Prabhasakshi
सोमवार, अप्रैल 23 2018 | समय 19:10 Hrs(IST)

स्वास्थ्य

फास्ट फूड छोड़कर अंकुरित अनाज खाएं, लाभ जल्द दिखेगा

By वर्षा शर्मा | Publish Date: Dec 19 2016 1:34PM

फास्ट फूड छोड़कर अंकुरित अनाज खाएं, लाभ जल्द दिखेगा
Image Source: Google

पैंतीस वर्षीया अनामिका एक प्राइवेट दफ्तर में प्रबंधक के पद पर कार्य करती हैं। वह दिल्ली में अकेली रहती हैं। उन्हें अक्सर रात देर तक दफ्तर में काम करना पड़ता है। रात को घर आने पर वह इतनी थकी हुई होती हैं कि खाना बनाकर खाने को भी मन नहीं करता इसलिए वह आते समय फास्ट फूड का पैकेट भी साथ लाती हैं, यही दिन भर काम करने के लिए उसका सहारा होता है। ऐसा केवल अनामिका ही नहीं और बहुत से लोग करते होंगे जिनके पास समय की कमी है।

 
आज के व्यस्त जीवन में समय की कमी के कारण फास्ट फूड हमारे जीवन में गहरी पैठ बना चुका है। कुछ लोग आधुनिकता के मोह के कारण भी इस ओर खिंचते हैं। बड़े शहरों में इनका प्रयोग ज्यादा होता है। आज की फास्टफूड संस्कृति में किसी को भी 'लिविंग फूड' का ख्याल ही नहीं आता। परन्तु क्या आप जानते हैं कि इस प्रकार के भोजन में क्षारीय प्रोटीन तथा विटामिन युक्त तत्वों का अभाव होता है इन खाद्य पदार्थों में अम्लीय तथा देर से पचने वाले तत्वों की मात्रा ज्यादा होती है। देर से पचने वाले ये तत्व आंतों में चिपक जाते हैं और वहीं सड़ते रहते हैं, जिस कारण ज्यादातर रोग जन्म लेते हैं। इसका अर्थ है इस प्रकार के खाद्य पदार्थ भूख तो मिटाते हैं परन्तु इससे हमें कोई लाभ नहीं होता।
 
प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार, दोषपूर्ण खान−पान रहन−सहन तथा सोच−विचार की आदत के कारण ही ज्यादातर रोग जन्म लेते हैं। दोषपूर्ण खानपान के कारण पेट से संबंधित कई बीमारियां आज आम हो गई हैं। इसके कारण मोटापा, कब्ज, मधुमेह, बवासीर जैसी कई अन्य बीमारियां भी आम होती जा रही हैं। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति के अनुसार भोजन में सभी तत्वों का संतुलन बनाए रखने के लिए अंकुरित आहार का प्रयोग किया जा सकता है। आयुर्वेद में अंकुरित आहार को अमृताहार की संज्ञा दी गई है। वास्तव में अंकुरित आहार उच्च खाद्य माने जाने वाले पोषक तत्वों का मुख्य स्रोत है। अंकुरित आहार क्षारीय प्रकृति के होते हैं। शरीर को शुद्ध करना, स्वास्थ्य के सुधार और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में अंकुरित आहार विशेष रूप से सहायक होता है। दैनिक आहार में अंकुरित अनाज का समावेश किया जाना लाभकारी होता है क्योंकि इससे आहार का पोषण मूल्य बढ़ता है।
 
अच्छे स्वास्थ्य के लिए हमारे भोजन का अस्सी प्रतिशत भाग क्षारीय तथा बीस प्रतिशत भाग अम्लीय होना चाहिए। इस संतुलन को बनाए रखने के लिए भोजन में कच्चे आहार तथा अंकुरित आहार का प्रयोग सर्वोत्तम माना गया है। हम सभी के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि अंकुरित आहार में पोषण के तत्व कैसे पैदा होते हैं? दरअसल सभी बीज सामान्य रूप से निष्क्रिय अवस्था में पड़े रहते हैं। इन बीजों के अंदर संरक्षित जीवन की उत्पत्ति के कारक तत्व अनुकूल परिस्थितियां पाते ही सक्रिय हो जाते हैं। अमृताहार में बीजों तथा दालों के अंदर स्थित निष्क्रिय तत्वों को सक्रिय कर आहार के रूप में प्रयोग किया जाता है।
 
आधुनिक प्रयोगों से यह सिद्ध हो चुका है कि एक बीज के भीतर एक पूरा जीवन छिपा होता है। इसमें वे सभी तत्व संग्रहित होते हैं जो पौधे का जीवन चलाते हैं। यही तत्व हमारे शरीर के लिए भी आवश्यक होते हैं यही कारण है कि अंकुरित बीजों को लिविंग फूड भी कहा जाता है। विभिन्न अनाजों व दालों को पानी में भिगो देने पर उनके अंदर स्थित सभी तत्व सक्रिय हो जाते हैं। इससे बीज में अनेक रासायनिक परिवर्तन आते हैं। अंकुरण की अवस्था में बीजों में विटामिन सी, आयरन, विटामिन सी तथा फास्फोरस की मात्रा कई गुना बढ़ जाती है। इतना ही नहीं अंकुरण के बाद कुछ ऐसे तत्वों की मात्रा में कमी आती है जो शरीर के लिए हानिकारक होते हैं, इस प्रकार के तत्वों में ओलिगासैकराइड्स प्रमुख है।
 
अंकुरण के बाद विभिन्न दालों में पाया जाने वाला स्टार्च, ग्लूकोज में तथा फ्राक्टोज, माल्टोज में बदल जाता है। इससे इनका स्वाद तो बढ़ता ही है साथ ही वे सुपाच्य भी हो जाती हैं। इसी प्रकार की प्रक्रिया अनाज में भी होती है। परिवर्तन की यह प्रक्रिया अनाज में तीव्र तथा दालों में कुछ धीमी गति से होती है। अमृताहार बनाने के लिए चना, मूंग, राजमा, मेथी, सोंठ, लोबिया, सोयाबीन, सूर्यमुखी तथा गेहूं के बीजों को प्रयोग किया जाता है। इनके अतिरिक्त अन्य दालों को भी अंकुरित कर प्रयोग किया जा सकता है। अंकुरित करने के लिए बीजों को अच्छी तरह धोकर जार या किसी अन्य बर्तन में दस−बारह घंटों के लिए भिगो देना चाहिए। बीजों को भिगोने के लिए इतना पानी जरूर डालें कि उसमें बीज पूरी तरह डूब जाएं। अच्छी तरह भीगे हुए बीजों को पानी से दोबारा अच्छी तरह धोकर साफ सूती कपड़े की एक पोटली में टांग दें। इस तरह से भीगे हुए बीजों का अंकुरण लगभग 24 घंटे में हो जाता है। गर्मियों में यह ध्यान रखना जरूरी है कि लटकाई गई पोटली सूखे नहीं इसके लिए थोड़ी−थोड़ी देर में उस पर पानी का छिड़काव करते रहें जिससे पोटली में नमी बनी रहे।
 
अंकुरित बीजों को कच्चा ही खाना चाहिए क्योंकि पकाने से उनके पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। इन बीजों का स्वाद कुछ कसैला होता है इसलिए उनमें नमक, टमाटर, खीरा, नींबू आदि डाला जा सकता है, इससे उनका स्वाद बढ़ जाता है। अंकुरित बीजों के प्रयोग से कमजोरी तथा कई प्रकार के रोग दूर होने के साथ−साथ शरीर को उचित पोषण भी मिलता है। इनसे हमारा इक्यून सिस्टम भी मजबूत होता है। नशाखोरी तथा मद्यपान की लत छुड़ाने में भी यह अमृताहार सहायक होता है।
 
तीन प्रकार के बीजों को प्रयोग मुख्यतः किया जाता है जिसमें से चयन रोग के आधार पर किया जाता है। मधुमेह के रोगियों के लिए चना व मेथी, हृदय रोगियों के लिए चना तथा मूंग और बढ़ते बच्चों व माताओं के लिए अंगूर, बादाम व खजूर। सामान्य व्यक्ति किसी भी प्रकार के अमृताहार का प्रयोग कर सकता है। नियमित सेवन से रक्त अल्पता, हडि्डयों की बीमारियां, मानसिक तनाव, कब्ज, अनिद्रा, बवासीर, मोटापा तथा पेट के कई रोगों से छुटकारा मिल जाता है। अंकुरण के लिए ताजा तथा स्वस्थ बीजों का ही प्रयोग किया जाना चाहिए। साथ ही यह भी ध्यान रखें कि अंकुरण पुराना, दुर्गन्धयुक्त या बासी न हो।
 
वर्षा शर्मा

Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his/her private capacity and do not necessarily reflect the opinions, beliefs and viewpoints of Prabhasakshi and do not in any way represent the views of Prabhasakshi.