Prabhasakshi
शनिवार, अप्रैल 21 2018 | समय 07:40 Hrs(IST)

कहानी/कविता/ग़ज़ल

दफ़ा कर दो इश्क़ (ग़ज़ल)

By स्मिता मिश्रा | Publish Date: Apr 11 2018 4:45PM

दफ़ा कर दो इश्क़ (ग़ज़ल)
Image Source: Google

हिन्दी काव्य संगम से जुड़ीं लेखिका स्मिता मिश्रा द्वारा रचित 'बा-बहर' ग़ज़ल में प्रेमी से मिले धोखे से हुई पीड़ा का वर्णन किया गया है।

मुहब्बत थी बला जैसी कयामत थी लगी क्या थी,
नज़र इक़रार कर बैठी शमा जल जल बुझी क्या थी।
 
चली आओ वहां से तुम ज़रूरी बात है थोड़ी 
बहक जाता ज़रा मैं भी हवा में मय घुली क्या थी।
 
वहम-ए-ख़ुद बढ़ा इतना दिखी दूरी नहीं ख़ुद से, 
खुदा ने आग जब थामी समझ आया बुझी क्या थी।
 
वस्ल की रात आंगन में खुली आँखें खुली बाहें,
महर-मह जगमगाया था तिरी सादा-दिली क्या थी,
 
बहुत देखा बहुत सोचा मिला धोखा न तुम जैसा,
गलत तय था सही तय था भला बातें चुभी क्या थी।
 
'स्मिता' मैला इश्क़ पेशा रहा होगा सनम तेरा,
दफ़ा कर दो इश्क़ झूठा वफ़ा बिन दिल्लगी क्या थी।
 
-स्मिता मिश्रा 
लखनऊ

Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his/her private capacity and do not necessarily reflect the opinions, beliefs and viewpoints of Prabhasakshi and do not in any way represent the views of Prabhasakshi.