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विश्लेषण

उत्तर प्रदेश में बुआ, बबुआ और फकीर के जुमले

By बाल मुकुन्द ओझा | Publish Date: Dec 30 2016 12:38PM

उत्तर प्रदेश में बुआ, बबुआ और फकीर के जुमले
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की दस्तक के साथ ही सियासी दलों ने अपने अपने दांव खेलने शुरू कर दिए हैं। चुनाव आयोग कभी भी चुनावी बिगुल की विधिवत घोषणा कर सकता है। प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने शतरंज की गोटियां बैठानी शुरू कर दी है। यात्राओं का घमासान जारी है। नेताओं के आरोप प्रत्यारोपों से प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मी अपने उछाल पर है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव, राहुल गाँधी और मायावती ने अपनी अपनी पार्टियों की जीत सुनिश्चित करने के लिए अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी है।

चुनावी जुमलों ने सर्द मौसम में गजब की गर्मी ला दी है। बुआ बबुआ और फकीर के जुमलों से आसमान गूँज रहा है। अखिलेश यादव ने यकायक 17 ओबीसी जातियों को दलित में शामिल करने का  फैसला कर बड़ा सियासी खेल खेला है। जिन ओबीसी जातियों को दलित में शामिल किया गया है वह मुख्य रूप से निषाद, मल्लाह, भर, बाथम, तुरहा, कहार, कश्यप, केवट, कुम्हार, राजभर, प्रजापति, धीवर, धीमर, बिंद, माझी, गौड़ और मछुवा हैं। अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है। अखिलेश यादव के इस फैसले से ना सिर्फ भाजपा बल्कि बसपा की भी मुश्किल बढ़ सकती है। एक तरफ जहां अखिलेश अपने इस फैसले से जातीय समीकरण को साध रहे हैं तो दूसरी तरफ मायावती की मुश्किलें इसलिए बढ़ सकती हैं कि वह कैसे दलितों के आरक्षण का मुद्दा अपने हाथ से नहीं निकलने दें। समाजवादी पार्टी में चाचा−भतीजे की जंग के बाद पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह का ग्राफ तेजी से गिरा है और कार्यकर्ताओं के साथ मतदाताओं पर उनकी पकड़ कमजोर हुई है। लोकप्रियता की दृष्टि से मुख्यमंत्री अखिलेश आगे निकले हैं। मुलायम के कमजोर पड़ते ही पार्टी और विरोधी नेताओं की बांछें खिल उठी हैं। अनेक माफियाओं और बाहुबलियों को चुनाव का टिकट थमा कर सपा ने अपना मन्तव्य साफ कर दिया है।
 
मायावती हाथी पर सवार हो कर दलित और मुस्लिम मतों को साधने में लगी हैं साथ ही ब्राह्मण मतों पर नजर टिकाये हैं। भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह प्रधानमंत्री के करिश्मे पर निर्भर है। मोदी का जादू अभी भी लोगों के सर चढ़ कर बोल रहा है। जाट बहुल इलाकों में अपने पिता चौधरी चरण सिंह की विरासत को सहेजने के लिए छोटे चौधरी अजीत सिंह रात दिन एक किये हुए हैं। वामपंथी, जेडीयू सहित अन्य पार्टियां अपने अस्तित्व के लिए जुगाड़ में जुटी हैं। भाजपा, सपा और बसपा के त्रिकोणीय संघर्ष को कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी अन्य छोटे दलों के सहयोग से चतुष्कोणीय बनाने में जुटे हैं। चतुष्कोणीय संघर्ष के कारण ही पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 80 में से 73 सीटें जीत ली थीं। यह चुनाव सभी दलों के लिए जीवन−मृत्यु का चुनाव है। इस महासंघर्ष में जिस पार्टी को 200 से अधिक सीटें हासिल होंगी वही पार्टी जीत का सेहरा बांधने में सफल होगी।
 
नोटबंदी को अपने अपने पक्ष में भुनाने के लिए नेतागण जनता जनार्दन को बरगलाने में लगे हैं। देश में कई राज्यों में हुए उपचुनाव सहित स्थानीय निकाय के चुनावों में अपनी जीत से भाजपा बल्ले बल्ले है। राहुल गाँधी के भूकंपीय भ्रष्टाचार के आरोपों से भाजपा तिलमिलाई हुई है। नरेन्द्र मोदी इन आरोपों को मजाक में टाल रहे हैं। संसद ठप्प करने का दोष एक दूसरे पर लगाकर सियासी दल जनता के कोप से बचने का बनावटी प्रयास कर रहे हैं। नोटबंदी से जनता कितनी दुखी और परेशान हुई है इसका वास्तविक पता तो यूपी चुनाव के परिणामों से ही चलेगा। बहरहाल यूपी के चुनाव पूरी तरह बबुआ, बुआ और फकीर के जुमलों से गूँज रहे हैं।
 
जातियों, धर्मों और विभिन्न समुदायों में बंटा उत्तर प्रदेश देश का राजनीतिक भविष्य शुरू से ही तय करता है। देश के अधिकांश प्रधानमंत्री इसी प्रदेश ने दिये हैं। पं. नेहरू को राजनीतिक चुनौती इसी प्रदेश से समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया ने दी थी। संविदा सरकारों के गठन का नेतृत्व भी इसी प्रदेश से हुआ था। गैर कांग्रेसवाद की जन्मदाता यही स्थली है। इसी प्रदेश में कभी जनसंघ, समाजवादी और वामपंथी दलों ने एक झंडे के नीचे एकत्रित होकर कांग्रेस को देश निकाला दिया था। कांग्रेस मुक्त भारत की शुरूआत उत्तर प्रदेश से ही हुई थी। कभी इस प्रदेश में शक्तिशाली हुई कांग्रेस आज मृत्युशैय्या पर पड़ी है। समाजवादी पार्टी जहाँ दुबारा सत्ता हासिल करने के लिए जी तोड़ प्रयास कर रही है वहीं बहुजन समाज पार्टी सत्तारूढ़ पार्टी की विफलताओं को गिनाकर लोगों से सत्ता की चाबी सौंपने की गुहार कर रही है। कांग्रेस पार्टी 75 वर्षीय दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को आगे कर जन समर्थन में जुटी है। लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर 73 सीटें जीतने वाली भाजपा के लिए यह चुनाव करो या मरो का सवाल है।
 
उत्तर प्रदेश में वर्तमान में 18 संभाग, 75 जिले, 312 तहसीलें, 80 लोकसभा और 30 राज्यसभा सीटें हैं। यहाँ विधानसभा की 403 सीटें हैं जो देश में सबसे अधिक हैं। 20 करोड़ की आबादी वाला यह प्रान्त 30 प्रतिशत वोट हासिल करने वाली पार्टी का पताका फहराता है। इस प्रदेश में 16 प्रतिशत अगड़ी जाति है। इसमें 8 प्रतिशत ब्राह्मण, 5 प्रतिशत राजपूत और तीन प्रतिशत अन्य सवर्ण जातियाँ हैं। पं. गोविन्द वल्लभ पन्त, सम्पूर्णानंद से लेकर कमलापति त्रिपाठी, बहुगुणा, नारायण दत्त तिवारी, चन्द्रभान गुप्ता, वी.पी. सिंह और राजनाथ सिंह जैसे अगड़ी जाति के नेता यहाँ के मुख्यमंत्री रहे हैं। प्रदेश में सर्वाधिक 35 प्रतिशत आबादी पिछड़ी जाति की है। इनमें 13 प्रतिशत यादव, 12 प्रतिशत कुर्मी, 10 प्रतिशत अन्य हैं। मुलायम सिंह यादव पिछड़ी जाति के सबसे बड़े नेता के रूप में यहाँ स्थापित हैं। उत्तर प्रदेश में दलितों की संख्या 25 प्रतिशत है। कांशीराम ने इन्हें राजनीतिक रूप से सशक्त किया और आज मायावती दलितों की सबसे बड़ी नेता हैं। यहाँ मुसलमान 18 प्रतिशत, जाट 5 प्रतिशत और एक प्रतिशत अन्य हैं। उत्तर प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में 12 करोड़ 74 लाख मतदाता थे जिनमें से लगभग 60 प्रतिशत ने अपने मताधिकार का उपयोग किया था। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 403 में से 229 सीटें जीतकर अपनी सरकार बनाई थी। यहाँ सपा को 80, भाजपा को 41, कांग्रेस को 29 और राष्ट्रीय लोकदल को 8 सीटें हासिल हुई थीं।
 
- बाल मुकुन्द ओझा

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