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वैज्ञानिक अनुसंधान की बुनियाद के पीछे था “नेहरू-भटनागर प्रभाव

By नवनीत कुमार गुप्ता | Publish Date: Feb 22 2018 1:04PM

वैज्ञानिक अनुसंधान की बुनियाद के पीछे था “नेहरू-भटनागर प्रभाव
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नवनीत कुमार गुप्ता (इंडिया साइंस वायर): शांतिस्वरूप भटनागर का नाम भारत के उन अग्रणी वैज्ञानिकों में शामिल किया जाता है, जिन्होंने विज्ञान की मदद से औद्योगिक समस्याओं को हल करने में अहम भूमिका निभायी है। उन्हें देश के सबसे बड़े शोध संगठन वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के संस्थापक के रूप में याद किया जाता है। स्वतंत्रता के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने देश के विकास में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की भूमिका को समझते हुए शोध संस्थानों की स्थापना का दायित्व जिन व्यक्तियों को सौंपा, उनमें भटनागर प्रमुख थे।

वर्ष 1942 में सीएसआईआर की स्थापना शांतिस्वरूप भटनागर (21 फरवरी 1894 – 1 जनवरी 1955) की अध्यक्षता में की गई थी और भटनागर के नेतृत्व में ही इस संस्थान का विस्तार हुआ। स्वतंत्रता के बाद विज्ञान के जरिये देश को विकास पथ पर ले जाने की नीति को भटनागर ने सीएसआईआर के माध्यम से आगे बढ़ाया। आजादी के दो दशक में ही देश के विभिन्न हिस्सों में सीएसआईआर की कई प्रयोगशालाएं एवं अनुसंधान केंद्र कार्य करने लगे थे। तेजी से हो रहे वैज्ञानिक ढांचे के इस विस्तार के पीछे एक वजह भटनागर और नेहरू की नजदीकियों को भी माना जाता है। यही कारण था कि प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक सी.वी. रामन ने इन दोनों के वैज्ञानिक शोध के प्रति लगाव को 'नेहरू-भटनागर प्रभाव' का नाम दिया।
 
होमी जहांगीर भाभा और प्रशांत चंद्र महालनोबिस के साथ शांतिस्वरूप भटनागर ने देश में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के आधारभूत ढांचे के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कई युवा और होनहार वैज्ञानिकों का मार्गदर्शन किया और उन्हें प्रोत्साहित किया।
 
भटनागर के मार्गदर्शन में भारत में बारह राष्ट्रीय प्रयोगशालाएं स्थापित की गईं। इनमें मैसूर स्थित केन्द्रीय खाद्य प्रौद्योगिक अनुसंधान संस्थान, पुणे स्थित राष्ट्रीय रासायनिकी प्रयोगशाला, राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला, नई दिल्ली; राष्ट्रीय मैटलर्जी प्रयोगशाला, जमशेदपुर एवं केन्द्रीय ईंधन संस्थान, धनबाद आदि शामिल हैं। 
 
शांतिस्वरूप भटनागर का जन्म शाहपुर (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उनके पिता परमेश्वरी सहाय भटनागर की मृत्यु उस वक्त हो गई, जब वह केवल आठ महीने के थे। उनका बचपन अपने ननिहाल में ही बीता। उनके नाना एक इंजीनियर थे, जिनसे उन्हें विज्ञान और अभियांत्रिकी में रुचि पैदा हुई और यांत्रिक खिलौने, इलेक्ट्रानिक बैटरियां एवं तारयुक्त टेलीफोन बनाना उनके शौक बन गए। 
 
स्नातकोत्तर डिग्री पूर्ण करने के उपरांत शोध फैलोशिप पर शांतिस्वरूप भटनागर इंग्लैंड चले गए। वहां उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन से वर्ष 1921 में रसायनशास्त्र के प्रोफेसर फ्रेड्रिक जी. गोनान के मार्गदर्शन में विज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। अपने शोधकार्य में उन्होंने तेलों में उच्च-वसा अम्लों के द्विसंयोजक एवं त्रिसंयोजक लवणों की घुलनशीलता और तेलों के पृष्ठीय तनाव पर उनके प्रभाव का अध्ययन किया। भारत लौटने के बाद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में शांतिस्वरूप भटनागर ने प्रोफेसर के पद पर कार्य किया। आगे चलकर उन्होंने कोलायडीय रसायन तथा चुम्बकीय रसायन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण शोध कार्य किए। 
शांतिस्वरूप भटनागर का मूल योगदान चुम्बकीय-रासायनिकी के क्षेत्र में है। उन्होंने रासायनिक क्रियाओं को अधिक जानने के लिए चुम्बकत्व को औजार के रूप में प्रयोग किया। प्रायोगिक और औद्योगिक रसायन के क्षेत्र में भी उन्होंने महत्वपूर्ण कार्य किया। सबसे पहले पहले भटनागर ने जिस औद्योगिक समस्या को सुलझाया, वह गन्ने के छिलके को मवेशियों को खिलाई जाने वाली खली में बदलने की प्रक्रिया विकसित करना थी। 
 
इसी प्रकार उन्होंने ड्रिलिंग के दौरान तेल कंपनियों के सामने उत्पन्न होने वाली समस्या का निदान किया। ड्रिलिंग के दौरान कीचड़ जब नमक के संपर्क में आता था तो वह ठोस हो जाता था। कुछ समय बाद वह और अधिक कठोर हो जाता था, जिससे ड्रिलिंग को जारी रखने में कठिनाई होती थी। भटनागर ने इसके समाधान के लिए कोलाइडीय रसायन का उपयोग किया। उन्होंने पाया कि गोंद में कीचड़ के ठोस होने के समय उत्पन्न होने वाली श्यानता को घटाने की उल्लेखनीय क्षमता होती है। भटनागर द्वारा विकसित किए गए इस तरीके से मेसर्स स्टील ब्रदर्स इतने खुश थे कि उन्होंने उनके सामने पेट्रोलियम से संबंधित शोध कार्य के लिए डेढ़ लाख रुपये देने का प्रस्ताव रखा था। इस अनुदान से विश्वविद्यालय में भटनागर के मार्गदर्शन में पेट्रोलियम अनुसंधान विभाग स्थापित करने में मदद मिली। फिर उस विभाग में मोम-निर्गंधीकरण, मिट्टी के तेल से उठने वाली लपटों की ऊंचाई को बढ़ाने और वनस्पति तेल एवं खनिज तेल उद्योग में अपशिष्ट उत्पादों के उपयोग से संबंधित खोजपूर्ण कार्य संपन्न हुए।
 
भटनागर विज्ञान संबंधी प्रयोगों के लिए नए उपकरणों के विकास को तत्पर रहते थे। उन्होंने के.एन. माथुर के साथ चुम्बकीय व्यवधान तुला नामक अभिनव उपकरण का विकास किया। यह तुला चुम्बकीय गुणों को मापने वाला एक संवेदनशील उपकरण थी, जिसे वर्ष 1931 में रॉयल सोसायटी के कार्यक्रम में भी प्रदर्शित किया गया था।
 
भटनागर की मृत्यु के उपरांत उनके सम्मान में सीएसआईआर की पहल पर वैज्ञानिकों हेतु भटनागर पुरस्कार की शुरुआत की गई। इस पुरस्कार का उद्देश्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय शोध कार्य करने वाले वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करना है।
 
प्रतिभाशाली वैज्ञानिक होने के साथ शांतिस्वरूप भटनागर एक कोमल हृदय कवि भी थे। हिंदी और उर्दू के बेहतरीन जानकार भटनागर ने अपने नाटकों और कहानियों के लिए कॉलेज के समय में अनेक पुरस्कार भी जीते। शांतिस्वरूप ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का कुलगीत भी लिखा था, जो हिंदी कविता का बेहतरीन उदाहरण है।
 
वर्ष 1941 में ब्रिटिश सरकार द्वारा भटनागर को उनके युद्ध संबंधी शोध कार्यों के लिए नाइटहुड से सम्मानित किया गया। 18 मार्च, 1943 को इन्हें फैलो ऑफ रॉयल सोसायटी भी चुना गया। 1 जनवरी, 1955 को इस प्रसिद्ध वैज्ञानिक ने दुनिया को अलविदा कह दिया। 
 
(इंडिया साइंस वायर)

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