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विश्लेषण

भाजपा का राज्यसभा चुनावों के जरिये राजनीतिक, जातिगत समीकरण साधने का प्रयास

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Publish Date: Mar 12 2018 12:24PM

भाजपा का राज्यसभा चुनावों के जरिये राजनीतिक, जातिगत समीकरण साधने का प्रयास
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राज्यसभा की 50 सीटों पर हो रहे द्विवार्षिक चुनावों में उम्मीदवारों के चयन को लेकर वैसे तो सभी पार्टियों ने काफी सतर्कता बरती है लेकिन भाजपा के उम्मीदवारों पर खास तौर नजरें दौड़ाएं तो साफ नजर आता है कि पार्टी की नजर 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों और आगामी राज्य विधानसभा चुनावों पर ही पूरी तरह केंद्रित रही। भाजपा ने अपने बहुत से पुराने कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ नेताओं के दावों को दरकिनार करते हुए राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों को साधने पर ज्यादा ध्यान दिया है ताकि आगामी चुनावों में उसका लाभ उठाया जा सके। इस बार के राज्यसभा चुनावों में भाजपा को ही सर्वाधिक फायदा होने वाला है। पार्टी मान कर चल रही है कि इन चुनावों के बाद उच्च सदन में राजग को कामकाजी बहुमत हासिल हो जायेगा।

उत्तर प्रदेश का राजनीतिक महत्व और बढ़ा
 
भाजपा उम्मीदवारों पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश में उसने अपने बड़बोले नेता विनय कटियार का टिकट काट दिया जबकि वह राम मंदिर का अलख जगाये रहते हैं। इसकी बजाय सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों पर ज्यादा ध्यान दिया गया है। अब तक गुजरात से राज्यसभा के सदस्य रहे अरुण जेटली को इस बार उत्तर प्रदेश से उम्मीदवार बनाया गया है। इसी के साथ ही उत्तर प्रदेश का राजनीतिक कद केंद्रीय कैबिनेट में और बढ़ गया है क्योंकि यहां से प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और वित्त मंत्री सांसद हैं। इसके अलावा प्रदेश से डॉ. अनिल जैन को मौका दिया गया है जोकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के करीबी होने के साथ-साथ संघ का भी वरदहस्त प्राप्त हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के लिए जिन लोगों ने विधान परिषद की सीट छोड़ी थी उसमें सपा से आये अशोक वाजपेयी भी थे जिन्हें अब राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया गया है। इसके अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश को ध्यान में रखते हुए मेरठ के पूर्व मेयर विजय पाल सिंह तोमर और कांता कर्दम को उम्मीदवार बनाया गया है। उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण राजभर समुदाय को ध्यान में रखते हुए सकल दीप राजभर, यादव वोटों को साधने के लिए एटा के हरनाथ सिंह यादव को उम्मीदवार बनाया गया है साथ ही पार्टी प्रवक्ता जीवीएल नरसिंह राव को भी राज्यसभा जाने का मौका उत्तर प्रदेश से दिया गया है क्योंकि पार्टी जानती है कि आंध्र प्रदेश में उसे अब अपने दम पर खड़ा होना है तो वहां के पार्टी नेताओं को और तवज्जो देनी होगी। जीवीएल आंध्र प्रदेश से हैं और वहां से टीडीपी के दो मंत्रियों के इस्तीफे के बाद केंद्र सरकार में उनके लिए जगह बन सकती है।
 
उत्तराखंड में मचा था घमासान
 
उत्तराखंड में एक अनार सौ बीमार वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी क्योंकि यहां से एक सीट पर ही चुनाव हो रहा था और भाजपा में उम्मीदवारी हासिल करने के लिए प्रदेश अध्यक्ष सहित लंबी लाइन थी। लेकिन यहां से भाजपा मीडिया सेल के प्रमुख और अमित शाह के करीबी अनिल बलूनी को उम्मीदवारी मिल गयी। बलूनी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिल्ली आने के बाद उत्तराखंड से दिल्ली प्रवक्ता बनाकर लाया गया था। बलूनी के साथ ही अन्य भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा भी दौड़ में शामिल थे लेकिन पार्टी शायद उनको ओडिशा से लोकसभा चुनाव लड़ाने की तैयारी कर रही है।
 
संगठन में काम करने वालों को ईनाम
 
छत्तीसगढ़ से भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सरोज पांडे को संगठन में काम करने का ईनाम दिया गया है। वह फिलहाल महाराष्ट्र की प्रभारी हैं और भाजपा महिला मोर्चे की राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुकी हैं। झारखंड से समीर उरांव को मौका दिया गया है। उनके जरिये आदिवासी वोटों को साधने का प्रयास है। हरियाणा से रिटायर्ड सेनाधिकारी डी.पी. वत्स को टिकट दिया गया है। वत्स भाजपा के पूर्व सैनिक प्रकोष्ठ से जुड़े रहे हैं। 
 
केरल पर पार्टी की बनी हुई है नजर
 
केरल को लेकर पार्टी कितनी गंभीर है इस बात का अंदाजा इस सूची से और लग गया है। केरल में पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष वी. मुरलीधरन को महाराष्ट्र से उम्मीदवार बनाया गया है और केरल में राजग के संयोजक रहे निर्दलीय राज्यसभा सांसद और उद्योगपति राजीव चंद्रशेखर को कर्नाटक से उम्मीदवार बनाया गया है। चंद्रशेखर कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार के खिलाफ काफी मुखर रहते हैं और आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी उनका उपयोग कर्नाटक में करना चाहती है।
 
महाराष्ट्र में 'एकला चलो' की राह पर भाजपा!
 
महाराष्ट्र में भाजपा ने बड़ा खेल खेला है। यहां से बड़े मराठा नेता नारायण राणे को उम्मीदवार बनाया गया है। राणे का अपने क्षेत्र में विधानसभा की 25 से 30 सीटों पर अच्छा प्रभाव माना जाता है और भाजपा उनके सहारे और मजबूत होना चाहती है लेकिन देखना होगा कि राणे की उम्मीदवारी को शिवसेना कितना पचा पाती है। गौरतलब है कि राणे पहले शिवसेना में ही थे लेकिन बाद में कांग्रेस में चले गये थे और भगवा दलों पर खूब निशाना साधते थे। यहां से पार्टी ने केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर को भी टिकट दिया है।
 
राजस्थान को फिर जीतने के लिए लगाई बड़ी बाजी
 
राजस्थान को लेकर भी भाजपा बेहद गंभीर नजर आ रही है और यहां के जातिगत समीकरणों को साधने में जुटी हुई है। यहां हाल ही के उपचुनावों में भाजपा को हार मिली थी। राज्य में नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं। यहां से पार्टी महासचिव भूपेन्द्र यादव के अलावा डॉ. किरोणी लाल मीणा को उम्मीदवार बनाया गया है। किरोणी लाल मीणा की अपनी पार्टी नेशनल पीपुल्स पार्टी थी जिसका भाजपा में विलय करा दिया गया। मीणा पहले भाजपा में ही थे लेकिन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से मतभेद होने के चलते उन्होंने अपनी अलग पार्टी बना ली थी और पिछले चुनावों के बाद उन्होंने कांग्रेस पार्टी को समर्थन भी दिया था। मीणा की पत्नी गोलमा देवी अशोक गहलोत सरकार में राज्यमंत्री बनायी गयी थीं। मीणा को पूर्वी राजस्थान की ज्यादातर सीटों पर अच्छा प्रभाव माना जाता है। इसके अलावा पार्टी ने शेखावाटी क्षेत्र से मदन लाल सैनी को भी उम्मीदवार बनाया है। सैनी उसी जाति से संबंध रखते हैं जिससे कांग्रेस नेता अशोक गहलोत संबंधित हैं।
 
मंत्रियों को किया एडजस्ट
 
इसके अलावा पार्टी ने अपने उन मंत्रियों को दोबारा उम्मीदवार बनाया है जिनका राज्यसभा का कार्यकाल खत्म हो रहा था। इनमें हिमाचल प्रदेश से जेपी नड्डा, गुजरात से पुरुषोत्तम रूपाला और मनसुख लाल मांडविया, बिहार से रविशंकर प्रसाद, मध्य प्रदेश से थावर चंद गहलोत, धर्मेंद प्रधान और संगठन से जुड़े अजय प्रताप सिंह और कैलाश सोनी को मौका दिया गया है।
 
बहरहाल, राज्यसभा पहुँचने वाले नये चेहरे पार्टी के लक्षित समीकरणों पर कितना खरा उतरेंगे यह तो वक्त ही बतायेगा लेकिन इतना तो दिख रहा है कि पार्टी ने अपने बड़बोले नेताओं की उम्मीदवारी को दरकिनार कर उन्हें सख्त संदेश दे दिया है।

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