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विश्लेषण

इस लड़ाई का नुकसान बाप, बेटे दोनों को ही होगा

By शिवशरण त्रिपाठी | Publish Date: Jan 6 2017 4:08PM

इस लड़ाई का नुकसान बाप, बेटे दोनों को ही होगा
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अन्यान्न कारणों से समाजवादी पार्टी में अर्से से मची अंर्तकलह अंतत: बाप बेटे के बीच आकर केन्द्रित हो गई है। बीते एक सप्ताह में तेजी से घटे घटना क्रम का अंत क्या होगा उसका परिणाम जल्द ही आ जायेगा। आखिरी राजनीतिक बाजी बाप बेटे में किसके हाथ लगेगी यह तो अभी कह पाना थोड़ा मुश्किल है पर हालात गवाही दे रहे हैं कि अंतत: इस जंग में बाप बेटे दोनों ही मात खाने को मजबूर होंगे।

राजनीतिक सूत्रों/पर्यवेक्षकों व हालात के मद्देनजर सपा की जंग कुनबे के अगुवा सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के उत्तराधिकार के साथ ही साथ पार्टी व सत्ता पर कब्जा जमाने व जमाये रखने को लेकर है। यदि ऐसा न होता यादव के कल तक एकमात्र पुत्र एवं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने पिता एवं समाजवादी पार्टी के संस्थापक/अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को अधिवेशन बुलाकर खुलेआम राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से बर्खास्त करने की हिम्मत तक न जुटा पाते। कहीं से जब उन्हें लगने लगा कि कल सत्ता उनके हाथ से छीनी जा सकती है। हो सकता है कि पिता व चाचा की चुनावी रणनीति से पार्टी ही दुबारा सत्ता में न लौट पाये तो अंतत: उन्होंने उस पिता पर ही हमला बोल दिया जिसने उन्हें यहां तक पहुंचाने के लिये नामालूम कितने संघर्ष व जतन किये थे। नामालूम कितने रिश्ते दांव पर लगाये थे और नामालूम कितने नजदीकियों से तीखे शब्द बाण झेले थे।
 
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार नये वर्ष के दिन रविवार को जनेश्वर मिश्र पार्क में जो कुछ हुआ उसके कितने घातक परिणाम निकलेंगे उसका आकलन शायद न ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को है और न ही राजनीतिक गुरु व मसीहा की भूमिका अदा करके उन्हे उकसाने वाले उनके चचेरे चाचा प्रो. राम गोपाल यादव को ही है। भला कौन यह सत्य स्वीकार नहीं करेगा कि अखिलेश यादव की ही तरह यदि प्रो. राम गोपाल यादव सपा की राजनीति में एक अहम स्तम्भ बनने में कामियाब रहे, एक सफल सासंद बनने में सफल रहे हैं तो इसके पीछे मुलायम सिंह यादव की रणनीति व उनका वरदहस्त रहा है। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि मुलायम सिंह यादव के परिवार में उनकी दूसरी पत्नी का हस्तक्षेप भले ही पर्दे के पीछे से सही, कहीं न कहीं से बढ़ता ही जा रहा है। जिस तरह उनकी बहू अर्पणा यादव ने लखनऊ की छावनी विधान सभा सीट से 2017 का विधान सभा चुनाव लड़ने का निर्णय लिया और बीते कोई 6 महीने से वह तैयारियों में जुटी हुई हैं इसके पीछे उनके ससुर मुलायम सिंह यादव का वरदहस्त न हो यह कतई असंभव है। ऐसी स्थिति में अखिलेश यादव द्वारा छावनी सीट से अर्पणा यादव का नाम गायब कर देना इस बात का प्रमाण है कि राजनीति में पैर जमाना उन्हें नहीं सुहा रहा है। कौन पत्नी नहीं चाहेगी कि उसका पति उसके हर अधिकार की रक्षा करे और कौन मां नहीं चाहेगी कि उसका पुत्र और उसकी पुत्र वधू भी सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे।
 
सूत्रों ने स्मरण कराया कि सन् 2012 में जब सपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो कयास लगने लगे थे कि मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश की सत्ता की बागडोर अपने अनुज शिवपाल सिंह को सौंपकर स्वयं केन्द्र की राजनीति करेंगे। कोई यह भी कह रहा था कि यादव अपने खास अल्पसंख्यक वर्ग के आजम खां को भी मुख्यमंत्री की कुर्सी सौप सकते हैं पर इन कयासों को धता बताते हुये जब यादव ने अपने पुत्र अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान कर दिया तो उनके खास ही नहीं सूबे के लोग तक भौंचक रह गये। ऐसे में मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार व सम्भावित दावेदार शिवपाल सिंह यादव व आजम खां को भारी धक्का लगा। लोगों को याद होगा कि तब यह भी कहा जाने लगा था कि पार्टी दो फाड़ हो जायेगी पर ऐसी विपरीत दिखती परिस्थितियों में भी मुलायम सिंह यादव ने न केवल सब कुछ करीने से संभाल लिया था वरन् नाराज शिवपाल सिंह व आजम खां को अखिलेश के मंत्रिमंडल ने शामिल करवाकर उन्हें उनका सहयोगी भी बनवा दिया था।
 
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार पहला साल तो बतौर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रदेश व प्रदेश की राजनीति, नौकरशाही आदि की कार्यप्रणाली समझने बूझने के साथ अपनी सरकार की प्राथमिकताएं तय करने में गुजारा। उसके बाद उन्होंने निर्णय लेने शुरू किये। तीसरा साल आते-आते अखिलेश यादव की छवि एक काम करने वाले बेदाग मुख्यमंत्री की बनने लगी। हालांकि इस दौरान सूबे में कई बार छुटपुट दंगे भड़के, बड़ी अपराधिक घटनाएं भी बढ़ीं पर उन्होंने हालातों का हर संभव मुकाबला किया और विपरीत परिस्थितियों में सरकार बचाने में सफल रहे। इस दौरान सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव मौके-बेमौके उन्हे डांटते व फटकारते रहे व उनके कामकाज पर कभी-कभी कहीं ज्यादा तल्ख टिप्पणियां भी करते रहे पर मुख्यमंत्री यादव उसे सहज ढंग से पार्टी के साथ एक पुत्र के नाते स्वीकारते रहे। 
 
चौथा वर्ष आते-आते परिवार में आपसी टकराव की प्रतिध्वनियां तेज होती गईं। अपनी छवि व अपने काम के सहारे सियासी रूप से लगातार ताकतवर बनते गये अखिलेश यादव ने न केवल सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के फरमानों की अनसुनी शुरू कर दी वरन् उनके परामर्श के बगैर स्वयं बड़े निर्णय लेने लगे। नतीजतन टकराव तेज होता गया। स्थितियां तब बेकाबू हो गईं जब मुख्यमंत्री यादव ने न केवल मुलायम सिंह यादव के कई नजदीकियों को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया वरन् सगे चाचा शिवपाल सिंह यादव के सभी विभाग छीन लिये। मुलायम सिंह यादव के हस्तक्षेप के बाद स्थितियां कुछ सुधरीं पर शिवपाल सिंह यादव के मसले पर अखिलेश के न झुकने पर सपा प्रमुख ने अखिलेश यादव को सपा के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर शिवपाल सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया।
 
सूत्रों के अनुसार चूंकि यह चुनावी वर्ष का आगाज था इसलिये अखिलेश यादव को मात देने के लिये शिवपाल सिंह यादव ने अपनी व्यूह रचना शुरू कर दी। उन्होंने आजमगढ़ के बाहुबली मुख्तार अंसारी की पार्टी को सपा में दुबारा विलय करवाकर उनके भाई को उम्मीदवार भी घोषित कर दिया। इस पर अखिलेश यादव ने एक बार पुन: कड़ा प्रतिवाद किया मामले सुलझता कि शिवपाल सिंह यादव ने अपनी पसंद के लोगों को तरजीह देते हुये प्रत्याशियों की सूची जारी करनी शुरू कर दी और उनमें से मुख्यमंत्री की पसंद के कई नामों को काट दिया। मुख्यमंत्री ने जब इसका विरोध किया तो यादव ने कह दिया सूची के नाम सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की सहमति से तय किये गये हैं।
 
जानकार सूत्रों का दावा है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को कुछ ऐसा एहसास होने लगा कि यदि उन्होंने अब भी अपने चाचा से समझौते किये तो हो सकता है कि आने वाले कल उनकी राजनीति के लिये भारी पड़ सकते हैं। अंतत: उन्होंने अपने चचेरे चाचा प्रो. राम गोपाल को आगे कर नववर्ष के पहले दिन ऐसा खेल खेला कि न केवल सपा में कोहराम मच गया वरन् राजनीतिक हलकों में चर्चाएं बेहद गर्म हो गईं।
 
पार्टी के विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित कर पार्टी के संस्थापक व मुखिया व मुलायम सिंह यादव के साथ ही प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव को उनके पदों से हटा दिया गया। जहां अखिलेश यादव स्वयं पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गये वहीं प्रदेश अध्यक्ष उनके पसंदीदा नरेश उत्तम बना दिये गये। अखिलेश यादव के ऐसा करते ही उन चेहरों की नकाबें भी उतर गईं जो कल तक सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की चरण वंदना करते नहीं अघाते थे और जिनकी कृपा से ही अनेक की जिंदगियां सुधर गई हैं। अनेक राजनीति में प्रतिष्ठापित हो गये हैं। मसलन जिन नरेश अग्रवाल को मुलायम सिंह यादव ने राजनीति में पुर्नस्थापित किया वह कहते नजर आये 'मैं खुद ही नेता हूँ मैं नेता जी के नाम पर नेता नहीं हूँ।' अहमद हसन, किरनमय नंदा जैसे जो नेता जी की बदौलत लाल बत्ती वाले बन गये वे भी अखिलेश यादव के पाले में खड़े दिखे। इसी तरह इटावा, मैनपुरी, फर्रूखाबाद यानी जिन जिलों के सपा नेता मुलायम सिंह यादव की बदौलत आज रूतबा गालिब करते घूम रहे हैं वे सपा प्रमुख की चरणरज लेकर ही आगे बढ़े हैं। ऐसे में यह कहावत सच ही है कि लोग चढ़ते सूरज को ही सलाम करते हैं।
 
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि फिलहाल सपा का अन्दरूनी संघर्ष ऐसे मोड़ पर आ गया है जहां से किसी भी पक्ष को वापस लौटने की गुंजाइश कम ही नजर आती है। फिलहाल यह संघर्ष चुनाव आयोग तक पहुंच गया है। दोनों ही पक्ष चुनाव में साइकिल चुनाव चिन्ह की मांग करते नजर आ रहे हैं। जिसे भी साइकिल चुनाव चिन्ह मिलेगा उसे बढ़त मिलनी तय है पर यदि साइकिल चुनाव चिन्ह जब्त कर लिया गया तो अखिलेश यादव को भारी नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।
 
- शिवशरण त्रिपाठी

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