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इसलिए ऐतिहासिक गुरुद्वारों में शामिल है शीश गंज साहिब गुरुद्वारा

By रेनू तिवारी | Publish Date: Mar 5 2018 7:23PM

इसलिए ऐतिहासिक गुरुद्वारों में शामिल है शीश गंज साहिब गुरुद्वारा
Image Source: Google

जहां टूट गया औरंगजेब का गुरुर..जीत गया 'गुरु' का अभिमान..जहां धर्म की रक्षा के लिए गुरु तेगबहादुर ने दी थी शहादत..जहां सिखों के नौवें गुरू ने दिया था जीवन का बलिदान..दिल्ली के उस पावन गुरुद्वारे को शत-शत प्रणाम।

हम बात कर रहे हैं दिल्ली की सबसे पुरानी मार्केट चांदनी चौक में स्थित गुरुद्वारा शीश गंज साहिब की.. 
यहां की अरदास का अंदाज आपका मन मोह लेगा..
सबद का सुर आपको साहिब गुरु तेगबहादुर जी के नजदीक होने का एहसास कराएगा...
हजारों लोग यहा रोजाना दर्शन के लिए आते हैं..
मन में अधूरी इच्छाओं को पूरा करने के लिए साहिब से अरदास करते हैं..  
मुगलों की विरासत लाल किले से सामने बना गुरुद्वारा शीश गंज बुराई की हार और सच्चाई की विजय का एक आदर्श है...
गुरुद्वारा शीश गंज साहिब दिल्ली में मौजूद नौ ऐतिहासिक गुरुद्वारों में से एक है। 1783 में बघेल सिंह ने नौवें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर की शहादत के उपलक्ष्य में इसका निर्माण किया था।
 
गुरुद्वारा शीश गंज साहिब का इतिहास
गुरुद्वारा शीश गंज साहिब दिल्ली में मौजूद नौ ऐतिहासिक गुरुद्वारों में से एक है। यह पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक में स्थित है। 1783 में बघेल सिंह ने नौवें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर की शहादत के उपलक्ष्य में इसका निर्माण किया था। औरंगजेब ने जबरदस्त आतंक फैलाया हुआ था। उसके आदेश पर सभी कश्मीरी पंडितों को जबरदस्ती इस्लाम में परिवर्तित किये जाने का हुकुम था। उस समय सिखों के नौवें गुरु 'गुरु तेग बहादुर जी' अपने परिवार के साथ अनंदपुर साहिब (अब पंजाब) में रहते थे। 
 
शहीदी का समय
सभी कश्मीरी पंडित गुरु जी के दरबार में पहुंचे और उनसे हिन्दुओं को इस परेशानी से बाहर निकलने के लिए विनती करने लगे। तब गुरु जी के पुत्र, गोबिंद राय (गुरु गोबिंद सिंह जी) जो कि उस समय मात्र 10 वर्ष की आयु के थे, उन्होंने अपने पिता से कहा, 'इस समय परिस्थिति किसी महान शख्स की शहादत मांग रही है और आपके अलावा यहां कोई नहीं है जो यह बलिदान दे सके'।
 
दिल्ली पहुंचे गुरु जी
पुत्र की समझदारी भरी बात सुन गुरु जी अत्यंत प्रसन्न हुए और अपने साथ 5 संगियों को लेकर दिल्ली के लिए रवाना हुए। दिल्ली आने पर जब गुरु जी ने मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर इस्लाम स्वीकार करने से और अपना धर्म बदलने के लिए मना कर दिया तो 11 नवंबर 1675 को उन्हें मौत की सजा दी गई।
 
गुरुद्वारा शीश गंज साहिब- शहादत
उनको ये शहादत गुरुद्वारा शीश गंज साहिब की जगह पर सुनाई गयी थी। एक जल्लाद जलाल-उद-दीन जल्लाद ने उनको निष्पादन किया। उनको जहां पर निष्पादन किया गया वहां एक बरगद का पेड़ था।
 
ऐसे हुआ अंतिम संस्कार
यह कहा जाता है कि जब गुरुजी की मृत्यु हुई उस समय कोई भी उनके शरीर को ले जाने का साहस न कर सका। तभी बारिश हुई और उनके चेले उनके शरीर और उनके सिर को लेकर गए। उनके सिर को चक्क नानकी में ले जाया गया और उनके शरीर को आनंदपुर साहिब में जहां आज गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब स्थित है।
 
गुरु तेग बहादुर का दाह संस्कार 
औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर का शरीर सार्वजनिक ना किये जाने का आदेश दिया था। जब गुरु तेग बहादुर के शरीर को देने से मना किया गया तो उनके एक चेले लखी शाह वंजारा ने अंधेरे की आड़ में गुरु के शव को चोरी कर लिया।
 
गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब
गुरु के शव को दाह संस्कार करने के लिए उसने अपने घर को जला दिया और साथ ही गुरु का शव भी जल गया। ये जगह आज एक गुरुद्वारे, गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब के रूप में मशहूर है।
 
आनंदपुर साहिब में कटे शीश का दाह संस्कार
गुरू तेग बहादुर के कटे हुए सिर को उनके एक चेले जैता द्वारा आनंदपुर साहिब ले जाया गया। कहते हैं जब जैता गुरु जी के शीश के साथ गोबिंद राय के समक्ष पहुंचे तो वे बोले, 'जैता, गुरु का बेटा'... वहां पर गुरुगुरू तेग बहादुर के छोटे बेटे, गुरु गोबिंद राय ने शीश का अंतिम संस्कार किया।
 
गुरुद्वारा शीश गंज का निर्माण
11 मार्च 1783 में सिख मिलिट्री के लीडर बघेल सिंह अपनी सेना के साथ दिल्ली आए। वहां उन्होनें दिवान-ए-आम पर कब्जा कर लिया। इसके बाद मुगल बादशाह शाह अलाम द्वितीय ने सिखों के एतिहासिक स्थान पर गुरुद्वारा बनाने की बात मान ली और उन्हें गुरुद्वारा बनाने के लिए रकम दी। 8 महीने के समय के बाद 1783 में शीश गंज गुरुद्वारा बना। इसके बाद कई बार मुस्लिमों और सिखों में इस बात का झगड़ा रहा कि इस स्थान पर किसका अधिकार है। लेकिन ब्रिटिश राज ने सिखों के पक्ष में निर्णय दिया। गुरुद्वारा शीश गंज 1930 में पुर्नव्यवस्थित हुआ।....
 
बलिदान की इस धरती पर गुरु तेग बहादुर के रक्त से लिखा गया है देश का इतिहास.. इस पावन धरती को शत-शत नमन...
 
-रेनू तिवारी

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