बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले

  •  प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क
  •  मार्च 24, 2019   12:41
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बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले
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मोदी सरकार में 75 वर्ष की आयु का एक अलिखित नियम बनाकर आडवाणी सहित कई उम्रदराज नेताओं को कोई मंत्री पद नहीं दिया गया। बाद में पार्टी ने उनको मार्गदर्शक मंडल में डाल दिया जिसे लेकर विपक्ष आज तक भाजपा पर तीखे तंज कसता है।

नयी दिल्ली। भारतीय राजनीति में पिछले करीब छह दशक से अपने प्रबुद्ध व्यक्तित्व, प्रखर बयानों, सूझबूझ भरे संगठन कौशल पर चढ़कर चुनावी सियासत की हवाएं पलट देने वाले और लंबे समय तक देश के एक प्रमुख राजनीतिक दल के पर्याय रहे लालकृष्ण आडवाणी हमेशा अपने दूरंदेशी फ़ैसलों के लिए पहचाने जाते रहे हैं। लेकिन जब अपने बारे में महत्वपूर्ण फ़ैसला करने के मौक़े आए तो क्या वह दीवार पर लिखी इबारत को भी पढ़ने से चूक गए? ऐसा केवल गुजरात के गाँधीनगर लोकसभा क्षेत्र से इस बार उन्हें टिकट न दिए जाने के मामले में ही नहीं हुआ है। इसके पहले चाहे 2005 में उनकी चर्चित पाकिस्तान यात्रा हो या फिर 2013-14 में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के चयन का मामला हो, उनके निर्णय उन्हें धोखा दे चुके हैं। आडवाणी के राजनीतिक जीवन पर यदि नजर डालें तो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के 2004 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद भारतीय राजनीति में यह लगभग तय हो गया था कि अब इस भगवा पार्टी की कमान आडवाणी ही संभालेंगे और यदि आगे कभी सरकार बनी तो उसकी अगुवाई भी वही करेंगे। किंतु राजनीति में जहां एक कदम आपको शिखर पर ले जाता है वहीं एक छोटे से रुख के कारण नेता अर्श से फर्श पर आ जाता है। 

आडवाणी के राजनीतिक जीवन की ढलान 2005 में पाकिस्तान यात्रा के दौरान शुरू हो गयी थी। इस यात्रा का एक छिपा मकसद आडवाणी की स्वीकार्यता के फलक को मजबूती देना था क्योंकि रथयात्राओं और रामजन्म भूमि आंदोलन के कारण उनकी छवि एक हिन्दूवादी नेता की बन चुकी थी। पाकिस्तान यात्रा के दौरान आडवाणी ने न केवल मोहम्मद अली जिन्ना की मजार पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी बल्कि उन्हें एक ‘‘धर्मनिरपेक्ष नेता’’ भी बताया। पाकिस्तान को लेकर आरएसएस और भाजपा के बिल्कुल अलग विचारों के कारण आडवाणी के इस बयान से राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया और इसी के चलते पाकिस्तान से लौटने के फौरन बाद आडवाणी ने भाजपा अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। तमाम राजनीतिक खींचतान के बावजूद भाजपा ने आडवाणी को अपना चेहरा बनाते हुए 2009 का चुनाव लड़ा। किंतु भाजपा सरकार बनाने में विफल रही और इसी के साथ आडवाणी की संभावनाओं का दायरा भी सिकुड़ गया। पार्टी में आडवाणी का सम्मान बरकरार रहने के बावजूद गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी उन्हें चुनौती दे सकने वाले नेता के रूप में धीमे धीमे उभरने लगे। भाजपा ने 2014 के आम चुनाव से पहले मोदी को पार्टी की अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया तो आडवाणी ने परोक्ष असहमति जतायी। फिर जब पार्टी ने मोदी को प्रधानमंत्री चुना तो आडवाणी ने चुप्पी साध ली। मोदी सरकार में 75 वर्ष की आयु का एक अलिखित नियम बनाकर आडवाणी सहित कई उम्रदराज नेताओं को कोई मंत्री पद नहीं दिया गया। बाद में पार्टी ने उनको मार्गदर्शक मंडल में डाल दिया जिसे लेकर विपक्ष आज तक भाजपा पर तीखे तंज कसता है। 

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आडवाणी ने प्रधानमंत्री पद के लिए उन्हें नहीं चुने जाने, सरकार में कोई पद नहीं मिलने और उन्हें मार्गदर्शक मंडल में डाले जाने को लेकर आज तक आरएसएस या भाजपा के विरूद्ध एक भी शब्द नहीं कहा। अब जबकि पार्टी ने आडवाणी की पारंपरिक गांधीनगर सीट से उन्हें टिकट न देकर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को उतारा है तो माना जा रहा है कि आडवाणी इस निर्णय पर भी मौन ही रहेंगे क्योंकि वह संघ और पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता हैं।  आडवाणी को भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी के बाद सबसे कद्दावर नेता माना जाता है। इसका कारण भी स्पष्ट है। 1984 के आम चुनाव में भाजपा महज दो सीटों पर सिमट गयी थी। उसके बाद इस पार्टी ने धीरे धीरे भारतीय राजनीति में जिस प्रकार अपने पैर मजबूती से जमाये और पहले विपक्ष की मजबूत आवाज के रूप में और फिर सत्ता में पहुंचने पर अपनी खास छाप छोड़ी, उसमें आडवाणी के व्यक्तित्व और उनकी रथयात्राओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। भारतीय राजनीति में आडवाणी को ‘‘प्रथम रथयात्री’’ का तमगा भी दिया जाता है। अविभाजित भारत में आठ नवंबर 1927 को कराची एक व्यावसायिक सिंधी परिवार में जन्मे आडवाणी की शुरूआती शिक्षा कराची, हैदराबाद (पाकिस्तान स्थित) में हुई। देश विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आ गया और आडवाणी ने बंबई विश्वविद्यालय के सरकारी लॉ कालेज से कानून की पढ़ाई की।  सार्वजनिक जीवन की शुरुआत आडवाणी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयंसेवी के रूप में कराची से ही कर दी थी। बाद में उन्होंने अलवर सहित राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में आरएसएस के कार्यकर्ता के रूप में काम किया। बाद में वह श्यामाप्रसाद मुखर्जी द्वारा शुरू की गयी पार्टी भारतीय जनसंघ से जुड़े और आगे जा कर इसके अध्यक्ष भी बने। इस दौरान उन्हें आरएसएस के विचारक पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के साथ काम करने का अवसर मिला। उपाध्याय की कार्यशैली और विचारों ने आडवाणी के मानस पर गहरी छाप छोड़ी। 

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आपातकाल दौरान उन्हें जेल में रखा गया। आपातकाल के बाद बनी मोरारजी देसाई सरकार में आडवाणी को सूचना प्रसारण मंत्री बनाया गया था। सूचना प्रसारण मंत्री के रूप में आडवाणी का एक वाक्य आपातकाल के दौरान अधिकांश भारतीय मीडिया की तस्वीर बयां करता है और आज भी इसे दोहराया जाता है...‘‘आपसे केवल झुकने को कहा गया था, आप तो रेंगने लगे।’’ भारतीय राजनीति में 1990 का दशक तेजी से बदलने वाले घटनाक्रमों के रूप में याद रखा जाता है। केन्द्र द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने की सिफारिशें करने वाली मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद कांग्रेस एवं भाजपा से इतर क्षेत्रीय दलों का महत्व एकाएक प्रबल हो गया। किंतु द्विदलीय राजनीति के समर्थक आडवाणी ने अपनी रथयात्रा निकाल कर न केवल राममंदिर आंदोलन को धार दी बल्कि भाजपा को भारतीय राजनीति में सबसे बड़ा विपक्षी दल बनाने की आधारशिला भी रख दी। छह दिसंबर 1992 में जब अयोध्या में विवादित ढांचा ध्वस्त किया गया तो आडवाणी भाजपा के प्रमुख नेताओं के साथ अयोध्या में मौजूद थे। इसे लेकर उन पर मुकदमा भी चलाया गया। आडवाणी ने भाजपा के अध्यक्ष, लोकसभा एवं राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष तथा वाजपेयी सरकार में गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री रहते हुए, एक कुशल प्रशासक एवं सक्रिय सांसद की भूमिका निभायी। उन्होंने लोकसभा सांसद के रूप में नयी दिल्ली और गांधीनगर लोकसभा सीटों का समय समय पर प्रतिनिधित्व किया। नयी दिल्ली लोकसभा सीट पर उन्होंने अपने समय के सुपर स्टार राजेश खन्ना को परास्त किया था। वाजपेयी के साथ आडवाणी की जोड़ी काफी लोकप्रिय रही है। आडवाणी ने कई बार सार्वजनिक मंचों पर यह स्वीकार किया है कि उन्हें भाषण देना वाजपेयी ने ही सिखाया। यही नहीं, वाजपेयी उस दौर में कई बार आडवाणी के साथ उनकी मोटरसाइकिल पर बैठकर पिक्चर देखने भी जाते थे। वाजपेयी की तरह आडवाणी का संबंध भी कुछ समय पत्रकारिता से रहा। उन्होंने ‘‘माई कंट्री माई लाइफ’’ शीर्षक से अपनी आत्मकथा लिखी है। उनके द्वारा लिखी गयी अन्य पुस्तकों में ‘‘अ प्रिजनर्स स्क्रेप बुक’’ एवं ‘‘एज आई सी इट’’ भी लिखी। 







देश की आजादी के लिए अपने प्राण देने से भी पीछे नहीं हटे थे क्रन्तिकारी खुदीराम बोस

  •  अमृता गोस्वामी
  •  दिसंबर 3, 2020   14:34
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देश की आजादी के लिए अपने प्राण देने से भी पीछे नहीं हटे थे क्रन्तिकारी खुदीराम बोस
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1905 में बंगाल विभाजन जिसे बंग-भंग के नाम से जाना जाता है के विरोध में चलाये गये आन्दोलन में भी खुदीराम बोस ने बढ़-चढ कर हिस्सा लिया और मात्र 16 वर्ष की उम्र में सत्येन बोस के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ अपने जीवन की क्रांतिकारी शुरूआत की।

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अपने प्राणों की आहुति देने वाले सैंकड़ों वीरों ने हमारी पावन धरती पर जन्म लिया, जिनमें से एक खुदीराम बोस भी थे जिन्होंने महज 19 वर्ष की आयु में भारत की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को भी गले लगा लिया था।

भारत के इस वीर सपूत खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को बंगाल के मिदनापुर जिले में हबीबपुर नामक गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम त्रैलोक्य नाथ बोस और माता का नाम लक्ष्मीप्रिय देवी था। बहुत छोटी उम्र में ही इनके पिता का स्वर्गवास हो गया जिसके कारण उनका लालन-पालन उनकी बड़ी बहन ने किया।

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देश-भक्ति की भावना खुदीराम बोस के मन में बचपन से ही बहुत प्रबल थी, स्कूल के दिनों में ही वे रिवोल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बन गए और अंग्रेजी हुकुमत के विरुद्ध देश की आजादी के आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे। 

1905 में बंगाल विभाजन जिसे बंग-भंग के नाम से जाना जाता है के विरोध में चलाये गये आन्दोलन में भी खुदीराम बोस ने बढ़-चढ कर हिस्सा लिया और मात्र 16 वर्ष की उम्र में सत्येन बोस के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ अपने जीवन की क्रांतिकारी शुरूआत की। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ खुदीराम बोस ने पुलिस स्टेशनों पर बम फेंके और भारत की आजादी के लिए वन्दे मातरम् के पैफलेट लोगो को बांटे। अंग्रेजी हुकूमत विरोधी अपनी गतिविधियों की वजह से वे अंग्रेजों की नजरों में आ चुके थे वहीं 28 फरवरी 1906 में मिदनापुर में एक आयोजन में जब वे सत्येंद्रनाथ द्वारा लिखी पत्रिका 'सोनार बांगला’ लोगो को बांट रहे थे तब पुलिस वालो ने उन्हें देख लिया और पकड़ने के लिए दौड़े तो खुदीरामबोस ने पुलिस वाले को मुक्का मारा और वहा से भाग गए जिसके लिए उन पर राजद्रोह का आरोप लगा और मुकदमा चलाया गया किन्तु कोई भी गवाही न मिलने के कारण उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया।

खुदीराम बोस ने तो मन में अंग्रेजों से भारत की आजादी का ठान ही रखा था, अब की बार उन्होंने 6 दिसंबर 1907 कोअंग्रेजी हुकूमत को हिलाने के उद्देश्स से नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन से गुजर रही बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया हालांकि गवर्नर उस हमले से बच निकला इसके बाद सन 1908 में खुदीराम ने दो अंग्रेजी अधिकारी वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर पर पर भी बम से हमला लिया लेकिन निशाना ठीक से न लगने के कारण वे दोनों भी बच गए।

कलकत्ता के मॅजिस्ट्रेट किंग्जफोर्ड का भारतीयों पर अत्याचार तब बहुत बढ़ गया था, किंग्जफोर्ड ने बंगाल विभाजन के विरोध में सडकों पर उतरे लाखों भारतीयों को बेरहमी से पीटा जिसे सहन करना क्रांतिकारियों के लिए नागवार था। विरोध में क्रांतिकारियों ने किंग्जफोर्ड से बदला लेने की ठानी और उसे मौत के घाट उतारने का प्रण किया। क्रांतिकारियों की इस योजना को अंजाम तक पहुचाने के लिए खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी का चयन किया गया। खुदीराम बोस को तो ऐसे मौके का ही इंतजार था। इस काम के लिए खुदीराम और प्रफुल्ल को बम और पिस्तौल दी गयीं और वे दोनों मुजफ्फरपुर आए।

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30 अप्रैल 1908 को रात के करीब 8.30 बजे खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी मुजफ्फरपुर क्लब के बाहर छुप कर किंग्सफोर्ड की बग्घी के आने का इंतजार करने लगे जहां से रोज किंग्सफोर्ड गुजरता था। अँधेरे में एक बग्घी आती देख दोनों ने मिलकर उस पर बम फेका गोलिया चलाईं और भाग निकले किन्तु दुर्भाग्य से उस बग्घी में क्रिग्सफोर्ड नहीं था बल्कि किसी दूसरे अंग्रेज की पत्नी और बेटी बैठी थीं जिनकी मौत हो गई। इस घटना से खुदीराम और प्रफुल्ल चाकी बहुत आहत हुए। इस हमले में किंग्सफोर्ड तो नहीं मरा वहीं अंग्रेज सिपाही खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी को तेजी से ढूंढने लगे। भागते-भागते जब खुदीराम बोस वैनी रेलवे स्टेशन पहुंचे तो वहां वे कुछ पुलिस वालो की नजरों में आ गए और गिरफ्तार कर लिए गए। वहीं प्रफुल्ल चाकी भी जो किसी तरह बचकर रेल में बैठ गए थे पुलिस द्वारा पहचान लिए गए, पुलिस प्रफुल्ल चाकी को पकड़ती उससे पहले ही प्रफुल्ल चाकी अंग्रेजो के हाथो आने से पहले खुद को गोली मारकर शहीद हो गये। 

21 मई 1908 को खुदीराम बोस पर ब्रिटिश सरकार ने मुकदमा चलाया और 13 जून 1908 को उन्हें मुजफ्फरपुर में हुए बम ब्लास्ट का दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुना दी गई। इस फांसी की सजा का खुदीराम बोस ने कोई विरोध नहीं किया और जब 11 अगस्त 1908 को खुदीराम बोस को फांसी के लिए लाया गया तब हाथ में गीता लिए भारत के इस साहसी वीर ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को गले लगा लिया। महज 19 साल की उम्र में भारत की आजादी के लिए प्राण न्योछावर करने वाले इस भारतीय वीर सपूत का नाम भारत के इतिहास में सदा अमर रहेगा।

- अमृता गोस्वामी







डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपना काम सदैव स्वतंत्र और निष्पक्ष भाव से किया

  •  प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क
  •  दिसंबर 3, 2020   13:30
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13 साल की उम्र में ही डॉ प्रसाद का विवाह राजवंशीदेवी से हो गया था। जिसके बाद उन्होंने अपने शैक्षिक जीवन को आगे बढ़ाया और बाद में वकालत करते हुए अपने कॅरियर की शुरूआत की। इसके साथ ही उन्होंने भारत को आजाद कराने की कसम खाईं और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा भी लिया।

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म तीन दिसंबर 1884 को बिहार के सीवान जिले के जीरादेई गांव में हुआ था। राजेंद्र प्रसाद जी के पिता का नाम महादेव सहाय और माता का नाम कमलेश्वरी देवी था। प्रसाद जी की प्रारंभिक शिक्षा बिहार के छपरा जिला स्कूल गए से हुई थीं। अपने शैक्षिक जीवन को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में प्रथम स्थान हासिल किया। इसके बाद कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लेकर कानून के क्षेत्र में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की। पढ़ाई-लिखाई  में डॉ प्रसाद इतने होनहार थे कि परीक्षक ने उनकी परीक्षा की कॉपी को जांचते हुए लिखा था कि- The Examinee is better than Examiner। डॉ प्रसाद बहुभाषी होने के साथ-साथ उनकी हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, बंगाली एवं फारसी भाषा में अच्छी पकड़ थी।

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वहीं, 13 साल की उम्र में ही डॉ प्रसाद का विवाह राजवंशीदेवी से हो गया था। जिसके बाद उन्होंने अपने शैक्षिक जीवन को आगे बढ़ाया और बाद में वकालत करते हुए अपने कॅरियर की शुरूआत की। इसके साथ ही उन्होंने भारत को आजाद कराने की कसम खाईं और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा भी लिया। सन् 1931 को राजेंद्र प्रसाद को ब्रिटिश प्रशासन ने 'नमक सत्याग्रह' और सन् 1942 में हुए 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान कारावास में डाल दिया था।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में प्रमुख भूमिका निभाई थी। इसके बाद वे स्वतंत्र भारत पहले राष्ट्रपति के रूप में चुने गये उनका कार्यकाल 26 जनवरी 1950 से लेकर 14 मई 1962 तक रहा। डॉ. प्रसाद ने कभी भी अपने संवैधानिक अधिकारों में प्रधानमंत्री या कांग्रेस को दखलअंदाजी का मौका नहीं दिया। उन्होंने अपना काम स्वतंत्र और निष्पक्ष भाव से किया। हिदूं अधिनियम पारित करते समय राजेंद्र प्रसाद जी ने काफी कड़ा रुख अपनाया था। साल 1962 में राष्ट्रपति पद से हट जाने के बाद राजेंद्र प्रसाद को भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाज़ा गया था।

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डॉ प्रसाद के जीवनकाल का एक दिलचस्प किस्सा ये भी रहा कि 25 जनवरी 1950 के दिन उनकी बहन भगवती देवी का निधन हुआ और अगले ही दिन देश का यानी आजाद भारत का संविधान लागू होने जा रहा था ऐसे में भला वो कैसे अपनी बहन के अंतिम संस्कार में शामिल हो पाते। इन परिस्थितियों को देखते हुए डॉ प्रसाद ने संविधान की स्थापना की रस्म पूरी होने के बाद ही दाह संस्कार में भाग लिया।







देश में प्रथम महिला मुख्यमंत्री का खिताब हासिल करने वाली स्वतंत्रता संग्राम सेनानी 'सुचेता कृपलानी'

  •  दीपक कुमार त्यागी
  •  दिसंबर 1, 2020   12:53
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देश में प्रथम महिला मुख्यमंत्री का खिताब हासिल करने वाली स्वतंत्रता संग्राम सेनानी 'सुचेता कृपलानी'
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सुचेता कृपलानी का जन्म 25 जून, 1908 को भारत के हरियाणा राज्य के अम्बाला शहर के एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था। सुचेता कृपलानी के पिता एस.एन. मजुमदार ब्रिटिश सरकार के अधीन एक डॉक्टर होने के बावजूद बेहद पक्के देशप्रेमी देशभक्त व्यक्ति थे

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भारत की आजादी के आंदोलन में अपना बचपन से ही अनमोल योगदान देने वाली स्वतंत्रता सेनानी सुचेता कृपलानी एक कुशल राजनीतिज्ञ भी थीं। उनको आजाद भारत में उत्तर प्रदेश की प्रथम महिला मुख्यमंत्री के साथ भारत की किसी भी राज्य की प्रथम महिला मुख्यमंत्री होने का गौरव प्राप्त हुआ था। आज 1 दिसंबर को पुण्यतिथि पर उनके संघर्षशील जीवन के बारे में कुछ जानने का प्रयास करते हैं। सुचेता कृपलानी का जन्म 25 जून, 1908 को भारत के हरियाणा राज्य के अम्बाला शहर के एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था। सुचेता कृपलानी के पिता एस.एन. मजुमदार ब्रिटिश सरकार के अधीन एक डॉक्टर होने के बावजूद बेहद पक्के देशप्रेमी देशभक्त व्यक्ति थे। बचपन से ही अंग्रेज शासकों की भारतीय जनता के प्रति क्रूरता पूर्ण रवैये के खिलाफ सुचेता मजुमदार के मन में जबरदस्त गुस्सा रहता था, उनके मन में देश सेवा का भाव और देश के लिए कुछ कर गुजरने का जुनूनी जज्बा हर वक्त रहता था। सुचेता की शिक्षा लाहौर और दिल्ली में हुई थी। वह दिल्ली के इन्द्रप्रस्थ कॉलेज और बाद में पंजाब विश्वविद्यालय से पढ़ीं। जिसके बाद वह बनारस हिन्दू विश्विद्यालय में इतिहास की प्राध्यापक बनीं थी।

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अपनी आत्मकथा ‘ऐन अनफिनिश्ड ऑटोबायोग्राफी‘ में उन्होंने बचपन के एक ऐसे ही किस्से का जिक्र किया है। सुचेता और उनकी बड़ी बहन सुलेखा एक ही स्कूल में पढ़ते थे। बहन सुलेखा उनसे करीब एक डेढ़ साल बड़ी थी। एक दिन उनको स्कूल की कुछ लड़कियों के साथ कुदसिया गार्डन ले जाया गया। उन दिनों प्रिंस वेल्स (महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के सबसे बड़े बेटे) दिल्ली आने वाले थे, तो उनके स्वागत के लिए कुछ लड़कियों की जरूरत थी। यह सबकुछ जलियांवाला बाग हत्याकांड के कुछ दिनों बाद हो रहा था। जिसकी वजह से देश में हर तरफ भयंकर गुस्से और अंग्रेजों के अत्याचार के चलते बेहद आक्रोश व लाचारी का माहौल था। ऐसे समय में सुचेता और उनकी बहन सुलेखा को जब कुदसिया गार्डन के पास प्रिंस के स्वागत में खड़ी लड़कियों की पंक्ति में खड़े हो जाने का निर्देश मिला, तो वो स्वाभिमान व गुस्से से लाल हो गईं लेकिन उनमें उस समय खुलकर विरोध करने की हिम्मत नहीं थी। लाचारी और गुस्से में दोनों बहन प्रिंस का स्वागत करने की जगह लाइन में पीछे छिपकर चुपचाप खड़ी हो गयी। उस समय अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज ना उठा पाने के अफसोस में सुचेता मजुमदार सालों बाद भी इस घटना को याद कर के शर्मिंदगी महसूस करती रहीं। वर्ष 1936 में उनका विवाह महात्मा गांधी जी के सहयोगी स्वतंत्रता सेनानी आचार्य जे. बी. कृपलानी से हुआ और वह सुचेता मजुमदार से कृपलानी बन गयी। उस समय की परिस्थितियों में सुचेता की शादी आसान नहीं थी, उनके खुद के घर वालों के साथ ही महात्मा गांधी भी सुचेता की शादी के विरोध में थे, जिसका कारण जे.बी. कृपलानी यानी जीवतराम भगवानदास कृपलानी का उनसे उम्र में 20 साल बड़े होना था। वहीं जे.बी. कृपलानी जहां एक सिंधी परिवार से ताल्लुक रखते थे, वहीं सुचेता मजुमदार एक बंगाली परिवार से ताल्लुक रखती थीं। हालांकि दोनों की उम्र और जन्म-स्थान में भले ही बहुत अंतर था लेकिन असल में दोनों एक जैसे ही बेहद जुझारू व जुनूनी थे और देश सेवा के लिए मर मिटने के लिए पूर्ण रूप से समर्पित थे। इसी वजह से दोनों ने विवाह के बंधन में बंधने का निर्णय लिया था।

सुचेता कृपलानी अरुणा आसफ अली और ऊषा मेहता के साथ देश की आजादी के आंदोलन में शामिल हुई। उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में अपना योगदान दिया, बंगाल के दंगाग्रस्त क्षेत्र नोआखली में महात्मा गांधी के साथ दंगा पीडित इलाकों में पीड़ित महिलाओं व अन्य लोगों की हर संभव मदद की, दंगों में महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की वजह से वह खुद की सुरक्षा के लिए साइनाइड का कैप्सूल हर समय अपने साथ लेकर चलती थी। वह एक ऐसी निड़र महिला थीं, जिसमें देशभक्ति व जुझारूपन कूट-कूट कर भरा था। जिसका उदाहरण उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान दिया। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब अंग्रेजी सरकार ने सारे पुरुष नेताओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था, उस समय सुचेता कृपलानी ने अपनी कुशाग्र बुद्धिमत्ता व जुझारूपन का परिचय देते हुए कहा था कि ‘बाकियों की तरह मैं भी जेल चली गई तो आंदोलन को आगे कौन बढ़ाएगा।’ इस दौरान उन्होंने भूमिगत होकर कांग्रेस का महिला विभाग बनाया और अंग्रेजी पुलिस से छुपते-छुपाते दो साल तक जोरशोर से आंदोलन भी चलाया। उन्होंने नौकरी छोड़कर देश को आजाद करवाने का वीणा उठा लिया था, उन्होंने इसके लिए एक ‘अंडरग्राउण्ड वालंटियर फोर्स’ बनाई और महिलाओं और लड़कियों को ड्रिल, लाठी चलाना, प्राथमिक चिकित्सा प्रदान करना और आत्मरक्षा के लिए हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी दी थी। इसके साथ-साथ उन्होंने राजनैतिक कैदियों के परिवार की सहायता करने की जिम्मेदारी का बेहद कुशलतापूर्वक निर्वहन किया था। आजादी के बाद जब देश में संविधान बनाने के लिए संविधान सभा की जब उपसमिति बनी तो उसमें शामिल होकर सुचेता देश की महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर रही थीं। संविधान बना इसमें महिलाओं के अधिकारों को लेकर सुचेता बेहद मुखर रही थीं। 14 अगस्त 1947 के जवाहरलाल नेहरू के ट्रिस्ट विद डेस्टिनी स्पीच से पहले इन्होंने वंदे मातरम का गायन किया था, सुचेता एक फेमस सिंगर भी थीं।

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वर्ष 1952 में आचार्य जे. बी. कृपलानी के जवाहरलाल नेहरू से संबंध खराब हो गये थे, तो उन्होंने अपनी अलग पार्टी 'कृषक मजदूर प्रजा पार्टी' बना ली थी और यह पार्टी आजाद भारत में जब पहले लोकसभा चुनाव हुए तो कांग्रेस के खिलाफ खड़ी हो गई थी। वर्ष 1952 के लोकसभा चुनाव में सुचेता कृपलानी इसी पार्टी से लड़ीं और नई दिल्ली से चुनाव जीत करके आईं। वर्ष 1957 में वह कांग्रेस से सुलह होने के चलते लगातार दूसरी बार नई दिल्ली से कांग्रेस की सांसद चुनी गईं थी और जवाहरलाल नेहरू ने इनको राज्यमंत्री बनाया। इसके बाद नेहरू ने इनको उत्तर प्रदेश में राजनीति करने के लिए भेज दिया और वह उत्तर प्रदेश विधानसभा की बस्ती जनपद की मेंढवाल विधानसभा से सदस्य चुनीं गयीं। सन 1963 में उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। करीब 3 साल 162 दिनों तक वह वर्ष 1967 तक मुख्यमंत्री पद पर बनी रहीं। उनके कार्यकाल के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा में जो मामला था, वो था कर्मचारियों की हड़ताल का। लगभग 62 दिनों तक चली इस हड़ताल का सुचेता कृपलानी ने बहुत ही बखूबी से सामना किया। सुचेता एक बेहद मंझे हुए नेता की तरह प्रशासनिक फैसले लेते समय दिल की नहीं बल्कि अपने दिमाग की सुनती थीं। उसी के बलबूते उन्होंने अंत में कर्मचारियों की मांगों को पूरा किए बिना हड़ताल को सफलतापूर्वक तुड़वा दिया था। वर्ष 1971 में सुचेता कृपलानी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था। 1 दिसंबर 1974 के दिन इस महान स्वतंत्रता सेनानी ने दुनिया को अलविदा कह दिया और आखिरी सांस ली। आज 1 दिसंबर को महान स्वतंत्रता सेनानी सुचेता कृपलानी को पुण्यतिथि पर हम सभी देशवासी कोटि-कोटि नमन करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

दीपक कुमार त्यागी

स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार