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साहित्य जगत

पाओ बेशरम हँसी अनलिमिटेड (व्यंग्य)

By अरुण अर्णव खरे | Publish Date: Mar 12 2018 11:50AM

पाओ बेशरम हँसी अनलिमिटेड (व्यंग्य)
Image Source: Google

मेरे एक मित्र हैं टेकचंद जो अपने इनोवेटिव आइडिया के लिये पहिचाने जाते हैं। उनका दिमाग बिना रनवे के भी ऊबड़-खाबड़ रस्ते से भी टेक-ऑफ कर लेता है और ऐसे-ऐसे जज्बाती, उत्पाती, खुराफाती तथा करामाती आइडिया लेकर लैण्ड करता है कि सब दाँतों तले उँगलियाँ दबाने लगते हैं। उनकी इसी खूबी के कारण ही मेरी मित्र-मण्डली बिना उनके सलाह के कोई काम नहीं करती। मुरारी जी के बेटे ने इण्डस्ट्रीयल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा पास कर लिया था और कोई स्टार्ट अप शुरू करना चाहता था। वह बेटे को लेकर सलाह लेने टेकचंद के पास गए और उन्हें सारी बात बता कर पूछा- "आपके विचार से कौन सी फैक्टरी वर्तमान मार्केट के लिहाज से ज्यादा मुनाफे वाली होगी।"  

टेकचंद ने इस बार बिना टेक ऑफ के ही सलाह दे डाली- "टूथपेस्ट की फैक्टरी लगवा दो इसे।''
 
"टूथपेस्ट की फैक्टरी- पर इस फील्ड में तो पहले से ही बड़े-बड़े दिग्गज मैदान में हैं- बहुत से बाबा और आयुर्वेदाचार्य भी इसमें हाथ आजमा रहे हैं-- इनके बीच कैसे नया टूथपेस्ट अपना स्थान बना पायेगा"- मुरारी जी ने अपनी आशंका व्यक्त की।
 
"ये तुम मुझ पर छोड़ो-- हम इसमें एक ऐसी चीज मिलाकर मार्केटिंग करेंगे कि लोग हाथों हाथ लेंगे इसे-- इसका एड भी हम बनवा देंगे" - टेकचंद बोले।
 
"पर हम क्या मिलाएँगे इसमें-- पहले ही लोग लौंग के तेल से लेकर फ्लोराइड, पिपरमेण्ट, नीम, बबूल, एलोवीरा, नमक और चारकोल तक सब कुछ तो मिला चुके हैं-- हमारे लिए बचा ही क्या है मिलाने के लिए"- मुरारी जी अब भी टेकचंद की बातों से आश्वस्त नहीं लग रहे थे। पर चूँकि टेकचंद कह रहे थे सो उन्हें मानना पड़ा। उनके बेटे ने टूथपेस्ट बनाने की फैक्टरी डाल ली। प्री लॉन्चिंग एड भी टेकचंद के निर्देशन में बनाया गया।
 
स्क्रीन पर दो बालाएँ जो हॉफ से भी ज्यादा हॉफ पेण्ट में थीं और अपने नारी- जन्य उपकरणों को छुपाने के प्रति घोर लापरवाह नजर आ रहीं थी, हाथों में टूथपेस्ट लेकर ठुमकती हुई इस घोषणा के साथ अवतरित हुईं- "हम लेकर आ रहे हैं दुनिया का सबसे अद्भुत एलो-आयुर टूथपेस्ट- ब्रेस -- इसमें ना नमक है ना कोयला-- ना ही नीम है और ना ही बबूल, इसमें अमचुर, आंवला और शहद भी नहीं-- इसमें है करामाती इपोमोएया जो आपको दे झकास दाँत और दिलकश दन्त निपोर मुस्कान। बस एक बार इस्तेमाल कीजिये और बन जाइए ब्रेस - ब्रेस - ब्रेस"
 
एड देख कर मुरारी जी टेकचंद के पास दौड़े दौड़े आये, बोले- "ये कैसा नाम और एड है- सब कुछ गड़बड़ है इसमें -ब्रेस-- ब्रेस का मतलब तो निर्लज्जता होता है और आप लोगों को निर्लज्ज होने का संदेश दे रहे हैं-- इसमें पता नहीं ये क्या मिलवा दिया है आपने"
 
"इस बार आधा सही समझे हैं आप मुरारी-- ब्रेस का मतलब यही है और इसमें हमने बेशरम की झाड़ियों, जिसका बोटनीकल नाम इपोमोएया है, का रस मिलाया है- यह नाम केवल भरमाने के लिए है-- जैसे बाजार में ढेर सारे दूसरे भरमाने वाले प्रोडक्ट हैं-- जवान रहने के लिए, गोरा होने के लिए, बाल उगाने के लिए और ना जाने क्या-क्या। अपना एड भी कितना धांसू बना है-- लोग-बाग इसी तरह के एड के दम पर गंजों तक को कंघियां बेंच देते हैं- हमें तो केवल दंत-मंजन ही बेचना है-- इस बेशरम जमाने के लिये एकदम मुफीद प्रोडक्ट है यह-- आप देखना लोग हाथों हाथ लेंगे उसे" -टेकचंद उत्साह से भरे हुए थे।
      
मुरारी जी एक बार फिर टेकचंद से असहमति दर्ज कराते हुए वापिस लौट आए लेकिन टूथपेस्ट बाजार में आते ही हंगामा बरप गया। समाज के हर तबके ने टूथपेस्ट को हाथों हाथ लिया। सीडी में कैद नेताओं और जेल जाते बाबाओं के लिये ये टूथपेस्ट वरदान सिद्ध हुआ-- इस टूथपेस्ट की बदौलत ही दोनों प्रेस और समर्थकों के सामने खीं-खीं कर हँस पा रहे हैं। किसान पिटने और गोलियाँ खाकर भी हँसने की हिम्मत दिखा रहे हैं मानो कह रहे हों हम तो अपनी दुर्गति करवा कर भी देश का पेट पालने की हिम्मत रखते हैं और आप अपनी नाकामी के लिये हम पर गोलियाँ बरसा कर बिना ब्रेस टूथपेस्ट के ही हँस रहे हो। जो मजदूर पहले काम छिन जाने से मुँह लटकाए घर में पड़े रहते थे अब हँसते हुए कह रहे हैं- हमें तो वैसे भी फाँकेकसीं की आदत है अब काम नहीं तो क्या आपकी सपने बेचने की दुकान तो अच्छी चल रही है। बेरोजगार नौजवान भी ब्रेस टूथपेस्ट करके नौकरी ढूँढने घर से निकलते हैं और शाम को लौट कर "आज भी नौकरी नहीं मिली" का निराशावादी वक्तव्य भी हँसते हुए घर वालों को दे रहे हैं। 
 
सच ही कहा था टेकचंद ने- बहुत ही धाँसू प्रोडक्ट बना है। मुरारी जी टेकचंद के गुण गाते नहीं थक रहे हैं-- वाह - एक बार ब्रश करो और पाओ बेशरम हँसी अनलिमिटेड।
 
-अरुण अर्णव खरे

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