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बाल्यकाल से ही 'बचपन' बचाने में जुट गये थे कैलाश सत्यार्थी

By अनु गुप्ता | Publish Date: Jan 11 2017 2:50PM

बाल्यकाल से ही 'बचपन' बचाने में जुट गये थे कैलाश सत्यार्थी
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प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी एक ऐसा नाम है जो बच्चों के अधिकारों के लिए किये गये कार्यों के कारण भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में जाने जाते हैं। आज उनके जन्मदिन पर एक नज़र डालते हैं इनके निजी जीवन और उनके द्वारा किये गए कार्यों पर। इन्हें बाल अधिकारों और शिक्षा के अधिकार की रक्षा के लिए किये गये कार्यों के लिए 2014 में मलाला यूसुफजई के साथ नोबल पुरस्कार मिला चुका है।

कैलाश सत्यार्थी का जन्म 11 जनवरी 1954 को विदिशा मध्य प्रदेश में हुआ था। उन्होंने अशोक टेक्नोलॉजिकल इंस्टिट्यूट विदिशा से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग से पढ़ाई पूरी कर हाई वोल्टेज इंजीनियरिंग में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। लेकिन 26 साल की उम्र में ही इन्होंने अपने सुनहरे कॅरियर को छोड़कर बच्चों के लिये काम करना शुरू कर दिया था। 
 
कैलाश बचपन से ही दूसरों खासकर बच्चों की मदद करते थे। उनके बारे में कहा जाता है कि महज 11 वर्ष की छोटी सी उम्र में उनका ध्यान उन गरीब बच्चों पर गया जो किताबें न होने की वजह से शिक्षा से दूर रहते थे। फिर क्या था कैलाश ने उन बच्चों से पुरानी किताबें इकट्ठी करनी शुरू कीं जो अपनी क्लास पास कर चुके होते थे, कैलाश सभी किताबों को ठेले पर डाल कर उन सभी गरीब बच्चों तक पहुँचाया करते थे। कम ही लोगों में इतनी छोटी उम्र में समाज के लिए इतनी सेवा देखने को मिलती है। 
 
1983 में उन्होंने बचपन बचाओ आंदोलन की स्थापना की जो अब तक 80,000 बच्चों को बाल श्रम, बंधुआ मज़दूरी और मानव तस्करी से छुड़ा चुका है। एक विश्लेषणात्मक विचारक की तरह उन्होंने बाल श्रम को एक मानव अधिकार का विषय बनाया न कि जनकल्याण या धर्मार्थ का विषय। इस समय उनके बचपन बचाओ आंदोलन में करीब 70,000 स्वयंसेवक हैं।
 
कैलाश ने हमेशा बच्चों के खिलाफ होने वाले जुल्मों और शोषण के खिलाफ शांतिपूर्ण ढंग से विरोध प्रदर्शन किया है। कभी भी किसी प्रकार की हिंसा या जोर जबरदस्ती का सहारा नहीं लिया यहाँ तक कि कई बार बच्चों को बाल श्रम और बंधुआ मजदूरी से छुड़वाते हुए उन पर और उनकी टीम पर हमले भी हुए जैसे 2004 में ग्रेट रोमन सर्कस से बसल कलाकारों को छुड़वाते समय और 2011 में दिल्ली में कपड़ा फैक्ट्री से बच्चों को बाल मजदूरी से बचाते समय। और कई बार तो कुछ शरारती तत्वों ने उनके ऑफिस को भी नष्ट करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और ना ही वे कभी ऐसी घटनाओं से डरे और अपने मिशन के लिए हमेशा डटे रहे।
 
बचपन बचाओ आंदोलन उनके दृढ़ निश्चय और आत्म विश्वास का ही परिणाम है। ये समूह अब तक भारत में बाल अधिकारों के लिए काम करने की वजह से सबसे प्रमुख रहा है। जो भारत के हर हिस्से में बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए कार्य कर रहा है। देश के हर हिस्से से कैलाश और उनकी टीम ने बच्चों को बाल श्रम और बंधुआ मज़दूरी से बचाया है। बचपन बचाओ आंदोलन उन बच्चों के लिए एक आशा की किरण और आज़ादी की उड़ान भरने का मंच है जो मानव सम्मान और पहचान से अब तक दूर थे। ये बच्चों को आगे बढ़ने का मौका देने के साथ ही उनकी शिक्षा और पुनर्वास का भी प्रबंध करता है।
 
और कहा जाता है कि जब भी वो बच्चों को बचाने जाते थे अपने साथ एक फोटोग्राफर को भी ले के जाते थे जिससे वे वहाँ की फ़ोटो खींच कर अखबारों और पत्रिकाओं को भेजते थे जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों को इस बारे में पता चले और मीडिया की मदद से देश के हर हिस्से में इस कार्य के प्रति जागरूकता फैले। कैलाश सत्यार्थी ने कुछ गैर सरकारी संगठनों की सहायता से ऐसी कई फैक्टरियों पर छापे पड़वाये जहां बच्चे काम करते हुए पाये जाते थे।
 
उन्होंने रागमर्क फाउंडेशन जो अब गुडवीव के नाम से जाना जाता है की भी स्थापना की है। इसके अंतर्गत ये रागमर्क एक शुद्धता चिन्ह की तरह काम करता है और इस बात को प्रमाणित करता है कि कालीन और अन्य कपड़ों को बनाने के लिए बच्चों से काम नहीं करवाया गया है।
 
कैलाश सत्यार्थी हमेशा से ही बाल तस्करी और बाल श्रम के खिलाफ सख्त कानून बनाये जाने के पक्ष में रहे हैं। बच्चों के लिए आवश्यक शिक्षा के अधिकार को लेकर भी कई आंदोलन चलाये हैं। अब तक हज़ारों की संख्या में बच्चों को बचाते हुए कैलाश ने उनके शिक्षा और पुनर्निवास के लिए एक मॉडल भी तैयार किया है। इस समय ये ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर के अध्यक्ष भी हैं। ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर एक प्रकार का वैश्विक संगठन है जो कई गैरसरकारी संगठनों, शिक्षा संगठनों, टीचर यूनियन और व्यापार यूनियन के मेल से बना है। 
 
उनका मानना है कि बाल श्रम के कारण गरीबी, बेरोज़गारी, निरक्षरता, जनसंख्या विस्फोट और अन्य कई सामाजिक बुराई निरंतर चलती रहती है। वे बाल श्रम के खिलाफ अपनी इस लड़ाई को सबके लिए शिक्षा के प्रयास से जोड़ने में एक अहम भूमिका निभा चुके हैं। उन्होंने बाल श्रम और बंधुआ मजदूरी से छुड़ाये हुए बच्चों के लिए तीन पुनर्वास सह शिक्षा केंद्र भी स्थापित किये हैं जिससे ये पीड़ित बच्चे आने वाले समय में कुशल मनुष्यों और मुक्तिदाताओं में परिवर्तित हो पाये। ग्लोबन कैंपेन फ़ॉर एजुकेशन भी इन्होंने ही स्थापित किया था।
 
वे शिक्षा पर यूनेस्को द्वारा बनाये गए एक उच्च स्तरीय समूह के प्रमुख सदस्य भी हैं। सिविल मोड के नेता होते हुए वे यूनाइटेड नेशंस की जनरल असेंबली को भी संबोधित कर चुके हैं। साथ ही कई अंतररष्ट्रीय स्तर की कमिटी और बोर्ड के मुख्य सदस्य भी हैं। उन्हीं में से एक है सेंटर फॉर विक्टिम ऑफ़ टार्चर। कैलाश सत्यार्थी इंटरनेशनल सेंटर ऑन चाइल्ड लेबर एंड एजुकेशन वाशिंगटन के अध्यक्ष भी हैं। अब तक वे कई पत्रिकाओं का सफल संपादन भी कर चुके हैं जैसे- संघर्ष जारी रहेगा, क्रांति धर्मी। इस समय वे अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ दिल्ली में रहते हैं।
 
उपलब्धियां
2014 में नोबेल शांति पुरस्कार 
2009 में डिफेंडर ऑफ़ डेमोक्रेसी अवार्ड (अमरीका)
2008 में अल्फोंसो कॉमिन इंटरनेशनल अवार्ड
2001 में मेडल ऑफ़ द इटालियन सीनेट अवार्ड
इनके अलावा और भी कई प्रतिष्ठित सम्मान उन्हें मिल चुके हैं।
 
अनु गुप्ता

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