे सकता है। 2 नवंबर 2016 को लेह से लगभग 250 किलोमीटर दूर पूर्व में स्थित डेमचोक में पीपुल्स आर्मी के अफसर ने भारतीय सीमा में घुसकर एक गांव को गर्म पानी से जोड़ने हेतु मनरेगा के तहत बनाई जा रही नहर को रुकवा दिया। इस पर चीन का कहना था कि नहर बनवाने से पूर्व चीन की अनुमति लेनी चाहिए थी। इस प्रकार चीन की बेवजह आक्रामकता समय समय पर दिखाई देती है। वह आतंकवाद का पालन पोषण करने वाले पाकिस्तान के साथ हर वक्त खड़ा दिखाई देता है। ऐसे में इन दोनों देशों से निपटना भारत के समक्ष चुनौती है।
 
चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर का विरोध तो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में भी देखने को मिल रहा है। गिलगिट बाल्टिस्तान में आर्थिक गलियारे के विरोध में लोग सड़कों पर उतरे। यह सर्वविदित है कि चीन विस्तारवादी नीति के सिद्धांत पर कार्य करता है। उदाहरण के तौर पर 1959 में तिब्बत पर जबरन कब्जा। 1962 में भारत चीन युद्ध के दौरान कुछ भारतीय भूभाग पर कब्जा किया। अभी हाल में देखें तो पाक अधिकृत कश्मीर से चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर को भारत के बगैर सहमति के ले जाना। समय समय पर दक्षिण चीन सागर के मसले पर विश्व समुदाय के समक्ष चीन की दादागिरी उजागर होती रहती है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण ने दक्षिण चीन सागर पर चीन के एकाधिकार दावे को खारिज़ कर दिया। बावजूद चीन ने अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण के फैसले की अवहेलना कर दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीप का निर्माण कार्य जारी रखा।
 
अतः कहा जा सकता है कि चीन अपने हितों की पूर्ति हेतु किसी हद तक जा सकता है। वरना जहां सम्पूर्ण विश्व 2008 में आयी मंदी से अभी तक उबर नहीं पाया है। वहां चीन वन बेँल्ट वन रोड परियोजना को वास्तविकता के धरातल पर उतारने हेतु प्रयासरत है। ऐसे में कहीं "वन बेल्ट वन रोड" के माध्यम से 21वीं सदी में नव उपनिवेशवाद की आहट तो नहीं? चीन शक्ति संतुलन के साथ साथ भू राजनीति और भू अर्थव्यवस्था को बदलने की फिराक में तो नहीं।
 
अनीता वर्मा
(लेखिका अंतरराष्ट्रीय मामलों की जानकार हैं)

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