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अनवर जलालपुरी वास्तव में विलक्षण प्रतिभा के धनी थे

By घनश्याम भारतीय | Publish Date: Jan 2 2018 4:32PM

अनवर जलालपुरी वास्तव में विलक्षण प्रतिभा के धनी थे
Image Source: Google

देश में फैले धार्मिक विद्वेष से उपजी कटुता से दूर हटकर समाज को प्यार मोहब्बत ओैर साम्प्रादायिक सौहार्द की सीख देने वाले प्रख्यात शायर, संवाद लेखक व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के मंच संचालक अनवर जलालपुरी ने आज आंखें मूंद लीं और अपने चाहने वालों को बदहवास छोड़ दुनिया से रुख़्सत हो गये। उन्हें पिछली सरकार में यशभारती पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें आज मरहूम लिखने में हाथ कांप गये। लगभग चार दशक तक प्रभावशाली शायरी और अपने उद्बोधन के जरिये हिन्दुस्तान के अलावा उसकी सरहद के पार दुनिया के तमाम देशों में अपनी माटी का नाम रोशन करने वाले इस साहित्य के पुरोधा ने उर्दू शायरी में गीता लिखकर अमरत्व प्राप्त कर लिया। प्रख्यात संत पल्टू दास की सरजमी पर जन्मे पले बढ़े अंग्रेजी के विद्वान और उर्दू, अरबी के ज्ञाता अनवर जलालपुरी ने संत पल्टू दास की रचना- "डाल डाल पर अल्लाह लिखा है पात पात पर राम" से प्रेरित होकर सांप्रादायिक सौहार्द बनाये रखने का जो बीड़ा उठाया था उसे आजीवन बखूबी ढोते रहे।

जब हिन्दुस्तान की सरजमीं पर गुलामी छटपटा रही थी और आजादी मिलने में महज एक माह नौ दिन का समय शेष था तब जलालपुर कस्बे में हाफिज मो0 हारून के पुत्र के रूप में 6 जुलाई 1947 को जन्मे अनवर जलालपुरी वास्तव में विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। प्राथमिक शिक्षा स्थानीय स्तर पर ग्रहण करने के बाद उन्होंने गोरखपुर विश्वविद्यालय से 1966 में अंग्रेजी, अरबी और उर्दू विषय के साथ स्नातक और 1968 में अलीगंज मुस्लिम विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एमए और अवध विश्वविद्यालय से उर्दू में एमए और जामिया मिल्लिया अलीगढ़ से अदीब कामिल की डिग्री हासिल करने के बाद परूइया आश्रम सहित कई शिक्षण संस्थानों में प्राइवेट शिक्षक के रूप में शिक्षा दी। लेकिन नरेन्द्र देव इंटर कालेज जलालपुर में जहां वे छात्र हुआ करते थे वहीं अंग्रेजी प्रवक्ता नियुक्त हुए तब उनके जीवन में स्थायित्व आया। यहीं से जागृत हुए उनके अंदर के अदब के विरवा ने विशाल वट वृक्ष का रूप लिया।
 
अनवर जलालपुरी के अंदर का साहित्य मेगा सीरियल अकबर द ग्रेट में उभर कर सामने आया। उन्होंने इस प्रख्यात सीरियल के लिए गीत और संवाद लेखन का कार्य 1996 में किया। इसी के साथ हिन्दी फिल्म डेढ़ इश्किया में नसीरूद्दीन शाह और माधुरी दीक्षित के साथ शायर और मंच संचालक की भूमिका निभा कर शोहरत बटोरी। शोहरत का यह सिलसिला अनवर जलालपुरी के जीवन के साथ चलता रहा। पिछले 40 वर्षों से राष्ट्रीय और अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर होने पर कवि सम्मेलनों और मुशायरों में अनवर जलालपुरी आवश्यक अंग हुआ करते थे। अरब राष्ट्रों में स्थित भारतीय दूतावासों में आयोजित मुशायरों का संचालन अनवर जलालपुरी के बिना फीका पड़ जाता था। उन्होंने अमेरिका, कनाडा, पाकिस्तान, इग्लैण्ड सहित अरब राष्ट्रों में भारतीय मूल के नागरिकों द्वारा आयोजित सहित्यिक सम्मेलनों का संचालन कर अपने देश का नाम ऊंचा किया। नरेन्द्रदेव इण्टर कालेज के अंग्रेजी प्रवक्ता के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद लखनऊ में रह कर इस शायर ने जब हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रंथ गीता का काव्यात्मक अनुवाद उर्दू शायरी में किया तो देश के साहित्य जगत में एक नई चर्चा छिड़ गयी। इस महान कार्य के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उन्हें यशभारती पुरस्कार प्रदान किया।
 
इसके पूर्व अनवर जलालपुरी ने तोश-ए-आखिरत, उर्दू शायरी में गीताजंलि, उर्दू शायरी में रूबाईयाते खय्याम, जागती आंखे, खुशबी की रिस्तेदारी, खारे पानियों का सिलसिला, रोशनायी के सफीर, अपनी धरती अपने लोग, जरबे लाइलाह, जमाले मोहम्मद, बादअज खुदा, अरफे अब्जद, राहरौ से रहनुमा तक पुस्तके साहित्य जगत को दी। इसके अलावा अदब के अक्षर, कलम का सफर और सफीराने अदब भी लिखा। अनवर जलालपुरी को उनके कार्यों के लिए उत्तर प्रदेश गौरव, फिराक सम्मान, माटी रत्न सम्मान सहित दर्जनों सम्मान व पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। उन्होंने सिर्फ साहित्य के क्षेत्र में ही काम किया हो ऐसा नहीं, बल्कि जलालपुर में मिर्जा गालिब इंटर कालेज की स्थापना करके शिक्षा की भी लौ जलायी है। जिसके वे संस्थापक प्रबन्धक रहे हैं।
 
इस योग्य और महान साहित्य शिल्पी का महत्व पिछली बसपा सरकार में भी समझा गया था। तब उन्हें उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद का चेयर मैन बनाते हुए राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया था लेकिन उन्होंने साहित्य के आगे सियासत को हमेशा बौना ही समझा। वास्तव में अनवर जलालपुरी व्यक्ति विशेष का नहीं, विचारों के एक पुन्ज का दूसरा नाम है। उनके व्यवहार में भी साहित्य का भरपूर समावेश हर समय देखा जा सकता है। पहली ही मुलाकात में गैरों के भाई बन जाने और गैरों को अपना बना लेने की कला उनके अंदर कूट कूट कर भरी थी।
 
मेरा करीब एक दशक का समय उनके सान्निध्य में बीता है इसलिए मैं यह बात अत्यन्त विश्वास के साथ कह सकता हूं कि जिसने अनवर जलालपुरी को समझ लिया उसने साहित्य और अध्यात्म के गूढ़ रहस्य को समझ लिया और जो उन्हें नहीं समझ पाया वह कुछ भी नहीं समझ पाया। बीते दिनों उन्हें ब्रेन हेमरेज होने के बाद लखनऊ स्थित मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था। जहां इलाज के दौरान आज 2 जनवरी 2018 को प्रातः लगभग 10:00 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। वास्तव में अनवर जलालपुरी का जीवन एक पेचीदा किताब था। जिसे पढ़ना तो आसान था मगर समझना बहुत कठिन था। उनके अचानक रुखसत होने से भारतीय साहित्य को एक गहरा आघात लगा है। जिसकी भरपाई शायद कभी नहीं हो पाएगी।
 
घनश्याम भारतीय
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)