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साहित्य जगत

बिटिया हो तो रानी जैसी हो (कहानी)

By डॉ. अम्बिका बंसल | Publish Date: Mar 7 2018 11:11AM

बिटिया हो तो रानी जैसी हो (कहानी)
Image Source: Google

आज रानी बहुत खुश है क्योंकि आज उसे अपने स्कूल से नयी साइकिल जो मिली है। अब उसको 3 किलो मीटर पैदल स्कूल नहीं जाना पड़ेगा। मां बापू के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ रही है कि स्कूल की बड़ी मास्टरनी जी ने उसको अव्वल नम्बर आने पर साइकिल भेंट की है। रोज वह उसको झाड़ती व पोछती तथा रोज स्कूल जाती। रानी कक्षा 5 की छात्रा है लेकिन अचानक से उसके बापू की तबियत खराब रहने लगी। पहले की तरह बापू अब खेत नहीं जाते हैं। रानी समझ भी नहीं पा रही थी कि बापू को कौन सी बीमारी है। कुछ समय बाद जब वह मामा के घर से लौटती है तो अपनी नयी साइकिल को ना पाकर वह फूट फूट कर रोने लगती है कल तक तो यहीं थी, कौन ले गया 'मेरी साइकिल' ?

अब किसी की भी संवेदनाओं का उस पर कोइ असर नहीं पड़ रहा था। वह रोये ही चली जा रही थी। मां ने तभी उस पर चिल्लाते हुए कहा। क्यों रो रही है! क्या जिसके पास साइकिल नहीं होती वो पढ़ने नहीं जाते तेरे बापू की भी साइकिल रखी है उसे चलाकर ले जाना, रोकर मेरा दिमाग मत खराब कर। अरी नादान गरीबों के सपने पूरे ही कहां होते हैं ये केवल देखने के लिये होते हैं जो सच नहीं होते। ऐसा कहकर मां सेठानी के घर चली गयी जो पूरी तरह से लकवे की बीमारी से लाचार थी। रानी की मां सेठानी जी की पूरी सेवा करती। जब से रानी के बापू खाट से लगे हैं तब से मानो खुशियां ही कहीं चली गयी हों अब रानी सोच ही नहीं पा रही थी कि कैसे वह पुरानी साइकिल से स्कूल जायेगी क्योंकि वह बापू की 15 साल पुरानी साइकिल को बूढ़ी साइकिल कहती थी अब तो उसे इसी से ही काम चलाना होगा।
 
क्या करे बेचारी, रानी रात दिन अपनी नयी साइकिल की याद में जागती व सोती रहती। उधर बापू की तबियत दिन पे दिन बिगड़ती जा रही थी। दवाई का भी बनदोबस्त नहीं हो पा रहा था। मां की चिन्ता दिन रात बढ़ती ही जा रही थी। सेठानी जी उसे देती ही कितना है केवल 50 रूपया रोज का? ऐसी महंगाई में घर को चलाना सम्भव हो पायेगा नहीं आज डॉक्टर बाबू रानी के बापू को शहर वाले बड़े अस्पताल में ले जाने की बात कर रहे थे अगर ये नहीं गये तो इनका बच पाना फिर मुश्किल होगा। रानी की मां अब इतनी निराश हो गई थी कि धरोहर के रूप में उसकी शादी में दिये हुए कंगन ही अब बचे थे। रह रह कर उसे ये ही ख्याल सता रहा था कि वह रानी के बापू की जान कैसे बचाये वह एक खत रानी की मौसी को भेज देती है तभी सन्नू अगली गाड़ी से आ पहुंचती है। घर के हालात देखकर उससे रहा नहीं गया और पूछ ही बैठती है क्या हम इतने बेगाने हो गये हैं दीदी कि पहले से हमें खबर भी करना नहीं चाहा। 'नहीं सन्नू' रानी की मां कुन्ती ने कहा, धीरे धीरे दोनों बहनें एक दूसरे को अपना अपना दुख बताकर मन हल्का कर रही थीं शाम का वक्त हो गया था। चाय व खाना खाकर सन्नू शाम की 4 वाली रेलगाड़ी से रामपुर चली गयी। रानी अभी भी नहीं समझ पा रही थी कि बापू को कौन सी बीमारी है। एक दिन उसने अपनी मां से पूछ ही लिया 'मां बापू को कौन सी बीमारी है? क्या वो अब कभी भी खेत पर नहीं जा पायेंगे और मैं खेत पर नहीं जा पाउंगी। ऐसा सुन कर कुन्ती ने उत्तर दिया 'नहीं नहीं'− ऐसा कुछ नहीं है तुम खेत पर भी जा पाओगी और बापू भी जल्द ही अच्छे हो जायेंगे।
 
रानी का मन अब धीरे धीरे नयी साइकिल को भूला चुका था अब वह अपनी परीक्षा की तैयारी में जुटी है। इस बार वह अच्छे नम्बर लायेगी और बड़ी मास्टरनी जी से कुछ और ही मांगेगी। मन के सपने रानी के मन में ही बुनते रहे। मां और काम की तलाश में जगह जगह जाकर काम पूछती लेकिन कोई भी सही काम बताने को तैयार नहीं था। हार थक के जब काम नहीं मिला तो कुन्ती ने अपने ही खेतों में खेती करने की ठानी। बंजर होती जमीन अब इतनी बेकार हो चुकी थी कि उस जमीन को जोतने के लिये अब कठोर मेहनत की जरूरत थी। वह खेतों के बीच खड़ी सोचती रही कि खेतों का काम वह अकेली कैसे कर पायेगी।
                                                                                                                                                  
रानी अब अच्छी तरह मां की परेशानियों को समझ पा रही थी तभी उसने मां से कहा- मां क्या हम दोनों मिलकर खेतों का काम नहीं कर सकते? तुम भी तो दिन भर बाहर रहती हो और बापू की दवाई भी अब खत्म होने जा रही है और तुम्हें याद है कि डॉक्टर बाबू ने क्या कहा था। अगर समय पर इनका इलाज नहीं हो पाया तो बचना नामुमकिन है। अगले दिन से रानी और उसकी मां खेत में जाकर मेहनत करने लगी। रानी सुबह 5 बजे उठ जाती। पढ़ती, फिर स्कूल जाती और दोपहर से दिन छिपे तक खेतों में मां के साथ हाथ बंटवाती। दिन बीतते गये, महीना भर हो चला था जो बीज उन्होंने बोये थे वह भी अब पूरी तरह से अंकुरित नहीं हो पा रहे थे। मेहनत पानी पानी हो चुकी थी। समय पर रानी के बापू का इलाज होना जरूरी था। इतने दिन तक तो कुन्ती ने अपने कंगन बेचकर गुजारा कर लिया था लेकिन अब खाने के लिये कुछ नहीं बचा था। 15 दिन से रानी की मां कुन्ती शहर के बड़े अस्पताल मे रह रही है। मौसा व मौसी भी कभी कभी  स्पताल जाकर मां को सांत्वना देते रहते हैं। बेहोशी की हालत में रमेश अपनी रानी बिटिया का नाम पुकारे चले जा रहे थे। गरीबी के आगे जीवन को अक्सर दम तोड़ते देखा है। बड़ों के मुंह से सुना था कि भगवान हमेशा गरीबों व दीन दुखियों की सुनते हैं लेकिन कुन्ती के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। ये कैसी विडम्ना है कि गरीब के आंसू बेमोल बिक जाते हैं और अमीर हर वस्तु खरीदने के लिये तैयार रहते हैं।
 
रमेश अब धीरे धीरे ठीक हो रहा था। दवाई अपना असर दिखा रही थी। अस्पताल से छुट्टी मिल चुकी थी। एक दिन रमेश अपने आप को ना रोक सका और पूछ ही बैठा। कुन्ती जी बिटिया की नयी साइकिल नहीं दिख रही है कहां है जी ? मुझे तो कोई सी भी नहीं दिखाई दे रही है ना बूढ़ी ना ही नयी, कुन्ती घबराते हुए बोली- अरे साइकिल की क्यों फिक्र कर रहे हो पहले तुम अच्छे हो जाओ फिर खुद ही देख लेना। रानी के बापू टी0बी0 की बीमारी से पूरी तरह से आजाद हो चुके थे। दोपहर को रानी जब घर लौटी तो बापू की बूढ़ी साइकिल ना पाकर उदास हो गयी, वह जाकर बापू की गोद में बैठकर मां से कह ही देती है मां साइकिल कहां है। कुन्ती अब सोच में पड़ गयी थी कि वह अब कैसे बतायेगी कि उसने रानी के बापू के इलाज के लिये दोनों साइकिलें एक दुकानदार को बेच दी हैं। आसमान की तरफ देखते हुए कुन्ती ने लम्बी सांस भरी।
 
उधर रानी निराश व दुखी मन से बैठी थी इस इंतजार में कि कोई आकर हमारी दोनों साइकिलें देगा। तारों की छांव में रात बीत जाती है। आज परीक्षा परिणाम निकलने वाला है। रानी का उत्साह देखते ही बनता था कि हमारे प्रदेश की मुख्यमंत्री जी डॉ. भीमराव अम्बेडकर जयंती पर उसके गांव के पुराने स्कूल में पधार रही हैं। बड़ी मास्टरनीजी के चेहरे पर भी खुशी की लहर दौड रही थी। इंतजार की घड़ियां खत्म हो चुकी थीं। स्टेज पर जब रानी का नाम बुलाया गया तो वह क्षण देखने जैसा था। कन्याधन योजना के अर्न्तगत उन्होंने एक स्कूटी इनाम के रूप में उसको भेट की। रानी ने अपनी मेहनत से अच्छे नम्बर लाकर केवल अपने गांव का ही नहीं बल्कि प्रदेश का नाम रोशन किया है। कुन्ती और रमेश आज बहुत खुश हैं। रानी अब आई0ए0एस बन चुकी है उसके गांव में अब अस्पताल आ चुका है। टी0बी0 के इलाज के लिये गांव में ही सुविधा उपलब्ध है। आज रानी के मां बापू को सपनों का आशियाना जो मिला। बिटिया हो तो रानी जैसी हो। बापू ने कहा।
 
डॉ. अम्बिका बंसल
प्रवक्ता राजनीति शास्त्र
चांदपुर बिजनौर

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