Prabhasakshi
सोमवार, जून 25 2018 | समय 07:32 Hrs(IST)

साहित्य जगत

जीने दो मासूम बचपन (कविता)

By निधि सहगल | Publish Date: Mar 7 2018 5:18PM

जीने दो मासूम बचपन (कविता)
Image Source: Google

हिंदी काव्य संगम ग्रुप की ओर से प्रेषित कविता 'जीने दो मासूम बचपन' समाज की उस गंभीर समस्या पर प्रकाश डालती है जिसमें बच्चों के ऊपर अपने सपने थोप दिये जाते हैं और उसे पूरा करने का बोझ उन पर डाल दिया जाता है।

अपेक्षाओं के बादल पर,
मासूम नन्हें पौधों को सजाकर,
हर माली मुस्कुरा रहा है,
अपनी सजावट पर इतरा रहा है,
 
विस्मृत हो नहीं देख पा रहा,
उन कृत्रिम मुस्कानों को,
 
दबे अश्रुओं के ऊपर उभर आई हैं जो,
पूर्ण करने उनके अरमानों को,
 
आज फिर एक पौधे ने दम तोड़ दिया,
अपेक्षाएं पूर्ण न कर पाने पर,
 
स्वयं को मृत्यु से जोड़ लिया,
उम्मीद का बादल थरथरा के गिर पड़ा,
 
"हाय! क्या कमी रह गई", कह माली रो गया,
सबने देखा उसका बिफरापन,
 
किया अफसोस पर समझ ना पाये ,
क्यों उजड़ा मासूम बचपन,
 
होड़ के बाजार में लुटते हैं, ये नन्हें मासूम,
दादी- बाबा की कहानियों से हो जाते हैं मरहूम,
 
संस्कारों और शरारतों का किला कहीं ढह जाता है,
पर कोई भी माली ये बात समझ नहीं पाता है,
 
"हर मासूम अपनी क्षमतानुसार प्रतिभा की खान है,
इन पर अपनी अपेक्षाओं का बोझ लादना,
मूर्खता की पहचान है,
 
खुलकर जीने दो इन्हें, अपनी प्रतिभाओं के संग,
खिलने दो इन पर इनकी क्षमताओं का रंग।"
 
-निधि सहगल 
(आगरा, उत्तर प्रदेश)

रहना है हर खबर से अपडेट तो तुरंत डाउनलोड करें प्रभासाक्षी एंड्रॉयड ऐप



Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his/her private capacity and do not necessarily reflect the opinions, beliefs and viewpoints of Prabhasakshi and do not in any way represent the views of Prabhasakshi.

शेयर करें: