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लेख/व्यंग्य

बंदरों की बंदरबांट (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Publish Date: Dec 29 2017 10:25AM

बंदरों की बंदरबांट (व्यंग्य)
Image Source: Google

सात दशक से ज्यादा बीत गए, आम आदमी की समस्याएं उलझती जा रही हैं आम जानवरों की दिक्कतों को कौन सुनेगा। हमारी हरकतों ने बार बार साबित किया है कि बंदर ही हमारे पूर्वज हैं। देश के पहाड़ी राज्यों में बंदर अब एक समस्या बन चुके हैं। बंदरों से जुड़ी कितनी परियोजनाएं बकवास इतिहास हो गईं। अनगिनत सेमिनार, बैठकें, विदेशभ्रमण व विशेषज्ञों से गंभीर विमर्श। नसबंदी अब बंदी हो चुकी, मारने की कानूनन अनुमति को लालफ़ीते का हार पहना दिया। कुछ समय पहले निहायत सकारात्मक माहौल में, बुद्धिमान व्यक्तियों के बीच गहन चर्चा व खर्चा हुआ फिर भी पूर्वी राज्य नागालैंड ने हिमाचल के बंदर लेने से साफ इंकार कर दिया यह कहकर कि नागालैंड में बंदरों के लिए हालात ‘अनुकूल’ नहीं हैं। उन्होंने इसलिए इंकार किया क्यूंकि वे अपने हाथी हिमाचल में ट्रांसफर करना चाहते थे मगर हाथियों के लिए हिमाचल के हालात ‘अनुकूल’ नहीं बन पाए। बरसों से बंदर नोटबंदी व जीएसटी से ज्यादा परेशान कर रहे हैं मगर बंदरबंदी नहीं हो पा रही।

 
किसी भी समस्या का समाधान, सकारात्मक सोच से होता है। हमारे एक मित्र हैं कुछ अलग सोच वाले प्राणी। शिमला के माल रोड़ पर कल शाम मिले तो बोले मेरे पास बंदरों की समस्या का समाधान है। हमने पूछा बताओ, यहां तो सही लोगों व बढ़िया उपायों के लिए राष्ट्रीय मारामारी है कोई बताए तो सही। बोले, यह जो पूर्वी राज्य से बात हुई है उस पर अमल करना चाहिए। हमने कहा, क्या बोल (बक) रहे हो, वे जो हाथी देना चाहते हैं ले लेना चाहिए? वे बोले हां, हमें यहां हाथियों के लिए सकारात्मक या सीधे कहो ‘कूल’ माहौल बना लेना चाहिए ताकि उसके बदले में वो बंदरों के लिए ‘कूल’ माहौल की रचना करें। हमारे पास जो अवांछित है हम उन्हें देना चाहते हैं तो वे भी जो उनके पास अवांछित हैं देंगे न। उन्होंने भी तो नीतिगत रूप से सही राजनीतिक फैसला लेना है जिसमें सब की भलाई हो। सही कूटनीति व राजनीति क्या नहीं कर सकती। यह तो डील है भाई। ठिठुरते मौसम में भी हमारी उत्सुकता में गर्माहट पैदा हो गई, हम उन्हें रेस्तरां ले गए ढंग से चर्चा के लिए। बोले, बिना खाए पिए बातचीत में शब्द अपना लोहा नहीं मनवाते। खाते हुए उन्होंने समझाया कि बंदरों का आशियाना हमने बड़ी ईमानदारी से उजाड़ा है स्थिति विकट है, बातों से तो हल नहीं होगी। हमने उन्हें उजाड़ने के सारे प्रयास कर लिए अब तो उन्हें बसाना ही आखिरी उपाय रहेगा। हमसे जो राज्य बंदर मांग रहे हैं उन्हें देकर जितने भी हाथी आते हैं उन्हें हर कहीं न छोड़कर ऐसे लोगों के संरक्षण में रखा जाए जो अपने आप को वैभवशाली, प्रभावशाली, शक्तिशाली, रसूखशाली समझते हैं। इससे उनका बड़ा होना बड्डप्पन में तब्दील हो जाएगा और भारतीय संस्कृति के अनुसार ‘घर के बाहर हाथी खड़ा है’ से उनकी टौर बनेगी। शादी, दसूठन, चुनाव और कितने ही छोटे बड़े आयोजनों में हाथी की उपस्थिति मात्र ही उसे सफल, बड़ा और यादगार आयोजन बना देगी। अख़बार वाले भी हाथी के ऊपर बैठे बड़े आदमियों की फोटो छापकर ज्यादा स्पेस कवर कर सकेंगे। हाथी का क्या है बेचारा वृक्षों की टहनियां खाता रहेगा। जंगल काटू आज भी पेड़ के पेड़ हज़म कर देते हैं थोड़ी टहनियां हाथी तोड़ लेगा तो क्या नुकसान होने वाला है इन जंगलों का।
 
यार कैसी अनहोनी बातें कर रहे हो। मुझे उन्हें कॉफ़ी के साथ वड़ा खिलाने का दुख हो रहा था। मैंने कहा चलें ठंड बढ़ गई है। बोले बातचीत पूरी नहीं हुई, एक एक काफी और लेते हैं भूख लग रही है डोसा भी खा लेते हैं। वे जारी रहे, यदि अपने बंदर देकर उनके हाथी नहीं ले सकते तो बंदरों की बंदर बांट कर लो। क्या मतलब। सीधा सा तरीका है, उन्होंने कहा। हमने उनकी रिहाईश यानी जंगल काट कर अपनी रिहाईश बना ली। अब जंगल रोपने का नाटक तो सत्तर साल से हो ही रहा है, नाटक, नारों, प्रस्तावों, जुलूसों, बैठकों व कागज़ी परियोजनाओं से तो वृक्ष उगा नहीं करते इसलिए सरकार को चाहिए कि वो कानून पास कर हर परिवार को बंदर बांट दे। यह काम शहर की नगरपालिकाएं करें। उनके पास शहर में मकानों का पूरा ब्योरा होता है। हर म्युनिसिपल कमिशनर इस मामले में संजीदगी से काम करे। यह मकान में रहने वाले पर निर्भर करेगा कि वह मिले हुए बंदरों को कैसे रखे। इस बहाने हम जो पशुपक्षी प्रेम की बातें करते रहते हैं उनका रियलिटी टेस्ट भी हो जाएगा। और हां समाज के वैभवशाली, प्रभावशाली, शक्तिशाली, रसूखशाली और सभी किस्म की ताक़तें रखने वालों को ज़्यादा मात्रा में बंदर बांटे जाएं। इस बहाने उनका समाज सेवा का सपना ज्यादा व्यवहारिक रूप से पूरा होगा। जो करोड़ों रूपए की राशि सरकार ने आज तक बंदरों के नाम पर बांटी है चाहे तो उससे काफी कम भविष्य में जानवरों के लिए खोले जाने वाले चिकित्सालयों में सुविधाओं हेतु खर्च कर अपने दायित्व से मुक्त हो सकती है।
 
यह भी बेकार की बात है। कौन मानेगा इसे। चलो चलते हैं। उनका जवाब रहा, ‘आजकल सही बात कौन मानता है। कोई बात नहीं बंदर अपने आप मनवा लेंगे। वक्त ने सब टेढ़ों को सीधा कर दिया।' इन फालतू बातों में अपने दो बार के काफी व वड़े और हां डोसे के पैसे नकद बर्बाद हो गए। डोसा आ गया था जो हमने खाना ही था।
 
- संतोष उत्सुक

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