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विश्लेषण

लेनिन चित्र के रूप में तो स्वीकार्य हैं परंतु चरित्र के रूप में नहीं

By राकेश सैन | Publish Date: Mar 8 2018 4:00PM

लेनिन चित्र के रूप में तो स्वीकार्य हैं परंतु चरित्र के रूप में नहीं
Image Source: Google

त्रिपुरा में वामपंथ का 25 साल पुराना गढ़ ध्वस्त होते ही बेलोनिया नगर में लोगों ने साम्यवाद के दूसरे सबसे बड़े नेता रहे लेनिन की प्रतिमा को ध्वस्त कर दिया। वैसे लोकतंत्र में किसी भी तरह के विध्वंस को तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता परंतु देखने वाली बात है कि लोगों में लेनिन के प्रति ऐसी क्या नाराजगी थी कि वामपंथी बेड़ियां खुलने के 48 घंटों के भीतर ही महानायक का अस्थिप्रवाह कर दिया। त्रिपुरा में चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद आनंद में डूबे लोगों के वीडियो देखें तो वहां दोगुना उत्साह नजर आया। भाजपा कार्यकर्ता अपनी सरकार के आने को लेकर उत्साहित थे तो जनसामान्य वामपंथ के खात्मे का उत्सव मनाते दिखे। प्रतिमाओं के खण्डन का समर्थन नहीं किया जा सकता परंतु यह एक विचारधारा के प्रतीकात्मक अंत का संदेश है। बंगला फिल्म निर्माता सत्यजीत रे की फिल्म 'हीरक राजार देशे' में लोग 'डोरी धोरे मारो तान-राजा होबे खान खान' (रस्सी खींचो और राजा की मूर्ति जमींदोज कर दो) के नारे लगाते हुए एक तानाशाह शासक की मूर्ति को गिराकर उसका प्रतीकात्मक अंत करते हैं। लगता है कि बंगलाभाषी त्रिपुरा भी इन पंक्तियों का अर्थ समझ गया है। यह भारत का संदेश है कि लेनिन चित्र के रूप में तो स्वीकार्य है परंतु चरित्र के रूप में कभी स्वीकारे नहीं जा सकते।

22 अप्रैल, 1870 को रूस में जन्मे ब्लादिमीर इलीइच लेनिन को मजदूरों का नेता और शिक्षक माना जाता है, लेकिन सच यह है कि दुनिया भर में इसके समर्थक मजदूरों की बात कर सत्ता हथियाने का ही कार्य करते हैं। बंगाल की दुर्दशा, त्रिपुरा का पिछड़ापन व केरल की हिंसा बताती है कि वाममंथी विचारधारा लोगों को समान रूप से गरीब बनाना जानती है, संपन्न नहीं। लेनिन के नेतृत्व में सोवियत संघ में पहले समाजवादी राज्य की स्थापना हुई थी। अभी तक उसने मजदूरों को यह बताया कि शोषण-उत्पीड़न और बंधनों से मुक्त होकर हक मांगना है, लेकिन जब मजदूरों के कंधे पर चढ़कर लेनिन सत्ता में आए तब वे बदल गए। उन दिनों रूस में जारशाही का निरंकुश शासन था। मजदूर तथा किसान भयंकर शोषण और उत्पीड़न के शिकार थे। जार ने लेनिन के भाई को फांसी पर चढ़ा दिया और बहन को कैद कर लिया जिससे वे जार से दुश्मनी रखने लगे। कार्ल मार्क्स तथा फ्रेडरिक एंगेल्स की रचनाओं से उनका परिचय हुआ। लेनिन ने अपना दर्शन खुद गढ़ा और अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'क्या करें' में उन्होंने सर्वहारा वर्ग की नए ढंग की क्रांतिकारी पार्टी के सांगठनिक उसूलों को प्रस्तुत किया। क्रांति के अपने सिद्धांत को लेनिन ने अक्टूबर क्रांति के जरिए साकार कर दिखाया। इसमें हजारों मजदूरों का खून बहा। मजदूरों के नेतृत्व में आखिरकार लेनिन ने सत्ता परिवर्तन कर दिया, लेकिन इसके बाद मजदूरों को भूल गए। 21 जनवरी 1924 को लेनिन का निधन हो गया। लेनिन के बाद जोसेफ स्टालिन ने उनके काम को आगे बढ़ाया। उन्होंने ही मार्क्सवादी विचारधारा को मार्क्सवाद-लेनिनवाद का नाम दिया।
 
दुनिया का इतिहास बताता है कि मार्क्सवाद व लेनिनवाद ने दुनिया को मजदूरों की क्रांति के नाम पर कुछ नहीं बल्कि हिंसा व खूनखराबा ही दिया। वर्तमान संदर्भ में मार्क्सवाद के आर्थिक सिद्धांत पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुके हैं क्योंकि इसका सबसे बड़ा पुरोधा चीन भी आज पूंजीवाद की राह पर चल रहा है। इसी लेनिन की प्रतिमा का गिराना कम्युनिस्ट निजाम के प्रतीकात्मक खात्मे को भी दिखाता है, जिसने सत्ता पर पकड़ बनाए रखने के लिए हिंसा को औजार की तरह इस्तेमाल किया। ऐसे में जब उनके तानाशाही शासन का अंत होता है, तो उससे जुड़े प्रतीकों पर भी हमले होते हैं। यह रूस के विभाजन के समय भी हुआ जब स्टालिन की प्रतिमा गिराई गई और लोगों ने यूक्रेन में लेनिन की प्रतिमा को हथौड़ों से खण्ड-खण्ड कर डाला।
 
यह भी कहा जा सकता है कि रूस व यूक्रेन के विपरीत भारत में लोकतंत्र है और मतों से सत्ता परिवर्तन होता है परंतु यह देखने में भी आया है कि वामपंथी दल भले ही लोकतांत्रिक माध्यम से सत्ता हासिल करते हैं। लेकिन बाद में वे हिंसा को संस्थागत स्वरूप देकर व लोहावरण ओढ़ कर लोकतंत्र को कमजोर कर देते हैं। एक खास विचारधारा से लैस सेना तैयार करते हैं, जो अपनी तानाशाही की गतिविधियों को बौद्धिक दृष्टिकोण उपलब्ध कराते हैं। इसके लिए शिक्षा व बौद्धिक संस्थानों पर कब्जे किए जाते हैं और लोगों पर विचारों को थोपने की प्रक्रिया शुरू होती है। अपने विरोधियों की हत्याएं की जाती हैं जैसा कि केरल व त्रिपुरा में होता रहा है।
 
त्रिपुरा में एक दशक बीत जाने के बावजूद भी लापता हुए 5 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं की लाशों को तलाशा नहीं जा सका है। बंगाल में भी हिंसा व दमन का लगभग तीन दशकों से अधिक समय तक चक्र चला। थानों व सरकारी दफ्तरों को मार्क्सवादी पार्टी के कार्यालयों में परिवर्तित कर दिया गया। 1970 में सेनबारी हत्याकांड, 79 में मरीचझंपी नरसंहार, आनंदमार्गी साधुओं को जिंदा जलाया जाना, 2000 में ननूर हत्याकांड और 2007 में नंदीग्राम फायरिंग लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई वामपंथी सरकार के वीभत्स चेहरे को दर्शाती हैं। सेनबारी में जुल्म की एक घटना के तहत एक मां को अपने बेटे के खून से सना चावल खाने को मजबूर किया गया था। लेकिन कम्यूनिस्ट बुद्धिजीवियों का भी कोई जवाब नहीं। माओ, स्टालिन, पोलपोट जैसे दुनिया के क्रूर हत्यारों व तानाशाहों को जिस असरदार तरीके से महान बताया गया उससे इनके पाप आसानी से छिप गए। लेनिन इसी हिंसात्मक विचार में विश्वास करते थे और त्रिपुरा में कम्युनिस्ट निजाम इसी का प्रचार-प्रसार करता था। त्रिपुरा चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद लोग यह कहते सुने गए कि उन्होंने दो दशकों बाद स्वतंत्रता का मुंह देखा है। 25 साल तक रक्तपिपासु वामपंथी विचारधारा को झेल रहे समाज ने हिंसा व अत्याचार की प्रतीक किसी प्रतिमा को ध्वस्त कर दिया हो तो उसे एकाएक आदर्शवाद नहीं समझाया जा सकता। हां चित्र के रूप में लेनिन स्वीकृत हो सकते हैं परंतु चरित्र के रूप में कदापि नहीं।
 
-राकेश सैन

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