'हर्ष पर्वत' के साथ जुड़ी है भगवान शिव से संबंधित कथा

By डॉ. प्रभात कुमार सिंघल | Publish Date: Jul 14 2017 12:36PM
'हर्ष पर्वत' के साथ जुड़ी है भगवान शिव से संबंधित कथा

शेखावाटी के हृदय स्थल सीकर नगर से 16 किमी दूर दक्षिण में हर्ष पर्वत स्थित है जो अरावली पर्वत श्रृंखला का भाग है। यह पौराणिक, ऐतिहासिक, धार्मिक व पुरातत्व की दृष्टि से प्रसिद्ध, सुरम्य एवं रमणीक प्राकृतिक स्थल है।

शेखावाटी के हृदय स्थल सीकर नगर से 16 किमी दूर दक्षिण में हर्ष पर्वत स्थित है जो अरावली पर्वत श्रृंखला का भाग है। यह पौराणिक, ऐतिहासिक, धार्मिक व पुरातत्व की दृष्टि से प्रसिद्ध, सुरम्य एवं रमणीक प्राकृतिक स्थल है। हर्ष पर्वत की ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 3100 फीट है जो राजस्थान के सर्वोच्च स्थान आबू पर्वत से कुछ कम है। इस पर्वत का नाम हर्ष एक पौराणिक घटना के कारण पड़ा। उल्लेखनीय है कि दुर्दान्त राक्षसों ने स्वर्ग से इन्द्र व अन्य देवताओं का बाहर निकाल दिया था। भगवान शिव ने इस पर्वत पर इन राक्षसों का संहार किया था। इससे देवताओं में अपार हर्ष हुआ और उन्होंने शंकर की आराधना व स्तुति की। इस प्रकार इस पहाड़ को हर्ष पर्वत एवं भगवान शंकर को हर्षनाथ कहा जाने लगा। एक पौराणिक दन्त कथा के अनुसार हर्ष को जीणमाता का भाई माना गया है।

हर्ष पर्वत पर भगवान शंकर का प्राचीन व प्रसिद्ध हर्षनाथ मंदिर पूर्वाभिमुख है तथा पर्वत के उत्तरी भाग के किनारे पर समतल भू−भाग पर स्थित है। हर्षनाथ मंदिर से एक महत्वपूर्ण शिलालेख प्राप्त हुआ था, जो अब सीकर के राजकुमार हरदयाल सिंह राजकीय संग्रहालय में रखा हुआ है। काले पत्थर पर उर्त्कीण 1030 वि.सं. (973 ई.) के शिलालेख की भाषा संस्कृत और लिपी विकसित देवनागरी है। इसमें चौहान शासकों की वंशावली दी गई है। इसलिए चौहान वंश के राजनीतिक इतिहास की दृष्टि से यह बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें हर्षिगरी, हर्षनगरी तथा हर्षनाथ का भी विवरण दिया गया है। यह बताता है कि हर्ष नगरी व हर्षनाथ मंदिर की स्थापना संवत् 1018 में चौहान राजा सिंहराज द्वारा की गई और मंदिर पूरा करने का कार्य संवत् 1030 में उसके उत्तराधिकारी राजा विग्रहराज द्वारा किया गया। इन मंदिरों के अवशेषों पर मिला एक शिलालेख बताता है कि यहां कुल 84 मंदिर थे। यहां स्थित सभी मंदिर खंडहर अवस्था में हैं, जो पहले गौरवपूर्ण रहे होंगे। कहा जाता है कि 1679 ई. में मुगल बादशाह औरंगजेब के निर्देशों पर सेनानायक खान जहान बहादुर द्वारा जानबूझकर इस क्षेत्र के मंदिरों को नष्ट व ध्वस्त किया गया था। 
 
हर्षनाथ मंदिर को कई गांव जागीर के तौर पर प्रदान किये गये थे। इस मंदिर का ऊंचा शिखर सुदूर स्थानों व मार्गों से देखा जा सकता है। हर्ष का मुख्य मंदिर भगवान शंकर की पंचमुखी प्रतिमा वाला है। शिव वाहन नंदी की विशाल संगमरमरी प्रतिमा भी आकर्षक है। शिव मंदिर की मूर्तियां आश्चर्यजनक रूप से सुन्दर हैं। देवताओं व असुरों की प्रतिमाएं कला का उत्कृष्ट नमूना हैं। इनकी रचना शैली की सरलता, गढ़न की कुकुमारता व सुडौलता तथा अंग विन्यास और मुखाकृति का सौष्ठव दर्शनीय है। इन पत्थरों पर की गई कारीगरी यह बतलाती है कि उस समय के सिलावट कारीगर व शिल्पी अपनी कला को किस प्रकार सजीव बनाने में निपुण थे। मंदिर की दीवार व छतों पर की गई चित्रकारी दर्शनीय है। पुरातत्व विभाग द्वारा हर्ष पर्वत के सभी प्राचीन मंदिरों का संरक्षण प्राचीन संस्मारक एवं पुरावशेष स्थल अधिनियम 1985 के तहत किया जा रहा है।
 


1935 ई. में सीनियर अंग्रेज ऑफिसर कैप्टन डब्लू वैब ने हर्ष पर्वत की कलाकृतियों को महामंदिर स्थित कोठी के संग्रहालय में रखवाया। इस मंदिर से प्राप्त विश्व प्रसिद्ध लिंगोद्भव शिल्प खण्ड राजकीय संग्रहालय, अजमेर में प्रदर्शित है। हर्ष की मूर्तियां जयपुर व लंदन के संग्रहालयों में भी भेजी गई हैं। अभी भी कलात्मक स्तम्भों, तोरण द्वारों व शिल्प खण्डों के अवशेष शिव मंदिर के आस−पास बिखरे पड़े हैं। तत्कालीन राव राजा सीकर द्वारा हर्षनाथ मंदिर का प्रमुख शिलालेख एवं 252 प्रस्तर प्रतिमाएं भेट स्वरूप राजकुमार हरदयाल सिंह राजकीय संग्रहालय, सीकर को प्रदान किये गये जिन्हें इस म्यूजियम की हर्षनाथ कला दीर्घा में प्रदर्शित किया गया है। हर्षनाथ मंदिर से प्राप्त प्रमुख प्रतिमाओं में द्विबाहु नटेश शिव का शिल्पखण्ड, हरिहर−पितामाह−मार्तण्ड प्रतिमा, त्रिमुखी विष्णु प्रतिमा उल्लेखनीय हैं।
 
मुख्य शिव मंदिर की दक्षिण दिशा में भैरवनाथ का मंदिर है, जिसमें मां दुर्गा की सौलह भुजा वाली प्रतिमा है जिसकी प्रत्येक भुजा में विभिन्न शस्त्र हैं, एक हाथ में माला व दूसरे में पुस्तक है। इस मंदिर मर्दनी की खण्डित प्रतिमा एवं अर्धनारीश्वर रत्रधारी गणपति प्रतिमा भी है। मंदिर के मध्य गुफा जैसा तलघर भी है जिसमें काला भैरव तथा गोरा भैरव की दो प्रतिमाएं हैं। नवरात्र और हर सोमवार व अवकाश के दिन यहां धार्मिक श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है, मानो मेला लगा हो। इसके अलावा पूरे सालभर जात−जडूले वाले श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।
 
हर्ष पर्वत पर पायी जाने वाली वृक्ष प्रजातियों में प्रमुख है− सालर, धोकडा, कडाया, चुरेल, बड़, पीपल, अमलतास, खिरणी, खैरी, कचनार, कंकेडा, रोंझ, खेजड़ी, देशी बबूल, पलास, विलायती/इजरायली बबूल आदि। झाड़ी प्रजातियों में थोर, झडबेर, डांसर व विलायती आक आदि मुख्य है। हर्ष पर्वत वनौषधियों का भण्डार है। यहां अरडूसा नामक पौधे प्रचुर मात्रा में खड़े हैं जिससे खांसी की दवा ग्लाइकाडिनटर्पवसाका बनती है। इसके अतिरिक्त बांस, व्रजदंती, गोखरू, लापता, शंखपुस्पी, नाहरकांटा, सफेद मूसली, आदि वनौषधियां भी यहां मिलती है।
 


यहां मांसाहारी जरख, भडिया, गीदड, लोमड़ी, सर्प, नेवला, बीजू आदि मिलते हैं। शाकाहारी वन्य जीवों में रोजड़ा, सेही, लंगूर, काले मुंह के बन्दर आदि यहां दिखते हैं। पक्षियों में तीतर, बटेर, मोर, कबूतर, कोयल, चिड़िया, मैना, तोता, वाईल्ड बेबलर, बगुला, बतख आदि पाये जाते हैं।
 
हर्ष की पहाड़ी पर जिला पुलिस सीकर के वीएचएफ संचार का रिपिटर केन्द्र सन् 1971 में स्थापित किया गया था जो 24 घण्टे 365 दिन कार्यरत रहता है। यहां पर पुलिस कर्मियों की तैनाती भी रहती है। उक्त केन्द्र द्वारा जिला पुलिस सीकर का जयपुर, अजमेर, नागौर, चुरू, झुन्झुनू व अलवर जिलों से निरंतर व सीधा सम्पर्क रहता है, जिससे जिले में किसी अपराध के घटित होने पर सभी पड़ौसी जिलों से तुरन्त सम्पर्क कर नाकाबंदी जैसी कार्रवाई की जा सकती है। सीकर जिले के अन्दर भी वीएचएफ रिपिटर केन्द्र से सभी थानों, चौकियों नाका बिन्दुओं तथा पुलिस मोबाइल्स का सम्पर्क बना रहता है।
 
हर्ष पर्वत पर विदेशी कम्पनी इनरकोन द्वारा पवन चक्कियां लगाई गयी हैं जिनके सैंकड़ों फीट पंख वायु वेग से घूमते हैं तथा विद्युत का उत्पादन करते हैं। दूर से इन टावरों के पंखे घूमते बड़े लुभावने लगते हैं। मैसर्स इनरकोन इंडिया लिमिटेड ने वर्ष 2004 में 7.2 मेगावाट पवन विद्युत परियोजना प्रारम्भ की। यहां पवन को ऊर्जा में परिवर्तित करने वाले विशालकाय टावर लगे हुए हैं। यहां उत्पन्न होने वाली विद्युत ऊर्जा फिलहाल 132 के.वी.जी.एस.खूड को आपूर्ति की जाती है, जिसे विद्युत निगम आवश्यकतानुसार वितरित करता है।


 
हर्ष पर्वत पर वर्ष 1834 में सार्जेन्ट डीन नामक यात्री आये। उन्होंने कलकता में हर्ष पर्वत पर पत्र वाचन किया तो लोग दंग रह गये। हर्ष पर्वत पर आवागमन के लिये समाजसेवी स्वर्गीय बद्रीनारायण सोढाणी द्वारा अमेरिकी संस्था कासा की सहायता से सड़क निर्माण करवाकर वाहनों के लिये आवागमन का रास्ता खोला गया। हर्ष पर्वत पर जाने के एक पैदल रास्ते (पगडंडी) का निर्माण वर्ष 1050 में तत्कालीन राजा सिंहराज द्वारा करवाया गया था। समाजसेवी स्वर्गीय बद्रीनारायण सोढाणी द्वारा इस रास्ते का जीर्णोद्धार करवा कर खुर्रानुमा रास्ते का निर्माण करवाया गया। यह रास्ता करीब 2.25 किमी लम्बा है। जिसका वर्ष 2011 में जिला कलेक्टर, धर्मेन्द्र भटनागर द्वारा वन विभाग के सहयोग से पुनः जीर्णोद्धार कराया गया। हर्ष पर्वत का नियत्रंण एवं स्वामित्व वन विभाग का है। यहां वन विभाग का अतिथि गृह एवं प्रशिक्षण केन्द्र भी स्थापित है।
 
डॉ. प्रभात कुमार सिंघल 
लेखक एवं पत्रकार

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