Prabhasakshi
रविवार, जून 24 2018 | समय 14:31 Hrs(IST)

साहित्य जगत

    योग अपनाएं शांति पाएं (कविता)

    योग अपनाएं शांति पाएं (कविता)

    युवा लेखिका प्राची थापन ने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर ''योग'' से होने वाले लाभों पर एक कविता लिखी है जोकि यहां प्रस्तुत है।

    इच्छा मृत्यु की ओर बढ़ती कांग्रेस (व्यंग्य)

    इच्छा मृत्यु की ओर बढ़ती कांग्रेस (व्यंग्य)

    कल शर्मा जी के घर गया, तो वे ‘इच्छा मृत्यु’ के बारे में एक लेख पढ़ रहे थे। पढ़ने के बाद उन्होंने वह अखबार मुझे पकड़ा दिया। उस लेख का सार इस प्रकार है।

    हमें भी खिलाओ नहीं तो... (व्यंग्य)

    हमें भी खिलाओ नहीं तो... (व्यंग्य)

    आजकल दूरदर्शन ने क्रिकेट और फुटबॉल को हर घर में पहुंचा दिया है; पर हमारे बचपन में ऐसा नहीं था। तब गुल्ली-डंडा, पिट्ठू फोड़, कंचे और छुपम छुपाई जैसे खेल अधिक खेले जाते थे। खेल में झगड़ा भी होता ही है।

    मध्यावधि उपचुनाव (व्यंग्य)

    मध्यावधि उपचुनाव (व्यंग्य)

    विरोधी पक्ष के बड़े-बड़े लोग सिर जोड़कर बैठे थे। विषय वही था 2019 का चुनाव। महाभारत की घोषणा भले ही न हुई हो, पर उसके होने में अब कुछ संदेह बाकी नहीं था। तब तो श्रीकृष्ण ने युद्ध टालने की बहुत कोशिश की।

    ज़िन्दगी का हर एक पहलू सँवार (ग़ज़ल)

    ज़िन्दगी का हर एक पहलू सँवार (ग़ज़ल)

    हिन्दी काव्य संगम से जुड़े शशांक शेखर जी कि रचना (ग़ज़ल) ''जिन्दगी का हर पहलू सँवार'' में जीवन के संघर्ष और छोटी छोटी आरजुओं को पूरा करने की जद्दोजहद पर प्रकाश डाला गया है।

    बाग़ से गायब होता बाग़ (व्यंग्य)

    बाग़ से गायब होता बाग़ (व्यंग्य)

    सुबह की सैर स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभदायक मानी जाती है। सेवानिवृत होने के बाद मैंने पड़ोस में स्थित सवा सौ साल से भी पुराने बाग में नियमित सैर करना शुरू किया है। बेमौसमी बारिश से डरता हूं तभी छतरी लेकर ही बाग में जाता हूँ।

    इक बंगला लगे न्यारा (व्यंग्य)

    इक बंगला लगे न्यारा (व्यंग्य)

    गीत-संगीत की दुनिया चाहे जितनी प्रगति कर ले; पर जो बात पुराने गीतों में है, वो आज कहां ? हमारे शर्मा जी हर समय पुराने सदाबहार गीत ही सुनते रहते हैं। इससे उनके दिल-दिमाग में ठंडक और इस कारण घर में भी शांति रहती है।

    हिन्दी गजल को शिखर तक पहुँचाया समकालीन कवि दुष्यंत कुमार ने

    हिन्दी गजल को शिखर तक पहुँचाया समकालीन कवि दुष्यंत कुमार ने

    हिन्दी गजल हिन्दी साहित्य की एक नई विधा है। नई विधा इसलिए है, क्योंकि गजल मूलतः फारसी की काव्य विधा है। फारसी से यह उर्दू में आई। गजल उर्दू भाषा की आत्मा है। गजल का अर्थ है प्रेमी-प्रेमिका का वार्तालाप।

    लूट सके तो लूट (व्यंग्य)

    लूट सके तो लूट (व्यंग्य)

    आप कहेंगे कि बुढ़ापे में इस बेवक्त की अंत्याक्षरी का कारण क्या है ? असल में आजकल सब तरफ लूट, टूट और छूट का ही मौसम है। इसलिए अच्छा यही है कि शर्म का कुरता उतार कर उसमें जो समेटा जा सके, समेट लो।

    अपराजिता (कविता)

    अपराजिता (कविता)

    हिन्दी काव्य संगम से जुड़ीं कवयित्री डॉ. राजकुमारी ने कानपुर से भेजी है ''अपराजिता'' नामक कविता। इसमें उन्होंने अपने मन के भावों को बेहद खूबसूरती के साथ प्रस्तुत किया है।

    हजारी प्रसाद द्विवेदी आलोचक के साथ बहुत बड़े रचनाकार भी थे

    हजारी प्रसाद द्विवेदी आलोचक के साथ बहुत बड़े रचनाकार भी थे

    हिंदी साहित्य के पुरोधा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का हिन्दी साहित्य में योगदान कभी नकारा नहीं जा सकता और कबीर जैसे महान संत को दुनिया से परिचित कराने का श्रेय भी उनको ही जाता है।

    एक सरकारी बंगले की कीमत तुम क्या जानो रमेश बाबू (व्यंग्य)

    एक सरकारी बंगले की कीमत तुम क्या जानो रमेश बाबू (व्यंग्य)

    रमेश बाबू, हमें सरकारी बंगले से इतना अधिक लगाव हो गया है कि हम सपने में भी सरकारी बंगला खाली करके अन्य बंगले में रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

    जूते के प्रयोग की संभावनाएं (व्यंग्य)

    जूते के प्रयोग की संभावनाएं (व्यंग्य)

    यों तो जूता ऐसी चीज है, जिसके बिना काम नहीं चलता। चप्पल, सैंडल, खड़ाऊं आदि इसके ही बिरादर भाई और बहिन हैं। जूते के कई उपयोग हैं। घर के अंदर एक, बाहर दूसरा तो नहाने-धोने के लिए तीसरा।

    महान शब्दशिल्पी और रचनाकार बालकवि बैरागी के जीवन ने छोड़ी अमिट छाप

    महान शब्दशिल्पी और रचनाकार बालकवि बैरागी के जीवन ने छोड़ी अमिट छाप

    दीये की बाती जलती है तब सबको उजाले बांटती है। बीज उगता है तब बरगद बन विश्राम लेता है। समन्दर का पानी भाप बन ऊंचा उठता है तब बादल बन जमीं को तृप्त करने बरसता है।

    प्रेम स्वयं का है विसर्जन (कविता)

    प्रेम स्वयं का है विसर्जन (कविता)

    हिंदी काव्य संध्या से जुड़ीं कवयित्री प्रतिभा शुक्ला की ओर से रचित कविता ''प्रेम स्वयं का है विसर्जन'' में निश्छल प्रेम पर प्रकाश डालते हुए मन के उद्गारों को व्यक्त किया गया है।

    पत्रकारिता के दार्शनिक आयाम का आधार है 'आदि पत्रकार नारद का संचार दर्शन'

    पत्रकारिता के दार्शनिक आयाम का आधार है 'आदि पत्रकार नारद का संचार दर्शन'

    भारत में प्रत्येक विधा का कोई न कोई एक अधिष्ठाता है। प्रत्येक विधा का कल्याणकारी दर्शन है। पत्रकारिता या कहें संपूर्ण संचार विधा के संबंध में भी भारतीय दर्शन उपलब्ध है। देवर्षि नारद का संचार दर्शन हमारे आख्यानों में भरा पड़ा है।

    राष्ट्रवाद से जुड़े विमर्शों को रेखांकित करती किताब- 'राष्ट्रवाद, भारतीयता और पत्रकारिता'

    राष्ट्रवाद से जुड़े विमर्शों को रेखांकित करती किताब- 'राष्ट्रवाद, भारतीयता और पत्रकारिता'

    पश्चिम का राष्ट्रवाद एक राजनीतिक विचार है। चूँकि वहाँ राजनीति ने राष्ट्रों का निर्माण किया है, इसलिए वहाँ राष्ट्रवाद एक राजनीतिक विचार है। उसका दायरा बहुत बड़ा नहीं है। उसमें कट्टरवाद है, जड़ता है। हिंसा के साथ भी उसका गहरा संबंध रहा है।

    आलूवादी नेता हर सरकार में जगह बना लेते हैं (व्यंग्य)

    आलूवादी नेता हर सरकार में जगह बना लेते हैं (व्यंग्य)

    संसद से लेकर सड़क तक, घर से लेकर बाजार तक, जहां देखो वहां बेसिर पैर के विवाद। 70 साल हो गये हमें आजाद हुए; पर हम अभी तक तय नहीं कर पाए हैं कि विकास का सही रास्ता क्या है?

    भरी सभा में भी वो मौन थे (कविता)

    भरी सभा में भी वो मौन थे (कविता)

    हिन्दी काव्य संगम से जुड़ीं लेखिका मीनाक्षी मिश्रा की ओर से प्रेषित कविता ''भरी सभा में भी वो मौन थे'' में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार को उकेरा गया है।

    उपवास का मौसम (व्यंग्य)

    उपवास का मौसम (व्यंग्य)

    आजकल बेमौसमी उपवासों का दौर चल रहा है। वैसे तो साल में दो बार नवरात्र आते हैं। दो मौसम के संधिकाल में नौ दिन कम खाने या कुछ नहीं खाने से पेट को आराम मिलता है। इससे पूरे शरीर की आंतरिक शुद्धि हो जाती है।

    प्रेम पूजनीय है (कविता)

    प्रेम पूजनीय है (कविता)

    हिन्दी काव्य संगम मंच से जुड़े लेखक शेखर शुक्ला के द्वारा रचित कविता ''प्रेम पूजनीय है'' में शब्दों की माला पिरोते हुए प्रेम की विस्तृत व्याख्या की गयी है।

    महापंडित थे राहुल सांकृत्यायन, घुमक्कड़ शास्त्र की रचना की

    महापंडित थे राहुल सांकृत्यायन, घुमक्कड़ शास्त्र की रचना की

    राहुल सांकृत्यायन ऐसे महापंडित थे जिन्होंने बिना विधिवत शिक्षा हासिल किए विविध विषयों पर करीब 150 ग्रंथों की रचना की और अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा यात्राओं में लगा दिया।

    हास्यबोध के कारण काफी पसंद किये जाते हैं बाबू गुलाब राय के निबंध

    हास्यबोध के कारण काफी पसंद किये जाते हैं बाबू गुलाब राय के निबंध

    हिन्दी साहित्य के आलोचक तथा निबंधकार बाबू गुलाब राय ने वैसे तो तमाम विषयों पर अपनी लेखनी चलाई, लेकिन आम आदमी की जिंदगी से जुड़े विषयों पर लिखे गए उनके लेखों को आज भी काफी पसंद किया जाता है।

    चरित्र की ज्वलंत वेदी पर (कविता)

    चरित्र की ज्वलंत वेदी पर (कविता)

    हिन्दी काव्य संगम की ओर से प्रेषित कविता ''चरित्र की ज्वलंत वेदी पर'' की रचयिता भ्रमिका कश्यप जी हैं। इस कविता में उन्होंने महिला के चरित्र पर अकसर उठने वालों सवालों का बेबाकी से जवाब दिया है।

    दफ़ा कर दो इश्क़ (ग़ज़ल)

    दफ़ा कर दो इश्क़ (ग़ज़ल)

    हिन्दी काव्य संगम से जुड़ीं लेखिका स्मिता मिश्रा द्वारा रचित ''बा-बहर'' ग़ज़ल में प्रेमी से मिले धोखे से हुई पीड़ा का वर्णन किया गया है।

    जानें राष्ट्रगीत वंदे मातरम के रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी से जुड़ी कुछ बड़ी बातें

    जानें राष्ट्रगीत वंदे मातरम के रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी से जुड़ी कुछ बड़ी बातें

    राष्ट्रगीत ''वंदे मातरम'' के रचयिता बांग्ला लेखक बंकिमचंद्र चटर्जी को न केवल देशभक्ति का अलख जगाने वाले उपन्यास ''आनंदमठ'' के लेखक के रूप में जाना जाता है बल्कि उन्हें कई रोमांटिक उपन्यासों की रचना के लिए भी ख्याति प्राप्त है।

    सार्थक कोई आकार दे दूँ (कविता)

    सार्थक कोई आकार दे दूँ (कविता)

    यदि हम एकजुट होकर अपनी मातृभाषा के प्रति आदर के साथ ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें तो हिन्दी का गौरवशाली इतिहास मात्र इतिहास नहीं रहेगा। पेश है इस संदर्भ में एक कविता।

    अपनी ओजस्वी रचनाओं से आज भी प्रेरित करते हैं माखनलालजी

    अपनी ओजस्वी रचनाओं से आज भी प्रेरित करते हैं माखनलालजी

    माखनलाल चतुर्वेदी देश के ख्यातिप्राप्त कवि और लेखक थे जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपनी कलम का इस्तेमाल करके युवाओं को जागृत किया। उनकी रचनाएँ व कृतियां आज भी लोकप्रिय हैं।

    यौवन जब यह भस्म होगा (कविता)

    यौवन जब यह भस्म होगा (कविता)

    हिन्दी काव्य मंच ''हिन्दी काव्य संगम'' की ओर से प्रेषित कविता ''यौवन जब यह भस्म होगा'' में लेखिका स्मृति तिवारी ने अपने मन के उद्गार व्यक्त किये हैं।

    वेदना के बीज से जन्मी हूँ (कविता)

    वेदना के बीज से जन्मी हूँ (कविता)

    हिन्दी काव्य संगम मंच की ओर से लेखिका प्रेरणाअनमोल की कविता ''वेदना के बीज से जन्मी हूँ'' में कवयित्री ने अपने मन के भाव व्यक्त किये हैं।

    राजनीति का भूत (व्यंग्य)

    राजनीति का भूत (व्यंग्य)

    शर्मा जी की इच्छा थी कि मोहल्ले में उनका कद कुछ बढ़े। उनके भाव भी थोड़े ऊंचे हों। असल में नगर पंचायत के चुनाव पास आ रहे थे। उनका मन था कि इस बार वे भी किस्मत आजमाएं।

    अम्मा सा लाड़, बाबा का प्यार

    अम्मा सा लाड़, बाबा का प्यार

    काव्य संगम मंच की ओर से प्रेषित यह नई कविता ''अम्मा सा लाड़, बाबा का प्यार'' में कवयित्री सोनाली कौशिक ने अपने मन की भावनाओं को उभार दिया है।

    शहीदों को नमन (कविता)

    शहीदों को नमन (कविता)

    कवियत्री प्राची थापन ने आजादी के शहीदों को नमन करते हुए अपनी कविता (शहीदों को नमन) में अपने मन को उद्गार किये हैं।

    केजरीवाल का माफी एप (व्यंग्य)

    केजरीवाल का माफी एप (व्यंग्य)

    मैंने बहुत मना किया, पर शर्मा जी चुनाव लड़ ही गये। अब चुनाव में तो कई तरह की झूठी-सच्ची बातें कहनी पड़ती हैं। शर्मा जी भी सुबह से शाम तक मुंह फाड़कर मन की भड़ास और दिमागी गंदगी बाहर निकालते रहे।

    क्यों स्वजनों से ही हो गई एकांत की लालसा? (कविता)

    क्यों स्वजनों से ही हो गई एकांत की लालसा? (कविता)

    हिंदी काव्य संगम ग्रुप से जुड़े कवि आदित्य ‘शारदांश'' द्वारा स्वरचित कविता में जीवन के संघर्ष से जुड़ी गाथा दर्शाई गई है।

    दुनिया को होना चाहिए हाथ की तरह गर्म और सुंदर

    दुनिया को होना चाहिए हाथ की तरह गर्म और सुंदर

    केदारनाथ सिंह हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार थे। केदारनाथ सिंह का जन्म 1 जुलाई 1934 ई. में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया गाँव में हुआ था। उन्होंने बनारस विश्वविद्यालय से 1956 ई. में हिन्दी में एम.ए. और 1964 में पी-एच. डी. की उपाधि प्राप्त की।

    प्रेम युद्ध (कहानी)

    प्रेम युद्ध (कहानी)

    हिन्दी काव्य संगम से जुड़े लेखक भावेश खासपुरिया द्वारा रचित कहानी प्रेम युद्ध (कहानी) में बच्चें के प्रति मां की चिंताओं को प्रमुखता से उभरा गया है।

    इक ख्वाब मुकम्मल हो गया (कविता)

    इक ख्वाब मुकम्मल हो गया (कविता)

    मुंबई के शायर समूह गुलज़ारियत की ओर से लिखी गयी यह नज़्म पाठकों को पसंद आयेगी। इसमें बड़े ही अलग अंदाज में जिंदगी से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर नजर डाली गयी है।

    बीता बचपन बहुत याद आता है मुझे (गज़ल)

    बीता बचपन बहुत याद आता है मुझे (गज़ल)

    हिन्दी काव्य संगम से जुड़ी लेखिका पूनम तनेजा द्वारा रचित गज़ल ''बीता बचपन बहुत याद आता है मुझे'' में बचपन के ख्वाबों के बारे में बताया गया है।

    पाओ बेशरम हँसी अनलिमिटेड (व्यंग्य)

    पाओ बेशरम हँसी अनलिमिटेड (व्यंग्य)

    उनका दिमाग बिना रनवे के भी ऊबड़-खाबड़ रस्ते से भी टेक-ऑफ कर लेता है और ऐसे-ऐसे जज्बाती, उत्पाती, खुराफाती तथा करामाती आइडिया लेकर लैण्ड करता है कि सब दाँतों तले उँगलियाँ दबाने लगते हैं।

    मुक्कमल सी ज़िंदगी कुछ कम क्यूँ है?

    मुक्कमल सी ज़िंदगी कुछ कम क्यूँ है?

    मुंबई के शायर समूह गुलज़ारियत की ओर से लिखी गयी यह नज़्म पाठकों को पसंद आयेगी। इसमें बड़े ही अलग अंदाज में जिंदगी से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर नजर डाली गयी है।

    हे पथिक, न हो व्यथित (कविता)

    हे पथिक, न हो व्यथित (कविता)

    हिंदी काव्य संगम ग्रुप से जुड़ी कवयित्री मोनिका कपूर द्वारा स्वरचित कविता ''हे पथिक, न हो व्यथित में जीवन के संघर्ष से जुड़ी गाथा दर्शाई गई है।

    अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो (कविता)

    अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो (कविता)

    अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर लेखिका प्राची थापन की कामना है कि अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो!

    बंदरों को आधार कार्ड क्यों नहीं ? (व्यंग्य)

    बंदरों को आधार कार्ड क्यों नहीं ? (व्यंग्य)

    हिमाचल प्रदेश में लगभग दो हज़ार बंदर हैं। इन बंदरों ने राज्य में उत्पात मचा रखा है। विधानसभा चुनावों में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने सत्ता मिलने पर बंदरों की समस्या से निजात दिलाने का वादा किया था।

    जीने दो मासूम बचपन (कविता)

    जीने दो मासूम बचपन (कविता)

    हिंदी काव्य संगम ग्रुप की ओर से प्रेषित कविता ''जीने दो मासूम बचपन'' समाज की उस गंभीर समस्या पर प्रकाश डालती है जिसमें बच्चों के ऊपर अपने सपने थोप दिये जाते हैं और उसे पूरा करने का बोझ उन पर डाल दिया जाता है।

    बिटिया हो तो रानी जैसी हो (कहानी)

    बिटिया हो तो रानी जैसी हो (कहानी)

    अब उसको 3 किलो मीटर पैदल स्कूल नहीं जाना पड़ेगा। मां बापू के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ रही है कि स्कूल की बड़ी मास्टरनी जी ने उसको अव्वल नम्बर आने पर साइकिल भेंट की है।

    जो छू लूं तुझे पूरा बदन पिघल पड़ता है (ग़ज़ल)

    जो छू लूं तुझे पूरा बदन पिघल पड़ता है (ग़ज़ल)

    हिंदी काव्य संगम मंच से जुड़े लेखक डॉ. शेखावत निकुंज द्वारा स्वरचित ग़ज़ल ''जो छू लूं तुझे पूरा बदन पिघल पड़ता है'' पढ़कर आप भी किसी के प्रेम में खो जाएंगे।

    इस बेस्वाद दुनिया में मैंने भी अपनी जगह बना ली है (कविता)

    इस बेस्वाद दुनिया में मैंने भी अपनी जगह बना ली है (कविता)

    मुंबई के शायर समूह गुलज़ारियत की ओर से लिखी गयी यह नज़्म पाठकों को पसंद आयेगी। इसमें बड़े ही अलग अंदाज में इश्क से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर नजर डाली गयी है।

    जीवन जीने के कुछ अपने ज़रूरी सलीके हैं (कविता)

    जीवन जीने के कुछ अपने ज़रूरी सलीके हैं (कविता)

    हिंदी काव्य संगम मंच की सर्वश्रेष्ठ लेखिका जिगना मेहता द्वारा स्वरचित कविता ''जीवन जीने के कुछ अपने ज़रूरी सलीके हैं'' पाठकों को जीवन के संघर्ष से रूबरू कराती है।

    अब रोबोट को भी आराम की ज़रूरत है (व्यंग्य)

    अब रोबोट को भी आराम की ज़रूरत है (व्यंग्य)

    जी आपने सही सुना। रोबोट भी लगातार एक जैसा काम करते हुए अपने काम से उकता गया है। रोज अपनी बैटरी चार्ज करवाना और बिना रूके एक जैसा काम करना यही तो दिनचर्या है इन रोबोट की।

    हम तिल तिल रोये बिन तेरे, तुम पल पल हमको भूल गये (कविता)

    हम तिल तिल रोये बिन तेरे, तुम पल पल हमको भूल गये (कविता)

    हिंदी काव्य संगम मंच की लेखिका प्रियदर्शनी शांडिल्य की ओर से भेजी गयी इस कविता में अपने प्रियतम को शब्द रूपी मोतियों को जोड़-जोड़ कर प्रेम का इजहार किया गया है।

    छोटी–छोटी गोल मटोल सरसों के बड़े बड़े लहलहाते खेत बहार लाते हैं

    छोटी–छोटी गोल मटोल सरसों के बड़े बड़े लहलहाते खेत बहार लाते हैं

    सर्दी का मौसम खिसकने की तैयारी में होता है तो वासंती सपने हौले से जीवन में प्रवेश कर जाते हैं। खुली आंखों से दिख रहे इन सपनों की शुरूआत होती है हरे रंग की गोद में खुशबू में लिपटे हुए सुर्ख पीले रंग के फूलों से।

    रोक दें क्या वक्त को हम? या अगली मुलाकात हो...

    रोक दें क्या वक्त को हम? या अगली मुलाकात हो...

    इक रात हो, तू साथ हो। अपने साथी से मुलाकात के ख्वाबों को लेकर संजोयी गयी यह कविता मुंबई के शायर समूह गुल्ज़ारियत की ओर से लिखी गयी है। आप भी जरा गौर फरमाएं...

    नेताओं की खरीद-फ़रोख़्त पर भी जीएसटी लगे (व्यंग्य)

    नेताओं की खरीद-फ़रोख़्त पर भी जीएसटी लगे (व्यंग्य)

    घर में घोड़ा रखना और आईपीएल मैच के लिए नामी क्रिकेट खिलाड़ी को अपनी टीम में रखना बड़े आन, बान और शान की बात है। घोड़ों की खरीदी बिक्री साधारण बाजार में नहीं होती है।

    पत्रकारिता के माध्यम से लोकजागरण के प्रयास करते रहे मुज्जफर हुसैन

    पत्रकारिता के माध्यम से लोकजागरण के प्रयास करते रहे मुज्जफर हुसैन

    इन चार दशकों में उनका लिखा-बोला गया विपुल साहित्य उपलब्ध है। दैनिक अखबारों समेत, पांचजन्य जैसे पत्रों में उन्होंने नियमित लिखा है। उस पूरे साहित्य को एकत्र कर उनके लेखन का समग्र प्रकाशित होना चाहिए।

    इस बेहद से इश्क की हदों को न आज़माया करो तुम...

    इस बेहद से इश्क की हदों को न आज़माया करो तुम...

    मुंबई के शायर समूह गुल्ज़ारियत की ओर से लिखी गयी यह नज़्म पाठकों को पसंद आयेगी। इसमें बड़े ही अलग अंदाज में इश्क से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर नजर डाली गयी है।

    बुढ़ापे में वैलेंटाइन (सामयिक व्यंग्य)

    बुढ़ापे में वैलेंटाइन (सामयिक व्यंग्य)

    उम्र के सातवें दशक की दहलीज पर खड़े रामविभूति सिंह ने वैलेंटाइन डे की पूर्व संध्या पर अपनी अर्द्धांगिनी सुहासिनी का हाथ होले से दबाते हुए कहा- "कल अपुन भी घूमने चलते हैं- किसी पार्क में बैठेंगे.. मॉल में घूमेंगे।

    वही शिव है, वही संत है (कविता)

    वही शिव है, वही संत है (कविता)

    महाशिवरात्रि पर्व पर भगवान शिव शंकर की महिमा का बखान करती है वरिष्ठ पत्रकार संजय तिवारी की यह कविता। ''कुछ अंत है, कहीं अनंत है, वही शिव है, वही संत है।''

    हिन्दी के अग्रणी कवि कुमार विश्वास के जन्मदिन पर जानिये उनके बारे में

    हिन्दी के अग्रणी कवि कुमार विश्वास के जन्मदिन पर जानिये उनके बारे में

    कुमार विश्वास हिन्दी के एक अग्रणी कवि तथा सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता हैं। कविता के क्षेत्र में श्रृंगार के गीत इनकी विशेषता है। उनके जन्मदिन पर जानते हैं उनके बारे में।

    मोबाइल न छूटे...(व्यंग्य)

    मोबाइल न छूटे...(व्यंग्य)

    आजकल तो देश के कई भागों में पानी की किल्लत होने लगी है; पर सौ साल पहले चेरापूंजी सबसे अधिक और राजस्थान सबसे कम वर्षा वाला क्षेत्र था। इसीलिए राजस्थान में पानी पर सैकड़ों लोकगीत, कहानियां और कहावतें बनी हैं।

    रविंदर सिंह की उपन्यास में दिखाई देती है उनकी प्रेमिका की झलक

    रविंदर सिंह की उपन्यास में दिखाई देती है उनकी प्रेमिका की झलक

    पुस्तकों के प्रेमियों के लिए कुछ खास पलों में से एक आज का दिन है क्योंकि आज रविंदर सिंह का जन्मदिन है। बता दें कि रविंदर सिंह का जन्म उड़ीसा के संभलपुर के बुर्ला गाँव में हुआ था।

    थानेदार मुर्गा (व्यंग्य)

    थानेदार मुर्गा (व्यंग्य)

    इस शीर्षक को पढ़कर मुर्गा नाराज होगा या थानेदार, ये कहना कठिन है; पर कुछ घटनाएं पढ़ और सुनकर लग रहा है कि भविष्य में ऐसे दृश्य भी दिखायी दे सकते हैं। असल में पिछले दिनों म.प्र. के बैतूल नगर में एक अजीब घटना हुई।

    गणतन्त्री संकल्पों का परिणाम प्रतीक्षारत है

    गणतन्त्री संकल्पों का परिणाम प्रतीक्षारत है

    लेखक संजय तिवारी के द्वारा गणतंत्र दिवस पर रचित यह कविता उनके मन के भावों को तो प्रकट करती ही है साथ ही देश के हालात को भी बयां करती है।

    बजटजी आने वाले हैं (व्यंग्य)

    बजटजी आने वाले हैं (व्यंग्य)

    रसोई के अन्दर बजट बिजली की मानिंद गिरता है और खानापीना खराब करता है। वैसे हमने आजकल पुराने प्रसिद्ध थ्री आर यानी ‘रिसाईकल रियूज रिड्यूस’ पर ज़ोर दे रखा है मगर जीवित रहने के लिए खाना पूरा खाना पड़ता है।

    भ्रष्टाचार, हमारा मूलभूत अधिकार (व्यंग्य)

    भ्रष्टाचार, हमारा मूलभूत अधिकार (व्यंग्य)

    बुजुर्गों का कहना है कि बेटे कब बड़े और बेटियां कब जवान हो जाती हैं, इसका पता ही नहीं लगता। यही हाल हमारे महान भारत देश का है। कब, किस दिशा में हम कितना आगे बढ़ जाएंगे, कहना कठिन है।

    सिक्का और पर्ची न्याय (व्यंग्य)

    सिक्का और पर्ची न्याय (व्यंग्य)

    प्रायः शर्मा जी मेरे घर नहीं आते। बुजुर्ग व्यक्ति हैं, इसलिए मैं ही दूसरे-चौथे दिन उनके घर चला जाता हूं; पर आज ठीक से सुबह हुई भी नहीं थी कि वे आ गये। उनकी आंखें न्यायमूर्ति चेलमेश्वर जैसी ही उदास थीं।

    साहित्य को  धंधा बना देने वाले साफ हो जायेंगे : दूधनाथ सिंह

    साहित्य को धंधा बना देने वाले साफ हो जायेंगे : दूधनाथ सिंह

    दूधनाथ सिंह नहीं रहे। कथाकार दूधनाथ सिंह नहीं रहे। आलोचक दूधनाथ सिंह नहीं रहे। लगभग साठ वर्षों से अनवरत चलती रही रचना यात्रा को विराम लग गया। वह सुस्ताने चली गयी।

    शपथ का नवीनीकरण (व्यंग्य)

    शपथ का नवीनीकरण (व्यंग्य)

    पिछले साल शुरू हुई छुट्टियाँ नए साल में खत्म हो गईं। सातवीं क्लास में पढ़ने वाला युवा हो चुका रेकी (स्वयं रखा निकनेम) स्कूल जाने को अपना बैग रिसैट करने लगा तो उसकी मम्मी ने सोचा सिलेबस थोड़ा रिवाइज़ करवा दूं।

    विश्व हिंदी दिवस पर अपनी भाषा की विलक्षणता का उत्सव मनाएं

    विश्व हिंदी दिवस पर अपनी भाषा की विलक्षणता का उत्सव मनाएं

    आज भारत−भारती की भाषा हिंदी के प्रति अपनी विनम्र आदरांजलि व्यक्त करने का दिन है। हिंदी राजभाषा भी है और जनभाषा भी है। हिंदी का अपना समृद्ध इतिहास रहा है।

    साहित्य जगत के 'महानायक' माने जाते हैं मोहन राकेश

    साहित्य जगत के 'महानायक' माने जाते हैं मोहन राकेश

    मोहन राकेश हिंदी साहित्य के उन चुनिंदा साहित्यकारों में हैं जिन्हें ''नयी कहानी आंदोलन'' का नायक माना जाता है और साहित्य जगत में अधिकांश लोग उन्हें उस दौर का ''महानायक'' कहते हैं।

    कांग्रेसी संस्कृति के नये अध्याय (व्यंग्य)

    कांग्रेसी संस्कृति के नये अध्याय (व्यंग्य)

    सुना है ‘मैडम कांग्रेस’ के अध्यक्ष राहुल बाबा जब वहां चुनावों में हुई दुर्गति की समीक्षा करने के लिए गये, तो बैठक स्थल पर एक विधायक महोदया की कुछ पुलिस वालों से मुठभेड़ हो गयी।

    अनवर जलालपुरी का चले जाना उर्दू कविता की वाचिक परंपरा के युग का अंत

    अनवर जलालपुरी का चले जाना उर्दू कविता की वाचिक परंपरा के युग का अंत

    पार्थिव देह से वह चले ही गए। सोगवार न होने की कसम दिला कर। ख़याल की रेखा में बाँध कर। लौट कर आने का वादा कर गए। सच है, हिंदी-उर्दू मंचों की वाचिक परंपरा के एक युग का अंत हो गया।

    बृजलाल द्विवेदी सम्मान से अलंकृत किए जाएंगे ‘अलाव’ के संपादक रामकुमार कृषक

    बृजलाल द्विवेदी सम्मान से अलंकृत किए जाएंगे ‘अलाव’ के संपादक रामकुमार कृषक

    हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को सम्मानित किए जाने के लिए दिया जाने वाला पं. बृजलाल द्विवेदी अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान इस वर्ष ‘अलाव’ (दिल्ली) के संपादक श्री रामकुमार कृषक को दिया जाएगा।

    बंदरों की बंदरबांट (व्यंग्य)

    बंदरों की बंदरबांट (व्यंग्य)

    सात दशक से ज्यादा बीत गए, आम आदमी की समस्याएं उलझती जा रही हैं आम जानवरों की दिक्कतों को कौन सुनेगा। हमारी हरकतों ने बार बार साबित किया है कि बंदर ही हमारे पूर्वज हैं। देश के पहाड़ी राज्यों में बंदर अब एक समस्या बन चुके हैं।

    कब आयेगा वह दिन जब अपनी भाषा में मिलने लगेगा न्याय?

    कब आयेगा वह दिन जब अपनी भाषा में मिलने लगेगा न्याय?

    कभी सोचा है कि अपनी विशाल प्राचीन संस्कृति के रहते भी भारत के लोग एक पिद्दी से देश इंग्लैंड को महान क्यों मानते हैं, जबकि उसके पड़ोसी फ्रांस, जर्मनी, हॉलैंड, स्पेन, पुर्तगाल, इटली इत्यादि उसकी ज्यादा परवाह नहीं करते।

    रोबोट अगर जनप्रतिनिधि बन गये तो? (व्यंग्य)

    रोबोट अगर जनप्रतिनिधि बन गये तो? (व्यंग्य)

    वैज्ञानिकों ने दुनिया का पहला कृत्रिम बुद्धि वाला राजनीतिज्ञ विकसित किया है उसे 2020 में न्यूजीलैंड में होने वाले आम चुनाव में उम्मीदवार बनाया जायेगा। इस आभासी राजनीतिज्ञ का नाम सैम (एस ए एम) रखा गया है।

    मानहानि का मुकदमा (व्यंग्य)

    मानहानि का मुकदमा (व्यंग्य)

    कल शाम शर्मा जी के घर गया, तो पता लगा कि वे किसी बड़े वकील के पास गये हैं। सज्जन व्यक्ति से मिलने थाने से कोई आ जाए या फिर उसे ही वकील के पास जाना पड़े, तो इसे भले लोगों की बिरादरी में अच्छा नहीं माना जाता।

    राजतंत्र का तबेला (व्यंग्य)

    राजतंत्र का तबेला (व्यंग्य)

    शर्मा जी की खुशी का पारावार नहीं था। जैसे पक्षी नहाने के बाद पंख झड़झड़कार आसपास वालों को भी गीला कर देते हैं, ऐसे ही शर्मा जी अपने घर से सामने से निकलने वालों को मिठाई खिलाकर गरम चाय भी पिला रहे थे।

    रहमतों की बारिश (ईद मिलाद-उन-नबी पर विशेष)

    रहमतों की बारिश (ईद मिलाद-उन-नबी पर विशेष)

    हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को समर्पित कलाम...

    खिचड़ी अकबर को भी पसंद थी, मोदीजी को भी है (व्यंग्य)

    खिचड़ी अकबर को भी पसंद थी, मोदीजी को भी है (व्यंग्य)

    खिचड़ी नियमित खाई जाए तो गरीबी फेल हो सकती है और सेहत पास। शायद ज्यादा लोगों को पता नहीं होगा कि मध्यकालीन डिश खिचड़ी मुग़ल सम्राट अकबर की भी पसंदीदा थी, ‘न्यू इंडिया सम्राट’ मोदीजी की तो फेवरेट है ही।

    रसगुल्ला युद्ध का मीठा समाधान (व्यंग्य)

    रसगुल्ला युद्ध का मीठा समाधान (व्यंग्य)

    कल सुबह शर्मा जी पार्क में घूमने आये, तो उनके हाथ में कोलकाता के प्रसिद्ध हलवाई के.सी. दास के रसगुल्लों का एक डिब्बा था। उन्होंने सबका मुंह मीठा कराया और बता दिया कि सरदी बढ़ गयी है।

    समीक्षा: गीत संग्रह ‘गीत अपने ही सुनें' का प्रेम-सौंदर्य

    समीक्षा: गीत संग्रह ‘गीत अपने ही सुनें' का प्रेम-सौंदर्य

    हिन्दी साहित्य की सामूहिक अवधारणा पर यदि विचार किया जाए तो आज भी प्रेम-सौंदर्य-मूलक साहित्य का पलड़ा भारी दिखाई देगा; यद्यपि यह अलग तथ्य है कि समकालीन साहित्य में इसका स्थान नगण्य है।

    दिन में तोड़ो, रात में जोड़ो (व्यंग्य)

    दिन में तोड़ो, रात में जोड़ो (व्यंग्य)

    रात में हम बांस-बल्ली गाड़कर बड़े-बड़े होर्डिंग लगाते हैं। बड़ा नगर है, इसलिए जिस क्षेत्र से आज अतिक्रमण हटाया है, वहां दोबारा जाने का नंबर छह महीने बाद ही आता है। इतने समय में लोग फिर कब्जा कर लेते हैं।

    हिंदी के लिए तो एक पूरा युगे थे स्वर्गीय कुँवर नारायण

    हिंदी के लिए तो एक पूरा युगे थे स्वर्गीय कुँवर नारायण

    कुंवर नारायण नहीं रहे। नई कविता आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर कवि कुंवर नारायण का 90 साल की उम्र में बुधवार को निधन हो गया। मूलरूप से फैजाबाद के रहने वाले कुंवर तकरीबन 51 साल से साहित्य में सक्रिय थे।

    स्वर्ग में विकास का धुआं (व्यंग्य)

    स्वर्ग में विकास का धुआं (व्यंग्य)

    भगवान को कल रात दुनिया के अनगिनत पंगे निबटाते बहुत देर हो गई। नींद भी देर से आई, थकावट के कारण आज सुबह थोड़ा लेट उठना चाहते थे, मगर पत्नी आई बोली उठिए श्रीमानजी हमारे घर के आसपास काला धुंआ फैला हुआ है।

    जुगाड़ पे दुनिया कायम है (व्यंग्य)

    जुगाड़ पे दुनिया कायम है (व्यंग्य)

    कुछ जुगाड़ लगाओ। यह सुनकर मैं दार्शनिक अंदाज में बोला, प्रिये, जुगाड़ करने की कला मुझे अपनी सांस्कृतिक विरासत में मिली ही नहीं है। वैसे मेरे साथी लोग भी हमेशा कहा करते हैं कि तुम्हारी शिक्षा अधूरी है।

    ऐसे कैसे भ्रष्टाचार मिटा देंगे...(व्यंग्य)

    ऐसे कैसे भ्रष्टाचार मिटा देंगे...(व्यंग्य)

    आजकल शादी-विवाह का सीजन है। देवोत्थान एकादशी कुछ दिन पहले ही थी। चार महीने बाद गहरी नींद से देवता जगे और बाकी सारे काम छोड़कर शादियों में व्यस्त हो गये।

    बाबा और बाबा की कमर का दर्द (व्यंग्य)

    बाबा और बाबा की कमर का दर्द (व्यंग्य)

    इस देश में बाबाओं का व्यवसाय शानदार चल रहा है या ऐसा समझ लो कि इस धंधे में चाँदी ही चाँदी है। इस देश में बाबाओं की महिमा अपरम्पार है। बाबाओं में अपार शक्ति होती है।

    ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ (पुस्तक समीक्षा)- इंद्रेश कुमार (संघ प्रचारक)

    ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ (पुस्तक समीक्षा)- इंद्रेश कुमार (संघ प्रचारक)

    वरिष्ठ लेखिका फिरदौस खान की प्रकाश स्तंभ जैसी यह पुस्तक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ सभी देशवासियों को इस सच्ची राह पर चलने की हिम्मत प्रदान करेगी।

    देश भक्ति ओढ़ने की चीज़ है (व्यंग्य)

    देश भक्ति ओढ़ने की चीज़ है (व्यंग्य)

    हालांकि यह समझाया गया है कि देश भक्ति प्रमाणित करने या बाज़ू पर चिपका कर चलने की चीज़ नहीं है पर मैं ससम्मान नम्र अनुरोध करना चाहता हूँ कि देश भक्ति ओढ़ने की चीज़ है।

    पधारो म्हारे देस जी... (व्यंग्य)

    पधारो म्हारे देस जी... (व्यंग्य)

    पिछले हफ्ते मैं शर्मा जी के घर गया, तो वे दोनों आंखें बंद किये, एक हाथ कान पर रखे और दूसरा ऊपर वाले की तरफ उठाये गा रहे थे, ‘‘पधारो म्हारे देस जी...।’’ कभी वे दाहिना हाथ कान पर रखते तो कभी बायां।

    भिखारी डिजिटल क्यों न हों? (व्यंग्य)

    भिखारी डिजिटल क्यों न हों? (व्यंग्य)

    दुनिया परिवर्तनशील है। इसलिए भीख के तौर-तरीके भी बदल रहे हैं। पहले भिखारी बड़ी दीनता से भीख मांगते थे, तो मना करने वाला हाथ जोड़ देता था; पर आजकल मांगने वाले डंडा ठोक कर मांगते हैं, तो मना करने वाले भी ऐसी सुनाते हैं कि मंगता पानी-पानी हो जाए।

    मनाएंगे दीपावली का शुभ त्यौहार (कविता)

    मनाएंगे दीपावली का शुभ त्यौहार (कविता)

    प्रस्तुत है युवा लेखिका प्राची थापन की ओर से रचित कविता ''मनाएंगे दीपावली का शुभ त्यौहार''।

    फिर बसाओ खुशियों का जहां

    फिर बसाओ खुशियों का जहां

    युवा लेखक सनुज द्वारा रचित कविता ''फिर बसाओ खुशियों का जहां'' में दीवाली त्योहार और उसके सामाजिक संदेश पर सरल शब्दों में प्रकाश डाला गया है।

    हम काम से नहीं डरते (व्यंग्य)

    हम काम से नहीं डरते (व्यंग्य)

    जैसे-तैसे पानी की लाइन ठीक हुई। शर्मा जी तो उस दिन छह बार नहाये; पर उस लाइन के कारण जो सड़क टूटी, उसे ठीक से पाटा नहीं गया। इस चक्कर में कई लोग चोट खा गये।

    तो क्या हाथी निकलेगा? (व्यंग्य)

    तो क्या हाथी निकलेगा? (व्यंग्य)

    दुनिया में शाकाहारी अधिक हैं या मांसाहारी; शाकाहार अच्छा है या मांसाहार; फार्म हाउस के अंडे और घरेलू तालाब की छोटी मछली शाकाहार है या मांसाहार; मांस में भी झटका ठीक है या हलाल; ताजा पका हुआ मांस अच्छा है...

    अस्पताल में ज्योतिषी (व्यंग्य)

    अस्पताल में ज्योतिषी (व्यंग्य)

    मुरारी लाल जी की सपनों की दुनिया के लिए यह एक बेहतरीन ख़बर थी। उस दिन सपने में ही उन्होंने ज्योतिषियों की नियुक्ति कर डाली और लगे हाथ ख़ुद को एक बड़े अस्पताल के अंदर पाया।

    डिजीटल शौचालयः सुविधा से मुसीबत तक (व्यंग्य)

    डिजीटल शौचालयः सुविधा से मुसीबत तक (व्यंग्य)

    भारत की हमारी महान सरकार ने तय कर लिया है कि वो हर चीज को डिजीटल करके रहेगी। वैसे तो ये जमाना ही कम्प्यूटर का है। राशन हो या दूध, रुपये पैसे हों या कोई प्रमाण पत्र।

    राजनीति का कोढ़ है वंशवाद (व्यंग्य)

    राजनीति का कोढ़ है वंशवाद (व्यंग्य)

    कल शर्मा जी मेरे घर आये, तो हाथ में मिठाई का डिब्बा था। उसका लेबल बता रहा था कि ये ‘नेहरू चौक’ वाले खानदानी ‘जवाहर हलवाई’ की दुकान से ली गयी है। डिब्बे में बस एक ही बरफी बची थी। उन्होंने वह मुझे देकर डिब्बा मेज पर रख दिया।

    परबुद्ध सम्मेलन (व्यंग्य)

    परबुद्ध सम्मेलन (व्यंग्य)

    कार्यक्रम में पहुंचे, तो मैंने आसपास देखा। अगली लाइन में ‘भारत साइकिल स्टोर’ के मालिक रम्मू भैया बैठे थे। यों तो वे छठी पास थे; पर अपनी जुगाड़ बुद्धि से उन्होंने पैसा अच्छा कमा लिया था।