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विश्लेषण

यूपी में और ज्यादा खिले 'कमल', इसके लिए जुट गया है संघ

By अजय कुमार | Publish Date: Mar 7 2018 3:07PM

यूपी में और ज्यादा खिले 'कमल', इसके लिए जुट गया है संघ
Image Source: Google

उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की सक्रियता इन दिनों काफी बढ़ गई है। कुछ लोग इस सक्रियता को बीजेपी के उभार से जोड़ कर देख रहे हैं। इसको लेकर सियासी गलियारों में राजनैतिक निहितार्थ निकाले जा रहे हैं तो संघ तो यही कहता है कि वह जातिवादी धारणा को देश से उखाड़ कर फेंक देना चाहता है। इसीलिये 'राष्ट्रोदय' जैसे कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। वहीं राजनैतिक पंडितों को लगता है कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत बहुत सलीके के साथ राष्ट्रोदय कार्यक्रम में जातिवाद के दंश को मिटाने का संदेश देकर 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए पटकथा लिखने की कोशिश कर रहे हैं ताकि 2014 के आम चुनाव की तरह एक बार फिर हिन्दुत्व के अलख को जगाया जा सके। हिंदुत्व के एजेंडे पर लगातार काम करने वाले आरएसएस ने हाल ही में 'जाति जोड़ो' का आगाज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से किया था। इसके बाद अगले पड़ाव आगरा और मेरठ रहे। दरअसल, आरएसएस हिन्दुत्व को मजबूत करने के लिये जातिवाद को मिटा कर सभी हिन्दुओं को एक छतरी के नीचे लाना चाहता है इसके लिये संघ काफी समय से प्रयासरत भी है। उसका सबसे अधिक फोकस समाज के सबसे पिछड़े तबके दलितों पर है। जिसको साधने से समाज में जातिवाद का जहर तो कम होगा ही इसका सियासी फायदा भी मिलना तय है।

आम चुनाव के मद्देनजर और यूपी के दलितों को साधने के लिए संघ ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। मकसद हिंदुत्व को धार देकर जातिवादी धारणा को उखाड़ कर भगवा काफिले को बढ़ाना है। 2019 का रास्ता बीजेपी के लिए सुगम बनाया जाए इसके लिए कुछ दिनों पूर्व संघ प्रमुख ने वाराणसी में प्रवास किया था। जहां उनके द्वारा समरसता व एकता पर जोर देकर युवाओं और दलितों को जोड़ने का मंत्र फूंका गया। उसके बाद संघ प्रमुख आगरा गए। वहां अपने दो दिवसीय कार्यक्रम में भागवत ने हिंदू एकता के इर्दगिर्द अपना भाषण केन्द्रित रखा तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से 2019 के रोडमैप पर चर्चा भी की। संघ प्रमुख ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात के दौरान जातिवाद के खात्मे के लिये ठोस नीति बनाने की बात कही तो 25 दिसंबर को संघ प्रमुख ने मेरठ में हिन्दुत्व की एकता का सार अपने हिसाब से समझाया। उम्मीद जताई जा रही है प्रदेश के अलग−अलग हिस्सों में बीजेपी की पक्ष में माहौल बनाने के लिए संघ इसी तरह के बड़े आयोजन आगे भी करता रहेगा।
 
बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 25 फरवरी को मेरठ में 'राष्ट्रोदय' नाम से आयोजित महासमागम की कि जाये तो संघ की तरह से दावा किया गया कि ये देश में अब तक का सबसे बड़ा समागम था। इस कार्यक्रम में करीब तीन लाख स्वयंसेवकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इस समागम के जरिए संघ केंद्र में मोदी सरकार की वापसी के लिए रोडमैप तैयार करते भी दिखा। इससे पहले संघ मथुरा में भी एक महा समागम कर चुका है लेकिन वहां केवल संघ के पदाधिकारियों और बीजेपी से जुड़े बड़े नेताओं ने हिस्सा लिया था। मेरठ के समागम में आम स्वयंसेवक भी शामिल हुए थे।
 
अब तक हुए संघ के 'राष्ट्रोदय' समागम कार्यक्रम पूरी तरह 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी सरकार की वापसी के लिए माहौल बनाते दिखे हैं। दरअसल, 2014 के आम चुनाव में हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण बीजेपी की तरफ हो गया था। यहां तक कि लंबे वक्त के बाद दलितों ने भी मायावती का साथ छोड़कर बीजेपी का साथ दिया था। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भी दलित और अति पिछड़े बीजेपी के साथ दिखे थे। राष्ट्रोदय कार्यक्रम में आरएसएस प्रमुख की पूरी कोशिश रही कि जातिवाद के बीज को समाप्त किया जाए। उन्होंने समागम में अपने संबोधन में साफ कहा कि हमारे झगड़ों पर सभी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते हैं। हमें ये मानना पड़ेगा कि हर हिंदू मेरा सहोदर भाई है। पंथ कोई हो, पूजा पद्धति कोई भी हो, जाति कोई भी हो, आराध्य कोई भी हो। भारत को अपनी माता मानने वाला हर कोई हिंदू है। सभी में एकता को बढ़ावा देना होगा। उन्होंने चेताया भी कि इस एकता को रोकने के लिए षड्यंत्र खूब होते रहे हैं, आगे होंगे भी, लेकिन हमें एकजुट होना है।
 
उत्तर प्रदेश के मेरठ में अब तक का सबसे बड़ा स्वयंसेवक समागम आयोजित कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपने कार्यकर्ताओं को अगले आम चुनाव के लिए कमर कस लेने का संदेश तो दिया ही इसके साथ ही संघ ने देश को अपने दमखम का अहसास कराने की कोशिश भी की। समागम में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदुओं की एकजुटता पर सबसे ज्यादा जोर दिया। उनका कहना था कि हम जाति के आधार पर आपस में लड़ रहे हैं, जो हमारे रास्ते में अवरोध पैदा कर रहा है। उन्होंने कहा कि संघ का कोई विकल्प नहीं है, संपूर्ण समाज को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बनाना होगा।
 
दरअसल, सियासतदारों ही नहीं आरएसएस के लिए भी उत्तर प्रदेश हिन्दुत्व की एक प्रयोगशाला है। इसीलिये अतीत में भी हिन्दुत्व से जुड़े सभी प्रयोग यहां किए जाते रहे हैं। खासकर पश्चिमी यूपी तो उसके लिए सबसे ज्यादा मुफीद माना जाता है। 2014 में बीजेपी को सर्वाधिक 73 लोकसभा सीटें उत्तर प्रदेश से ही मिली थीं। इसमें भी वोट प्रतिशत के मामले में पश्चिमी उत्तर प्रदेश काफी आगे रहा था। हालांकि इधर यहां सवर्णों और दलितों के बीच टकराव की कई घटनाएं भी घटी हैं, जिससे संघ चिंतित बताया जाता है। मेरठ में 'राष्ट्रोदय' समागम के आयोजन का एक उद्देश्य इस टकराव से पैदा हुए अलगाव को दूर करना भी था। इसीलिये संघ ने सभी मत−पंथ के लोगों, महिलाओं और संतों का यहां जमावड़ा किया था। पिछले आम चुनाव और उसके बाद विधानसभा चुनावों में संघ ने जिस नई सोशल इंजीनियरिंग को अपनी रणनीति में जगह दी है, उसके नतीजे उसके लिए बड़े फलदायी रहे थे। संघ जानता है कि जाति आधारित टकराव इस रणनीति को बेजान बना सकते हैं, इसलिए संघ का सबसे ज्यादा जोर हिंदू एकता पर है।
 
गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में संघ ने बदलते सामाजिक यथार्थ के अनुरूप अपनी रणनीति और कुछ मूल सिद्धांतों में भी बदलाव किए हैं, साथ ही कई तरह के परस्पर विरोधी तत्वों को अपने भीतर पचाने की क्षमता और लचीलापन भी विकसित किया है। समलैंगिकता और आरक्षण जैसे मुद्दों पर उसने अपना रुख नरम किया और वैलेंटाइंस डे और लव जेहाद पर उसने चुप्पी साध ली है। शाखाओं में यदाकदा लड़कियां और महिलाएं भी दिखने लगी हैं। मेरठ समागम में संघ ने अपने इसी रूप की एक झलक भी दिखाई थी। संघ अगर अपने मिशन में कामयाब रहता है तो 2019 में 'कमल' और भी खूबसूरत आकार ले सकता है। लब्बोलुआब यह है कि 2019 में मोदी की पुनः पीएम के पद पर वापसी हो जाये, इसके लिये संघ अभी से हिन्दुत्व के एजेंडे को धार देने में जुट गया है।
 
-अजय कुमार

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