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विश्लेषण

भाजपा शासित राज्यों में सरकार से बढ़ती नाराजगी के भरोसे बैठी है कांग्रेस

By योगेन्द्र योगी | Publish Date: Mar 13 2018 12:58PM

भाजपा शासित राज्यों में सरकार से बढ़ती नाराजगी के भरोसे बैठी है कांग्रेस
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कांग्रेस की हालत उस हारे हुए जुआरी की तरह हो गई है, जो हर बार यह सोच कर दांव लगाता है कि इस बार जीत कर सारी कसर निकल जाएगी। परिणाम इसके विपरीत ही आते हैं। जो बचा हुआ है, वो भी हाथ से निकलता जाता है। कांग्रेस पूर्वोत्तर के तीनों राज्यों में चुनाव हार गई। भाजपा ने अपनी चुनावी रथ यात्रा का विस्तार पूर्वोत्तर तक कर लिया और कांग्रेस लगातार सिमटती जा रही है। केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनते वक्त वर्ष 2014 में देष के 11 राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थीं। चार साल बाद वर्ष 2018 की शुरुआत में घटते−घटते चार राज्यों तक सिमट कर रह गई है। देश में कुल 29 राज्यों में से अब 21 में भाजपा की सरकारें हैं।

आश्चर्य की बात तो यह है कि कांग्रेस ने राज्यों के लगातार हाथ से निकलते जाने पर भी कोई सबक नहीं सीखा। नरेन्द्र मोदी ने अकेले गुजरात के विकास को आईना बनाकर देश की गद्दी पर कब्जा कर लिया। इसके बाद पीछे मुड़ कर नहीं देखा। भाजपा का विजय रथ देश में तेजी से घूम रहा है। इसके विपरीत कांग्रेस राज्यों से लगातार सत्ता गंवाती जा रही है। मोदी ने लोकसभा चुनाव के दौरान गुजरात के विकास कार्यों का जमकर गुणगान किया गया। इसके साथ ही कांग्रेस की रीति−नीति और भ्रष्टाचार पर जमकर प्रहार किया गया। इसके बावजूद कांग्रेस किसी भी एक राज्य को साफ−सुथरा बना कर राष्ट्रीय स्तर पर छवि बनाने में नाकामयाब रही। 
 
लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी कांग्रेस ने राज्यों में सुधार के कार्य नहीं किए। कांग्रेस किसी भी राज्य को देश में मॉडल की तरह पेश नहीं कर सकी। जबकि मोदी ने अकेले गुजरात के बलबूते यह कर दिखाया। कांग्रेस ने बचे हुए राज्यों में न तो विकास पर फोकस किया और न ही भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए गंभीरता से प्रयास किए। कांग्रेस कभी यह दावा नहीं कर सकी कि बचे हुए राज्यों में से किसी एक में भी भ्रष्टाचार नहीं है। कांग्रेस शासित राज्यों में भ्रष्टाचार चरम पर रहा। भाजपा ने हर चुनाव में इसका पूरा फायदा उठाया। भाजपा लगातार आक्रामक नीति अपनाए रही। इसके विपरीत कांग्रेस राज्यों में हुए चुनावों में किसी चमत्कार का इंतजार करती रही। कांग्रेस ने कभी आत्ममंथन करके यह स्वीकार ही नहीं किया कि केंद्र और राज्यों में गुणवत्तायुक्त साफ−सुथरा शासन नहीं देना भारी भूल रही। इस भूल का प्रायश्चित करना तो दूर, कांग्रेस देश के जनमानस को टटोलने में पूरी तरह नाकामयाब रही।
 
इसके बावजूद कि केंद्र सरकार नोटबंदी और जीएसटी जैसा कानून ले आई। जिससे कुछ वक्त तक देश के आम लोगों को तकलीफ भुगतनी पड़ी। फिर भी देश के लोगों का भरोसा केंद्र की भाजपा सरकार के प्रति कम नहीं हुआ। केंद्र सरकार यह संदेश देने में कामयाब रही कि रोग से लड़ने के लिए कडुवी दवाई खानी ही पड़ेगी। बल्कि इस रोग का ठीकरा भी कांग्रेस के सिर फोड़ा। तात्कालिक नुकसान उठाने के बावजूद मतदाताओं ने भाजपा का साथ नहीं छोड़ा। कांग्रेस यह समझने में पूरी तरह विफल रही कि मतदाताओं को यदि नीयत पर भरोसा हो जाए तो मुसीबत उठाकर भी साथ देने को तैयार रहते हैं। बशर्ते नीयत में खोट नहीं होनी चाहिए। जीएसटी और नोटबंदी के बाद हुए चुनावों में राज्यों में भाजपा की जीत से यह साबित भी हो गया। जबकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी क्षेत्रीय दलों ने इन दोनों मुद्दों पर भाजपा की छिछालेदार करने में कसर बाकी नहीं रखी।
 
राज्यों से लगातार बाहर होती जा रही कांग्रेस अपनी पराजयों पर आत्ममंथन करने के बजाए क्षेत्रीय दलों के भरोसे केंद्र में सत्ता का ख्वाब बुन रही रही है। पूर्वोत्तर में हार के बाद कांग्रेस ही नहीं क्षेत्रीय दलों में खलबली मची हुई है। क्षेत्रीय दलों को लगने लगा है कि अबकी उनकी ही बारी है। भाजपा की आंधी में कहीं उनकी सत्ता उखड़ नहीं जाए। आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू विशेष राज्य के दर्जे की मांग की आड़ में केंद्र से अलग हो गए लेकिन अभी गठबंधन से नहीं हटे हैं। इसमें नायडू को भाजपा के बढ़ते प्रभाव का डर दिख रहा है। अभी तक प्रतिक्रिया देने से बचते रहे तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव भी मुखर हो गए। ये वही चंद्रशेखर हैं जिन्होंने राज्य के खजाने से करोड़ों रूपए के स्वर्णाभूषण मंदिर में चढ़ाए थे। ओडिशा में नवीन पटनायक राज्य में भाजपा के बढ़ते प्रभाव से पहले ही संघर्षरत हैं। 
 
पूर्वोत्तर में भाजपा की जीत के बाद से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के स्वर और तीखे हो गए हैं। इन क्षेत्रीय दलों को अब लगने लगा है कि किसी तरह गठबंधन बनाकर भाजपा की बढ़ते कदमों को थामा जा सकता है। इन दलों का उद्देश्य विकास और भ्रष्टाचार मिटाकर भाजपा से मुकाबला करने में नहीं है, बल्कि कांग्रेस को अपने ढहते हुए किलों का पहरेदार की तरह उपयोग करना है। कांग्रेस के मुख्य विपक्षी दल होने के कारण उसका चेहरा ही आगे रखना है। हार से हताश कांग्रेस भी इन दलों के सहारे भविष्य खोज रही है। हालांकि यह खोज आसानी से पूरी नहीं होगी। क्षेत्रीय दल यदि चुनावी गठबंधन करते भी हैं तो आसानी से कांग्रेस के हाथ कुछ नहीं लगने देंगे। समझौते की सभी शर्तें क्षेत्रीय दल अपने ही अनुकूल रखेंगे। कांग्रेस के पास वैसे भी खोने को अब ज्यादा कुछ रह भी नहीं गया है। क्षेत्रीय दलों को भी एहसास है कि कांग्रेस डूबता जहाज है, इसकी सवारी से ज्यादा कुछ हासिल होने वाला नहीं है। सिवाय इसके कि कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है।
 
ऐसा भी नहीं है आगामी लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को सत्ता सजी हुई थाली में मिल जाएगी। हाल ही में हुए उपचुनावों में भाजपा की शिकस्त से यह जाहिर हो गया है कि मतदाताओं की केंद्र सरकार से बेशक नाराजगी नहीं हो पर भाजपा शासित राज्यों में सब कुछ ठीकठाक नहीं चल रहा है। कांग्रेस को यदि कुछ चुनावी फायदा मिलेगा तो राज्यों में भाजपा सरकारों की नाराजगी से ही मिल सकता है। कांग्रेस अब भी इसी भरोसे में है कि शायद आगामी चुनावों में कुछ लाज बच जाए। हालांकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की चुनावी जोड़ी के सामने कांग्रेस की उम्मीदें पूरी होना आसान नहीं है। यह अलग बात है कि कुछ जगहों पर कांग्रेस के लिए 'बिल्ली के भाग्य से छींका टूट जाए।'
 
-योगेन्द्र योगी

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