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सामुदायिक रेडियो के माध्यम से महिला सशक्तिकरण का अभिनव प्रयास

By सोनिया चोपड़ा | Publish Date: Mar 8 2018 4:05PM

सामुदायिक रेडियो के माध्यम से महिला सशक्तिकरण का अभिनव प्रयास
Image Source: Google

आज हर जगह महिला सशक्तिकरण पर चर्चा हो रही है, लेकिन क्या सामाजिक बदलाव के बिना महिलाओं का सशक्तिकरण संभव है। राष्ट्रीय मीडिया में महिला दिवस विशेष पर महिला सशक्तिकरण एवं महिला सम्मान के कई आयोजनों की खबरें खूब छपेंगी लेकिन क्या वास्तव में हम महिला सशक्तिकरण के प्रति गंभीर हैं। आज जब राष्ट्रीय मीडिया राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मसलों और अपराध की खबरों पर आत्ममुग्ध है, ऐसे में सामुदायिक रेडियो चुपचाप समाज एवं विशेष रूप से महिला सशक्तिकरण की दिशा में सार्थक पहल के साथ उठ खड़ा हुआ है और वह महिलाओं को न सिर्फ शिक्षा के मायने सिखा रहा है बल्कि उनमें आत्मनिर्भरता का हौसला भी बढ़ा रहा है। पहले की अपेक्षा महिलाओं की दशा पर सुधार तो हुआ है लेकिन अभी भी देश की आधी आबादी अपने अनेक अधिकारों से वंचित है इसलिए इस तरह की पहल हो बढ़ावा देना चाहिए और सरकार को विशेष योजनाएं चलाकर ऐसे सार्थक प्रयासों को जिंदा रखने पर बल देना चाहिए।  

हाशिए पर पड़े समुदायों को विकास की मुख्यधारा में शामिल करने और सामुदायिक गतिविधियों में हर स्तर पर उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अल्फाज़-ए-मेवात सामुदायिक रेडियो एसएम सहगल फाउंडेशन (गैर सरकारी संगठन) द्वारा 2012 में नूंह के गाँव घागस में स्थापित किया गया है। रेडियो घाघस 20 किलोमीटर की परिधि में आने वाले 225 गांवों के ग्रामीणों को रोज विभिन्न सूचनापरक और मनोरंजन कार्यक्रमों का प्रसारण कर जानकारी प्रदान करता है। रेडियो समुदाय के हर वर्ग मसलन बच्चों, महिलाओं, किसानों, किशोरों तथा वृद्ध लोगों से विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए जुड़ा है। सामुदायिक रेडियो ने यहां के लोगों में जनजागृति तो पैदा की ही है, साथ ही उनमें अपनी तकलीफ और दुखों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों तक अपनी आवाज बुलंद करने का हौसला भी भर दिया है।
 
सामुदायिक रेडियो का स्वरूप लोकतांत्रिक है जिसमें हर व्यक्ति को बोलने, सुनने और कार्यक्रम बनाने की पूरी छूट है। रेडियो संचार का एक ऐसा माध्यम है जिससे ग्रामीणों के विकास और सशक्तिकरण की राह खुलती है और निरक्षर भी अपनी भागीदारी निभा सकते हैं। इसके ग्रामीण न केवल श्रोता हैं, बल्कि कार्यक्रम निर्माण में भी उनकी प्रमुख भूमिका होती है। रेडियो के माध्यम से विभिन्न सरकारी योजनाओं, पंचायती राज और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर स्थानीय भाषा में कार्यक्रम प्रसारित किए जा रहे हैं। अब गांव वालों को यह जानकारी मिलने लगी है। हर रोज लोकप्रिय कार्यक्रमों के समय सभी ग्रामीण अपनी आवाज में अपने कार्यक्रम सुनने को लिए रेडियो सेट के सामने जमा होने लगते हैं।
 
गांव की शकीला बेगम कहती हैं रेडियो एक ऐसा माध्यम है जो सस्ता है और इसकी पहुंच सब लोगों तक है। यही वजह है कि जब से रेडियो गांव में बजने लगा है, ज्यादातर लोगों ने रेडियो सेट खरीद लिया है। उन्हें लगने लगा है कि यह रेडियो उनका अपना है, जहां वे अपनी हर बात रख सकते हैं। रेडियो के स्टेशन इंचार्ज सोहराब खान के अनुसार कार्यक्रम तैयार करने के लिए 6 सदस्यों की टीम अलग-अलग गांवों का दौरा करती है। सप्ताहभर के कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की जाती है और जरूरत पड़ने पर कार्यक्रम दूसरों की आवाज में रिकार्ड किये जाते हैं। यहां के ग्रामीण बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं होने के बावजूद जिस कुशलता से कार्यक्रम तैयार करते हैं, वह किसी को भी अचंभे में डाल सकता है। कई कार्यक्रमों का संचालन करने वाले शाकिर हुसैन में बताते हैं कि कार्यक्रम तैयार करने के लिए गांव वाले खुद विषय का चुनाव करते हैं। अनुराधा रेडियो प्रस्तोता है और उसकी दिनचर्या कार्यक्रम के स्क्रिप्ट पढ़ने के अभ्यास से शुरू होती है और जरूरत पड़ने पर स्क्रिप्ट लिखनी भी पड़ती है। रिपोर्टिंग और प्रोग्राम की रिकार्डिंग के लिए गांवों के अलावा सरकारी अधिकारियों की सलाह के लिए घंटों सफर रोजमर्रा का काम है। 
 
हरियाणा के सबसे पिछड़े नूंह जिले के गांवों में डिजिटल इंडिया के इस दौर में भी 10 प्रतिशत से कम घरों में टेलीविज़न हैं। ऐसे में जो महिलाएं पढ़ना-लिखना नहीं जानतीं रेडियो सुनकर सारी जानकारियाँ पाती हैं। पिछले 5 सालों से रेडियो अल्फाज़-ए-मेवात न केवल समुदाय कीमहिलाओं से जुड़ा है बल्कि समाज के हर वर्ग बच्चों, किशोरों, किसानों, वृद्धों को विभिन्न रेडियो कार्यकमों के ज़रिये सूचना और जानकारी देकर आत्म-निर्भर बनाने में सहयोग कर रहा है ताकि वे निर्णय लेकर समाज में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकें। समुदाय को सशक्त और जागरूक बनाने और कार्यक्रमों को जनोपयोगी बनाने के लिए रेडियो में ऐसे कार्यक्रमों को प्रमुखता दी जाती है जिसमें, विशेषज्ञों तथा विभागों के उच्च अधिकारी लाइव चर्चाओं के माध्यम से स्वयं लोगों की समस्याओं का निदान करते हैं और यथोचित सलाह देते हैं।
 
पूजा मुरादा, निदेशक, संचार, रेडियो अल्फाज़-ए-मेवात (अध्यक्ष- कम्युनिटी रेडियो ऐसोसिएशन) ने बताया कि पांच साल पहले 3 घंटे प्रतिदिन के प्रसारण से शुरू हुआ उनका सामुदायिक रेडियो आज 13 घंटे प्रतिदिन प्रसारण कर रहा है। यहां लोगों को सड़क, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं तक मुहैया नहीं हैं। इसलिए हमने इस क्षेत्र का चुनाव किया है जिससे यह हाशिए पर खड़े लोगों को अपनी आवाज उठाने के लिए मंच तो मुहैया करा ही रहा है बल्कि उनका हमदर्द बनकर उनकी बुनियादी जरूरतें पूरी करने में भी मदद कर रहा है। सामुदायिक रेडियो जो सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक रूप से पिछड़े वर्गों की आवाज है, आज उनके विकास का एक प्रमुख माध्यम बन गया है। यह एक ऐसी सामाजिक प्रक्रिया है जिसमें अनेक समुदाय मिलकर कार्यक्रमों की परिकल्पना, संचालन और उनका प्रसारण करते हैं। समुदाय के सदस्यों की भागीदारी की वजह से यह मुनाफे, प्रचार, ताकत, राजनीति और विशेषाधिकारों के लिए काम करने वाली मीडिया से भिन्न होता है। उनका कहना है कि अक्सर देखा गया है कि पारंपरिक मीडिया मसलन टी.वी. और अखबारों में ग्रामीण खबरों, समस्याओं और मुद्दों का अभाव रहता है। ऐसे में हम सामुदायिक रेडियो "अल्फाज़-ए-मेवात" के जरिए ग्रामीण भारत को शहरी भारत से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
 
रेडियो के शुरूआती दौर के बारे में पूजा बताती है और कि “एक समय था जब यहाँ की महिलाएं हमें देखकर ही दरवाजा बंद कर लेती थी लेकिन धीरे-धीरे महिलाओं और स्थानीय समुदाय को समझ आया कि यह उनकी भलाई के लिए है और आज हमारे रेडियो स्टेशन में ऐसा कोई प्रोग्राम नहीं है जिसमें ग्रामीणों और महिलाओं की आवाज़ व भागीदारी न हो।" सहगल फाउंडेशन के प्रयास से आज से करीब छह साल पहले इस सामुदायिक रेडियो की शुरुआत हुई थी। आज इस रेडियो में कृषि विभाग, मेवाती संस्कृति, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग, पुलिस, कानून जैसे तमाम विषयों के विषय विशेषज्ञ से ग्रामीणों की सीधी बात कराई जाती है। इसमें एक किसान से लेकर घर में काम करने वाली गृहणी तक सरकारी योजनाओं की जानकारी कैसे पहुंचे इसके लिए सामुदायिक रेडियो एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
 
गाँव के चार साल के बच्चे से लेकर एक उम्रदराज व्यक्ति तक हर कोई हमारे कार्यक्रम को सुनते हैं। सामुदायिक रेडियो में हर उम्र को ध्यान में रखकर रेडियो कार्यक्रम बनते हैं और उन्हीं की भाषा और आवाज़ में होते हैं जिससे लोग इसे अपना रेडियो मानते हैं। घाघस गांव के ताहिर ने बताया, ''मैं 1960 से रेडियो सुनता हूँ लेकिन 2012 से हमारा अपना रेडियो अल्फाज़-ए-मेवात खुला है तबसे यही सुन रहा हूँ। हम रेडियो स्टेशन में फोन करते हैं तो हमें हमारी आवाज़ सुनाई पड़ती है। हमारी समस्याओं की बात होती है और हमें सारी सरकारी योजनाओं की जानकारी घर बैठे रेडियो से मिल जाती है। हमारी पसंद के गाने एवं लोकगीत बजते हैं। बच्चों, महिलाओं के स्वास्थ्य और शिक्षा की बात होती है। रेडियो पर सरकारी अफसर खुद सारी जानकारी देते हैं।” 
 
जब से मेवात में इस रेडियो की शुरूआत हुई है, गांव वालों में जैसे जोश और जागरूकता आ गई है। सामुदायिक रेडियो के रूप में गांववालों को एक ऐसा माध्यम मिल गया है जिसके जरिए वह प्रशासन तथा नीति-निर्माताओं तक अपनी समस्याएं तथा जरूरतें बता सकते सकते हैं। प्रोग्राम लीडर आरती मनचंदा ग्रोवर बताती हैं कि गांव की महिलाएं आज भी अत्यंत संकुचित माहौल में रहती हैं और अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं तक किसी से नहीं कह पाती हैं। ऐसे में सामुदायिक रेडियो ने उन्हें एक ऐसा अवसर दिया है जहां महिलाएं परिवार नियोजन, स्त्री रोग, बच्चों के टीकाकरण और गर्भावस्था में स्वास्थ्य की देखभाल संबंधी जानकारी पा सकती हैं और अपने सवाल पूछ सकती हैं। वह बताती हैं कि अब महिलाएं खुलकर परिवार नियोजन और गर्भनिरोधक उपायों के बारे में बात करने लगी हैं। रेडियो पर लिंग समानता के कई कार्यक्रम चलाए जाते हैं जिससे पुरूषों की सोच भी बदलना शुरू हुई है और महिलाएं ज्यादा सशक्त होकर उभरी हैं।
 
-सोनिया चोपड़ा

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