ज्योति बसु पुण्यतिथि विशेष: कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री जो प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गया

  •  अनुराग गुप्ता
  •  जनवरी 16, 2021   16:50
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ज्योति बसु पुण्यतिथि विशेष: कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री जो प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गया

संयुक्त मोर्चा के नेता वीपी सिंह के आवास पहुंचे और उनका सुझाव मांगा। हालांकि, वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री बनने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि मैं डेढ़ साल पहले ही सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुका हूं, ऐसे में दोबारा प्रधानमंत्री बनने का सवाल ही नहीं उठता।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के जाने माने नेता ज्योति बसु 7 रेसकोर्स रोड पहुंचते-पहुंचते रह गए थे। वह उन लोगों में से हैं जिन्हें उन्हीं की पार्टी ने जाने से रोक दिया था। जबकि पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह चाहते थे कि ज्योति बसु को हिन्दुस्तान की गद्दी में बैठाया जाए और इसके लिए उन्होंने कई बार हरकिशन सिंह सुरजीत को पुनर्विचार करने के लिए कहा था।

दरअसल, साल 1996 में जब 11वीं लोकसभा के परिणाम सामने आए तो किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। ऐसे में हिन्दुस्तान की सत्ता में कौन काबिज होगा इस तरह के सवाल पूछे जाने लगे ? हालांकि, चुनाव परिणाम के बाद भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी मगर उनके पास इतनी सीटें नहीं थी कि वह अकेले अपने दम पर सरकार बना लें। 10 मई की शाम को दिल्ली की सियासी हलचलें दिखाईं दीं। शाम को सीपीएम नेता हरकिशन सिंह सुरजीत ने मोर्चा संभाला और जनता दल सहित बाकी की दलों के नेता एकजुट होने लगे और संयुक्त मोर्चा बनाया गया। कांग्रेस और भाजपा के पास पूर्ण बहुमत नहीं था ऐसे में आगे क्या होगा ? सभी के जहन में यही सवाल था।

लोकसभा चुनावों में जनता दल तीसरी बड़ी पार्टी बनकर उभरी और कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन देने की बात भी कह दी थी। यह वो दौर था जब जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव हुआ करते थे। ऐसे में हरकिशन सिंह सुरजीत के साथ हुई बैठक में वीपी सिंह के नाम पर आम सहमति बन गई।

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इसके बाद संयुक्त मोर्चा के नेता वीपी सिंह के आवास पहुंचे और उनका सुझाव मांगा। हालांकि, वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री बनने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि मैं डेढ़ साल पहले ही सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुका हूं, ऐसे में दोबारा प्रधानमंत्री बनने का सवाल ही नहीं उठता। इसके बावजूद उनसे प्रधानमंत्री पद के लिए पुनर्विचार करने को कहा गया और उन्होंने फिर से इनकार कर दिया।

जब वीपी सिंह ने सुझाया ज्योति बसु का नाम

जब संयुक्त मोर्चा ने वीपी सिंह को ही प्रधानमंत्री पद के लिए नाम सुझाने को कहा तो उन्होंने ज्योति बसु का नाम सुझाया। ज्योति बसु के नाम पर भी सभी ने सहमति जता दी और फिर अगले दिन अखबारों में खबर छप गई कि ज्योति बसु अगले प्रधानमंत्री होंगे...

खबर भी छप गई, संयुक्त मोर्चा भी ज्योति बसु के नाम पर अपनी मुहर लगा चुका था और ज्योति बसु भी खुश थे इसके बावजूद वह प्रधानमंत्री नहीं बन पाए। अब आप लोग सोच रहे होंगे कि ऐसा क्या हुआ कि वह प्रधानमंत्री पद तक पहुंचते-पहुंचते रह गए ? दरअसल, ज्योति बसु की पार्टी सीपीएम ने सेंट्रल कमिटी की बैठक बुलाई और वहां पर ज्योति बसु के प्रधानमंत्री बनने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

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इसके बाद फिर से हरकिशन सिंह सुरजीत ने संयुक्त मोर्चा की बैठक बुलाई और नए नामों के लिए काफी विचार-विमर्श किया और अंतत: ज्योति बसु ने मुख्यमंत्री एचडी देवेगौड़ा का नाम सुझाया। जिस पर आपसी सहमति बनी।

संयुक्त मोर्चा ने एचडी देवेगौड़ा को दल का नेता चुन लिया और राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा को इसकी जानकारी देने के लिए राष्ट्रपति भवन गए हालांकि, संयुक्त मोर्चा ने कांग्रेस के समर्थन वाली चिट्ठी अभी तक सौंपी नहीं थी। कांग्रेस द्वारा देर-दराज किए जाने के बाद राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को सरकार बनाने का न्योता दे दिया और फिर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बन गई। हालांकि, यह सरकार महज 13 दिनों की ही थी।

- अनुराग गुप्ता







निगेटिव रोल में भी हीरोइन से अधिक चर्चा में रहीं ललिता पवार

  •  अमृता गोस्वामी
  •  फरवरी 24, 2021   13:14
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निगेटिव रोल में भी हीरोइन से अधिक चर्चा में रहीं ललिता पवार

ललिता पवार का जन्म 18 अप्रैल 1916 को नासिक में हुआ था। उनका बचपन का नाम अंबिका था फिल्मों में उन्हें ललिता के नाम से जाना गया। इनके पिता का नाम लक्ष्मण राव सगुन और माता का नाम अनुसूया था। ललिता एक संपन्न घराने से थीं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई।

ललिता पवार हिन्दी सिनेमा की ऐसी अभिनेत्री रही हैं जिन्होंने अपनी अधिकतर फिल्मों में निगेटिव भूमिकाएं निभाई थीं। उनका अभिनय इतना सशक्त और सजीव था की फिल्में देखकर लगता ही नहीं था की वह अभिनय कर रही हैं या यह सब सत्य में घटित हो रहा है। अपने अभिनय से ललिता पवार दर्शको के मन-मस्तिष्क में इस कदर छा जाती थीं कि दर्शक उनकी फिल्म देखने के बाद सिनेमा हाॅल से निकलने के बाद भी उनकी चर्चा घंटों तक किया करते थे। 

ललिता पवार का जन्म 18 अप्रैल 1916 को नासिक में हुआ था। उनका बचपन का नाम अंबिका था फिल्मों में उन्हें ललिता के नाम से जाना गया। इनके पिता का नाम लक्ष्मण राव सगुन और माता का नाम अनुसूया था। ललिता एक संपन्न घराने से थीं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई।

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11 वर्ष की उम्र में ललिता अपने पिता और और छोटे भाई शांताराम के साथ पुणे आई जहां उन्हें आर्यन फिल्म कंपनी के स्टूडियो में एक फिल्म की शूटिंग देखने का मौका मिला। फिल्मों में ललिता की रूचि को देखते हुए फिल्म निर्देशक नाना साहेब सरपोतदार ने उन्हें बाल भूमिकाएं करने का ऑफर दिया और यहां से ही ललिता के फिल्मी सफर की शुरूआत हुई। यह समय था जब मूक फिल्में बना करती थीं। ललिता पवार की पहली फिल्म 1927 में बनी ‘पतितोद्धार’ थी जो एक मूक फिल्म थी इसके बाद 1928 में उन्होंने फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ में काम किया और पश्चात कई और मूक फिल्मों ‘नेताजी पालेकर’ ‘संत दामाजी’ ‘अमृत’ ‘गोरा कुंभर’ इत्यादि में भी। 1930 में बनी फिल्म ‘चतुर संदरी’ में तो ललिता ने 17 रोल किए थे जोएक रिकार्ड है।

जब बोलती फिल्मों का जमाना आया तब 1932 में ललिता को फिल्म मिली ‘कैलाश’ जिसमें उन्होने तिहरी भूमिका निभाई थी, इस फिल्म में नायिका, मां और खलनायिका तीनो ही रोल में वह खुद थीं और इन तीनों रूप में उन्हें बहुत पसंद किया गया। गीत-संगीत में भी ललिता पवार की पकड़ काफी अच्छी थी। 1935 में बनी फिल्म ‘हिम्मते मर्दां’ में ललिता ने एक गाना भी गाया था ‘नील आभा में प्यारा गुलाब रहे, मेरे दिल में प्यारा गुलाब रहे।’ जो उस समय का काफी हिट गीत रहा। ललिता की शादी गणपतराव पवार से हूुई थी किन्तु कुछ कारणों के चलते उनका डिवोर्स हो गया, बाद में उन्होंने फिल्म प्रोडयूसर राजप्रकाश गुप्ता से शादी की।

ललिता पवार ने बॉलीवुड की कुछ थ्रिलर फिल्मों में भी काम किया। मस्तीखोर माशूक और भवानी तलवार, प्यारी कटार और जलता जिगर, कातिल कटार इत्यादि उनकी कुछ प्रारंभिक फिल्में थीं। फिर जब जमाना पौराणिक फिल्मों का आया तो ललिता पवार को इन फिल्मों में भी काफी काम मिला और उनके किरदारों को लोगों ने खूब सराहा। 1938 में बनी फिल्म ‘राजकुमारी’ में ललिता पवार का डबल रोल था।

1941 में मराठी फिल्मों के मशहूर उपन्यासकार विष्णु सखाराम खांडेकर की कहानी पर बनी फिल्म अमृत में ललिता पवार ने मोची का किरदार निभाया था, उनका यह अभिनय इतना सजीव था  कि इस रोल के बाद अपनी असली जाति बताने के लिए ललिता को अपना जाति प्रमाण पत्र दिखाना पड़ा।

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ललिता पवार की जिन्दगी से एक कठिन मोड़ उस समय आया जब 1942 में फिल्म जंग-ए-आजादी में वे भगवान दादा के साथ काम कर रही थीं। इस फिल्म के एक सीन में भगवान दादा को ललिता को थप्पड़ मारना था। थप्पड़ ललिता पवार को इतनी जोर का लगा कि वह वहीं गिर गईं, उन्हें लकवा हो गया जिसकी वजह से उनकी एक आँख छोटी हो गई। इलाज के लगभग 2 साल के विराम के बाद 1944 में ललिता पवार ने फिल्मों में वापस एंट्री तो की पर हीरोइन के लिए नहीं बल्कि चरित्र रोल में, 1944 में फिल्म ‘रामशास्त्री’ और 1948 में एस.एफ.यूनिस की फिल्म ‘गृहस्थी’ में वे क्रूर सास बनकर आईं। 1950 में वी. शांताराम की फिल्म ‘दहेज’ में भी ललिता पवार कठोर सास बनी। एक के बाद एक कई फिल्मों में कठोर, दुःख पहुंचाने वाली सास के रूप में भूमिकाएं करते हुए ललिता पवार की पहचान बहू को दुःख देने वाली सास के रूप में स्थापित हो गई। 

1955 में ललिता पवार ने राजकपूर की फिल्म श्री 420 में एक नरम दिल की औरत का रोल भी किया, इसमें वे केले वाली बनी थीं इस फिल्म में राजकपूर उन्हें दिलवाली कहते थे। अपने इस रोल में भी ललिता पवार काफी फेमस हुईं। 1959 में ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘अनाड़ी’ में ललिता पवार को बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला।

1980 में निर्देशक विजय सदानाह की फिल्म ‘सौ दिन सास के’ में ललिता पवार क्रूर सास के रोल में इतनी हिट हुईं कि इस फिल्म के बाद कई कठोर सासों को ललिता पवार ही कह दिया जाता। 

ललिता पवार ने लगभग 700 फिल्मों में काम किया। सुजाता, हम दोनों, संपूर्ण रामायण, जंगली, प्रोफेसर, घराना, खानदान, आंखें, आनंद, जिस देश में गंगा बहती है, कोहरा, संगम, बांबे टू गोवा, तपस्या, आईना, काली घटा, फिर वही रात और नसीब फिल्मों में उनकी भूमिकायें यादगार रहीं।

ललिता पवार ने छोटे पर्दे पर भी बहुत ही संजीदा काम किया, रामानंद सागर के लोकप्रिय टीवी धारावाहिक ‘रामायण’ में टेढ़ी चाल से चलती मंथरा का रोल उन्होंने इतना बखूबी निभाया कि मंथरा के पात्र को हर घर में बच्चा बच्चा भी जानने लगा।

ललिता पवार ने अभिनय भले ही कितने ही क्रूर किए हों किन्तु असल जिंदगी में वे बहुत ही नरम दिल की महिला थीं। उनकी जिन्दगी का अंतिम समय काफी कष्टप्रद बीता, ललिता पवार को  जबड़े का कैंसर हो गया था और इसके बाद उनकी हालत लगातार गिरती गई। अपनी तबियत और अंतिम परिस्थितियों को देखकर कई बार ललिता पवार मजाक में कहती थीं कि शायद इतने खराब रोलों की सजा भुगत रही हूं।

कठिन बीमारी के चलते 24 फरवरी 1998 को 82 साल की उम्र में ललिता पवार का पुणे में अपने बंगले आरोही में निधन हो गया। आज ललिता पवार भले ही हमारे बीच नहीं हैं किन्तु फिल्मों में उनकी निभाई भूमिकाओं से वे हम सबके बीच सदैव मौजूद रहेंगी।   

- अमृता गोस्वामी







दिलकश मुस्कान और खूबसूरत अदाकारी के लिए आज भी याद आती हैं मधुबाला

  •  अमृता गोस्वामी
  •  फरवरी 23, 2021   11:27
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दिलकश मुस्कान और खूबसूरत अदाकारी के लिए आज भी याद आती हैं मधुबाला

मधुबाला के बारे में शम्मी कपूर बताते थे कि मधुबाला से उनकी पहली मुलाकात ‘रेल का डिब्बा’ फिल्म के सेट पर हुई थी, उन्हें देखकर उनके चेहरे से नजरें हटाना मुश्किल था। वे जब पानी पीती थीं तो पानी उनके गले की नस में से गुजरता हुआ देखा जा सकता था।

मधुबाला 1940 के दशक की एक बेहद खूबसूरत अभिनेत्री थीं, उनका असली नाम मुमताज जहां बेगम था। मधुबाला का जादू सिर्फ उनकी फिल्मों के दर्शकों तक ही सीमित नहीं था बल्कि फिल्म इंडस्टी की कई नामी हस्तियां भी उनकी खूबसूरती की कायल थीं। मधुबाला का जन्म 14 फरवरी, 1933 को दिल्ली में एक पश्तून मुस्लिम परिवार में हुआ था। अपने फिल्मी कॅरियर की शुरुआत उन्होंने 1942 में बेबी मुमताज के नाम से फिल्म ‘बसंत’ से की तब वह सिर्फ 9 साल की थीं। बतौर अभिनेत्री मधुबाला की पहली फिल्म निर्माता निर्देशक केदार शर्मा की ‘नीलकमल’ थी जो 1947 में प्रदर्शित हुई। इस फिल्म में अभिनेता राजकपूर थे और बतौर अभिनेता राजकपूर की भी यह पहली फिल्म थी।

मधुबाला के बारे में शम्मी कपूर बताते थे कि मधुबाला से उनकी पहली मुलाकात ‘रेल का डिब्बा’ फिल्म के सेट पर हुई थी, उन्हें देखकर उनके चेहरे से नजरें हटाना मुश्किल था। वे जब पानी पीती थीं तो पानी उनके गले की नस में से गुजरता हुआ देखा जा सकता था। उनकी खूबसूरती के सामने तो फिल्म के डायलॉग भी याद रख पाना मुश्किल था। बात 1953 की है जब प्रसिद्ध अमेरिकन डायरेक्टर फ्रैंक काप्रा मुम्बई आये थे। फ्रैंक काप्रा ने जब एक पत्रकार के पास मुवी टाइम के कवर पेज पर छपी मधुबाला की फोटो देखी तो वे पूछे बिना नहीं रह सके कि क्या रियल लाइफ मे भी मधुबाला इतनी ही हसीन हैं।

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मधुबाला ने 70 के आसपास फिल्मों में काम किया जिनमें से 66 फिल्मों में वे लीड हीरोइन रहीं। ‘नीलकमल’, ‘महल’, ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’, ‘फागुन’, ‘हावड़ा ब्रिज’, ‘काला पानी’, ‘चलती का नाम गाड़ी’, ‘मुगल-ए-आजम’ फिल्मों में उनका अभिनय बेमिसाल था। मधुबाला के अभिनय को सिर्फ भारत में ही नहीं विदेशो में भी सराहा गया। अमेरिकी पत्रिका थिएटर आर्ट्स में मधुबाला पर एक पूरा पेज आर्टिकल निकला था, जिसका टाइटल था ‘द बिगेस्ट स्टार इन द वर्ल्ड’। अमेरिकन डायरेक्टर फ्रैंक कैपरा ने तो मधुबाला को अपनी फिल्म में कास्ट करना भी चाहा था किन्तु अपनी घरेलू निजी परेशानियों के कारण मधुबाला ये फिल्म नहीं ले पाईं। 

फिल्मों में मधुबाला ने जहां बेहद कामयाबी हासिल की वहीं उनकी जिंदगी में उन्हें हर वो खुशी हासिल नहीं हो पाई जिनकी उन्हें चाहत थी, खासकर प्रेम के मामले में मधुबाला को नाकामयाबी ही हासिल हुई । दिलीप कुमार से वह बेहद प्रेम करती थीं और सिनेमा जगत में भी उनकी जोड़ी दिलीप कुमार के साथ काफी पसंद की गई थी, दिलीप कुमार भी हालांकि मधुबाला के कायल थे किन्तु दोनों की हां के बावजूद रियल लाइफ में इस जोड़ी को न ही हासिल हुई। दिलीप कुमार से अपने प्यारका इजहार मधुबाला ने स्वयं किया था, उन्होंने अपनी ड्रेस डिजाइनर को गुलाब का फूल और एक खत देकर दिलीप कुमार के पास इस संदेश के साथ भेजा कि यदि वह भी उनसे प्यार करते हों तो इसे अपने पास रख लें। दिलीप कुमार ने मधुबाला के दिए फूल और खत को अपने पास रखकर अपनी हां जाहिर की थी किन्तु मधुबाला के पिता अताउल्ला खान मधुबाला और दिलीप कुमार के रिश्ते के खिलाफ थे उन्हें जब दिलीप कुमार के साथ मधुबाला की नजदीकियां पता चलीं तो उन्होंने मधुबाला को दिलीप कुमार के साथ काम करने से मना कर दिया। दिलीप कुमार तब भी मधुबाला से शादी करना चाहते थे। शादी करने के लिए दिलीप कुमार ने 1956 में मधुबाला की फिल्म ‘ढाके की मलमल’ की शूटिंग के दौरान मधुबाला से कहा कि वो आज ही उनसे शादी करना चाहते हैं परन्तु इसके साथ ही दिलीप कुमार ने मधुबाला के सामने एक शर्त भी रख दी कि शादी के बाद मधुबाला को अपने पिता से सारे रिश्ते तोड़ने होंगे। शादी के लिए दिलीप कुमार की यह शर्त मधुबाला ने मंजूर न की और उनकी यह प्रेम कहानी यहीं खत्म हो गई।

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पचास के दशक में मधुबाला को पता चला कि वे हृदय की गंभीर बीमारी से ग्रसित हैं। यह वो वक्त था जब मधुबाला की कई फिल्में निर्माण के दौर में थीं। मधुबाला ने अपनी बीमारी का अहसास किसी को कराए बिना पूरी मेहनत और लगन से अपनी फिल्मों की शूटिंग जारी रखी। इस बीच मधुबाला की तबियत काफी खराब रहा करती थी बावजूद इसके उन्होंने फिल्मों में अपने किरदार को बखूबी निभाया। साठ के दशक में मधुबाला ने अपनी खराब तबियत की वजह से फिल्मों मे काम करना काफी कम कर दिया था। इस बीच ‘चलती का नाम गाड़ी’ और ‘झुमरू’ इत्यादि फिल्मों से मधुबाला और किशोर कुमार एक दूसरे के काफी नजदीक आ गए थे, 1960 में किशोर कुमार ने मधुबाला से शादी कर ली। उस समय मधुबाला 27 साल की थीं। शादी के बाद मधुबाला की तबीयत काफी खराब रहने लगी थी। इसी बीच डॉक्टर्स ने उन्हें बताया कि वह अब ज्यादा समय नहीं जी पाएंगी। 

मधुबाला के दिल में छेद था और उन्हें फेफड़ों में भी परेशानी थी जिसके चलते 23 फरवरी 1969 को महज 36 साल की उम्र में ही वे इस दुनिया को अलविदा कह गईं। मधुबाला आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं किन्तु उनकी दिलकश मुस्कान और खूबसूरती भरी अदाकारी आज भी उनकी याद दिलाती है।

- अमृता गोस्वामी







शिवाजी ने हिंदू परम्परा के अनुकूल सम्प्रदाय निरपेक्ष धर्मराज्य की स्थापना की

  •  मृत्युंजय दीक्षित
  •  फरवरी 19, 2021   11:13
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शिवाजी ने हिंदू परम्परा के अनुकूल सम्प्रदाय निरपेक्ष धर्मराज्य की स्थापना की

शिवाजी भारत के पहले ऐसे शासक थे जिन्होंने स्वराज्य में सुराज की स्थापना की थी। प्रत्येक क्षेत्र में मौलिक क्रांति की। शिवाजी मानवता के सशक्त संरक्षक थे। वे सभी धर्मों का आदर और सम्मान करते थे। लेकिन हिंदुत्व पर आक्रमण कभी सहन नहीं किया।

महाराष्ट्र के ही नहीं अपितु पूरे भारत के महानायक थे वीर छत्रपति शिवाजी महाराज। वह एक अत्यंत महान कुशल योद्धा और रणनीतिकार थे। वीर माता जीजाबाई के सुपुत्र वीर शिवाजी का जन्म ऐसे समय में हुआ था जब महाराष्ट्र ही नहीं अपितु पूरा भारत मुगल आक्रमणकारियों की बर्बरता से आंक्रांत हो रहा था। चारों ओर विनाशलीला व युद्ध के बादलों के दृश्य पैदा हो रहे थे। बर्बर हमलावरों के आगे भारतीय राजाओं की वीरता जवाब दे रही थी उस समय शिवाजी का जन्म हुआ। उनका जन्म ऐसे समय में हुआ था जब पूरा भारत निराशा के गर्त में डूबा हुआ था। कहा जाता है कि जिस कालखंड में सेक्युलर राज्य की कल्पना पश्चिम में लोकप्रिय नहीं थी उस समय शिवाजी ने ही हिंदू परम्परा के अनुकूल सम्प्रदाय निरपेक्ष धर्मराज्य की स्थापना की। शिवाजी का जीवन रोमहर्षक तथा प्रेरणास्पद घटनाओं का भंडार है।

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जिस समय शिवाजी का जन्म हआ था उस समय पूरे भारत की हालत वास्तव में बहुत ही चिंतनीय व दारूण हो चुकी थी। चारों तरफ हाहाकार मचा था। एक के बाद एक भारतीय राजा मुगलों के अधीन हुये जा रहे थे। बिना युद्ध किये वे उनके गुलाम होते जा रहे थे। मंदिरों को लूटा जा रहा था, गायों की हत्या हो रही थी, नारी अस्मिता तार−तार हो चुकी थी। ऐसे भयानक समय में शिवनेरी किले में माता जीजाबाई ने वीर पुत्र को जन्म दिया। माता जीजाबाई ने बचपन से ही शिवाजी को कहानियां सुनायीं जिसका असर उनके मन पर पड़ा। शिवाजी की निर्भयता का उदाहरण उनके बचपन से ही मिलने लगा था। उन्होंने बीजापुर में सुल्तान के आगे सिर नहीं झुकाया। बस यहीं से उनकी विजय गाथा प्रारम्भ होने लग गयी थी। 16 वर्ष की अवस्था तक आते−आते मुगलों के मन में शिवाजी के प्रति भय उत्पन्न होने लग गया था। बीजापुर दरबार से लौटते समय एक बार उन्होंने रास्ते में एक कसाई जो गायों की हत्या करने के लिये जा रहा था, का हाथ काट दिया था। यह उनकी एक और वीरता निर्भयता का अनुपम उदाहरण था।

सन् 1642 में रायरेश्वर मंदिर में कई नवयुवकों ने शिवाजी के साथ स्वराज्य की स्थापना करने का निर्णय लिया। सर्वप्रथम तोरण का दुर्ग जीता। उसके बाद उनका एक के बाद एक विजय अभियान चल निकला। 15 जनवरी 1656 को सम्पूर्ण जावली, रायरी सहित आधा दर्जन किलों पर कब्जा किया। सूपा, कल्याण, दाभोल, चोल बंदरगाह पर भी नियंत्रण कर लिया। 30 अप्रैल 1657 की रात्रि को जुन्नरनगर पर विजय प्राप्त की। शिवाजी की सफलताओं से घबरा कर तत्कालीन मुगल शासक ने शिवाजी को आश्वस्ति पत्र भेजा था। लेकिन शिवाजी यही नहीं रूके उनका अभियान तेज होता चला गया। बाद में अफजल खां शिवाजी को पकड़ने निकला लेकिन शिवाजी उससे कहीं अधिक चतुर निकले और अफजल खां मारा गया। इसके बाद शिवाजी के यश की कीर्ति पूरे भारत में ही नहीं अपितु यूरोप में भी सुनी गयी। विभिन्न पड़ावों, राजनीति और युद्ध से गुजरते हुए ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी के दिन शिवाजी का राज्याभिषेक किया गया। भारतीय इतिहास में पहली मजबूत नौसेना का निर्माण शिवाजी के कार्यकाल में माना गया है। शिवाजी की नौसेना में युद्धपोत भी थे तथा भारी संख्या में जहाज भी थे।

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शिवाजी भारत के पहले ऐसे शासक थे जिन्होंने स्वराज्य में सुराज की स्थापना की थी। प्रत्येक क्षेत्र में मौलिक क्रांति की। शिवाजी मानवता के सशक्त संरक्षक थे। वे सभी धर्मों का आदर और सम्मान करते थे। लेकिन हिंदुत्व पर आक्रमण कभी सहन नहीं किया। उनके राज्य में गद्दारी, किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचार, धन का अपव्यय आदि पर उनका कड़ा नियंत्रण था। शिवाजी में परिस्थितियों को समझने का चातुर्य था। शिवाजी ने अपने जीवनकाल में भारी यश प्राप्त किया था। इतिहास बताता है कि उन्होंने शून्य से सृष्टि का निर्माण किया। एक छोटी सी जागीर के बल पर बड़े राज्य का मार्ग प्रशस्त किया। शिवाजी ने उत्तर से दक्षिण तक अपनी विजय पताका फहराने में सफलता प्राप्त की थी।

शिवाजी केवल युद्ध में ही निपुण नहीं थे अपितु उन्होंने कुशल शासन तंत्र का भी निर्माण किया। राजस्व, खेती, उद्योग आदि की उत्तम व्यवस्था ईजाद की। शिवाजी के शासनकाल में किसी भी प्रकार का तुष्टीकरण नहीं होता था। शिवाजी को एक कुशल शासक और प्रबुद्ध सम्राट के रूप में जाना जाता है। उन्होंने कई बार शुक्राचार्य तथा कौटिल्य को आदर्श मानकर कूटनीति का सहारा लिया। उनकी आठ मंत्रियों की मंत्रिपरिषद थी जिन्हें अष्टप्रधान कहा जाता था। इसमें मंत्रियों के प्रधान को पेशवा कहा जाता था। वह एक समर्पित हिंदू थे तथा वह धार्मिक सहिष्णु भी थे। उन्होंने कई मस्जिदों के निर्माण में भी सहायता की थी और उनकी सेना में मुसलमान सैनिक भी थे। वह अच्छे सेनानायक के साथ अच्छे कूटनीतिक भी थे।

शिवाजी की दूरदृष्टि व्यापक थी। शिवाजी के शासनकाल में अपराधियों को दण्ड अवश्य मिलता था लेकिन साबित हो जाने पर। शिवाजी का राज्याभिषेक होने के बाद ही सच्चे अर्थों में स्वराज्य की स्थापना हुई थी। हिंदू समाज में गुलामी और निराशा के भाव के साथ जीने की भावना को शिवाजी ने ही समाप्त किया। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बहुत से लोगों ने शिवाजी के जीवन चरित्र से प्रेरणा लेकर भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना तन−मन−धन न्यौछावर कर दिया। 

शिवाजी का जीवन वीरतापूर्ण, अतिभव्य और आदर्श जीवन है। नयी पीढ़ी को शिवाजी की जीवनी अवश्य पढ़नी चाहिये। इससे उनके जीवन में एक नयी स्फूर्ति और उत्साह का वातावरण अवश्य पैदा होगा तथा निराशा का भाव छंटेगा।

-मृत्युंजय दीक्षित 







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