Prabhasakshi
रविवार, जून 24 2018 | समय 18:08 Hrs(IST)

जाँची परखी बातें

पीएम10 का विस्तृत विश्लेषण वायु प्रदूषण को समझने में होगा सहायक

By शुभ्रता मिश्रा | Publish Date: Nov 27 2017 12:47PM

पीएम10 का विस्तृत विश्लेषण वायु प्रदूषण को समझने में होगा सहायक
Image Source: Google

वास्को-द-गामा (गोवा), (इंडिया साइंस वायर): वातावरण की वायु गुणवत्ता में हो रही निरंतर कमी राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर गम्भीर चिंता का विषय बना हुआ है। भारत के अधिकांश शहर भी खराब वायु गुणवत्ता से प्रभावित हैं। ऐसे में वैज्ञानिक और पर्यावरणविद इसका एक सार्थक हल निकालने की दिशा में प्रयासरत हैं। 

बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय और भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने लखनऊ के शहरी इलाकों की वायु गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले पीएम10 कणिकीय पदार्थ के गहन आकारिकीय एवम् रासायनिक विश्लेषण किए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस अध्ययन से कणिकीय पदार्थ की उत्पत्ति, रासायनिक संरचना और संभावित रोगजन्यता के माध्यम से मानव स्वास्थ पर पड़ने वाले घातक प्रभावों को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा। 
 
शोधकर्ता नरेंद्र कुमार ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “यूँ तो लखनऊ में पीएम10 और पीएम 2.5 पर बहुत से वैज्ञानिक अध्ययन चल रहे हैं, लेकिन कणों की आंतरिक व मौलिक संरचना और इसमें मौजूद रासायनिक कार्यात्मक समूहों का अध्ययन पहली बार किया गया है।''
 
उन्होंने बताया कि जैसे जैसे कणों का समतुल्य गोलाकार व्यास (ईएसडी) बढ़ेगा वैसे वैसे कणों का सतह क्षेत्र भी बढ़ेगा जिससे ज्यादा मात्रा में जहरीले पदार्थ उसकी सतह पर चिपक जायेंगे, जो श्वांस के रास्ते से फेफड़ों में पहुँच जायेंगे एवं श्वसन नली को संकरा कर देंगे, जिससे लोगों को सांस लेने में बहुत दिक्कत महसूस होगी। इससे अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसऑर्डर (सी ओ पी डी) जैसी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। 
 
पीएम शब्द का प्रयोग पार्टिकुलेट मैटर यानि वायु में निलंबित उन कणिकीय पदार्थों के लिए किया जाता है, जो अत्यंत सूक्ष्म ठोस कणों और तरल बूंदों से बने होते हैं। इसमें धूल, गर्द और धातु के सूक्ष्म कण शामिल होते हैं। वास्तव में कणिकीय पदार्थ ईंधन जैसे कोयला, लकड़ी, डीजल के दहन और विभिन्न औद्योगिक प्रक्रियाओं एवम् खेतों आदि में खरपतवार या पराली आदि के जलाने से बनते हैं। कणिकीय पदार्थों को उनके कणों के व्यास के आधार पर दो समूहों पीएम10 और पीएम2.5 में बांटा गया है। ये ऐसे कणिकीय पदार्थ होते हैं जिनके कणों का व्यास क्रमशः 10 और 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार पीएम10 में सांस ली जा सकती है, परन्तु पीएम 2.5 साँस द्वारा फेफड़ों के भीतर जाकर उनको क्षति पहुँचाते हैं। 
 
लखनऊ के छह इलाकों अलीगंज, बीबीएयू, चौक, भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान, मोहनलालगंज और निशातगंज में अक्टूबर 2015 से सितंबर 2016 के दौरान पीएम10 के अध्ययन किए गए। अध्ययन स्थलों में पीएम10 की वार्षिक औसत सांद्रता 124 से लेकर 193.28 माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर आंकी गई, जो राष्ट्रीय परिवेश वायु गुणवत्ता मानक द्वारा निर्धारित वार्षिक मानक स्तर से तीन गुना तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन से लगभग 7-8 गुना अधिक पाई गई। 
 
शोध में स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप द्वारा कणिका पदार्थों के आकारिकीय विश्लेषण, तत्वीय संरचना और रासायनिक कार्यात्मक समूह परिवर्तनशीलता के अध्ययन के लिए कुल 5000 कणों का विश्लेषण किया गया। आकारिकीय गुण जैसे कणों की संख्या, घटक अनुपात, परिसंचरण, गोलाई, समतुल्य गोलाकार व्यास (ईएसडी) और सतह क्षेत्र दर्शाते हैं कि ये कण पूर्णतया गोलाकार से लेकर अनियमित आकार के होते हैं। कणिका पदार्थों के मुख्यतः दो प्रकार कार्बनिक एवं अकार्बनिक समूहों का पता चलाI इसके आधार पर वैज्ञानिकों ने इनको चार अलग-अलग समूह यानि अकार्बनिक अवयवों, कालेधुंए वाली कालिखों, टार के गोल कणों तथा एल्यूमिनोसिलेट्स युक्त कार्बनिक कणों में बांटा है। प्राप्त परिणामों से कणिका पदार्थों में अकार्बनिक समूह जैसे सल्फेट, बाइसल्फेट, कणिका जल, सिलिकेट, अमोनियम तथा कार्बनिक समूह जैसे एलीफेटिक कार्बन, एलीफेटिक अल्कोहल, कार्बोनिल और कार्बनिक नाइट्रेटों की उपस्थिति की पुष्टि हुई है।
 
वैज्ञानिकों का मानना है कि मनुष्य का तंत्रिका तंत्र अकार्बनिक पदार्थो की तुलना में कार्बनिक पदार्थो के प्रति सबसे ज्यादा सवेंदनशील होता है, अतः कार्बनिक कणों के श्वसन तंत्रिका तक पहुंचने की सम्भावना भी उतनी ही अधिक बढ़ जाती है, जिससे अल्जाइमर और पार्किंसंस रोग हो सकते हैं। लखनऊ की हवा में पाए गए इन विभिन्न कणिका पदार्थ समूहों की उत्पत्ति और आकारिकीय गुणों का तुलनात्मक अध्ययन अन्य शहरों जैसे चण्डीगढ़, आगरा और पुणे के साथ किए गए। यह पाया गया कि सभी जगह कणों के आकारों में बहुत अधिक विविधताएं देखने को मिलती हैं। वहीं इनकी उत्पत्ति के बारे में जो तथ्य सामने आए हैं, उनसे एक बात स्पष्ट रूप से यह दर्शाती है कि लखनऊ के अलावा शेष सभी तुलनात्मक स्थानों पर ये कण ज्यादातर प्राकृतिक कारणों से ही उत्पन्न होते हैं, जबकि लखनऊ में प्राकृतिक रुप से उत्पन्न होने वाले सिलिका और अल्युमिनोसिलिकेट को छोड़कर शेष सभी तरह के कणों की उत्पत्ति के स्त्रोत अधिकांशतया मानवजनित गतिविधियां ही हैं।
 
पीएम10 को श्वसनीय स्तर के लिए भले ही सुरक्षित माना गया हो, परन्तु लखनऊ में किए गए ये शोध इसे नए सिरे से समझने की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं। प्राप्त परिणाम वर्तमान वायुगुणवत्ता के गहराई से अध्ययन के साथ साथ पीएम10 के मानव स्वास्थ पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने में भी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। अध्ययनकर्ताओं की टीम में सुशील कुमार भारतीय, धनंजय कुमार, संगीता आनंद, पूनम, श्यामल चंद्र बर्मन, नरेंद्र कुमार शामिल थे। यह शोध पत्रिका माइक्रॉन में प्रकाशित हुआ है। 
 
(इंडिया साइंस वायर)
 

रहना है हर खबर से अपडेट तो तुरंत डाउनलोड करें प्रभासाक्षी एंड्रॉयड ऐप



Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his/her private capacity and do not necessarily reflect the opinions, beliefs and viewpoints of Prabhasakshi and do not in any way represent the views of Prabhasakshi.

शेयर करें: