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विश्लेषण

कांग्रेस को तवज्जो ही नहीं दे रहीं सपा और बसपा, कैसे होगा महागठबंधन?

By अजय कुमार | Publish Date: Sep 13 2018 1:13PM

कांग्रेस को तवज्जो ही नहीं दे रहीं सपा और बसपा, कैसे होगा महागठबंधन?
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उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का भारत बंद पूरी तरफ से असफल रहा। कुछ एक जगह पर जबरदस्ती दुकानें बंद कराने का प्रयास किया जरूर गया, लेकिन इमसें बंद समर्थकों को कोई सफलता नहीं मिली। इसकी बड़ी वजह यह भी थी कि तमाम व्यापारिक संगठनों ने एक दिन पूर्व ही बयान जारी करके कह दिया था कि उनका बंद से कोई लेना−देना नहीं है। इसके अलावा बंद फ्लॉप होने के अन्य कारणों पर नजर डाली जाये तो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का इस बंद से दूरी बनाए रखना भी था। समाजवादी पार्टी ने भारत बंद के दिन अपने आप को प्रदर्शन तक सीमित रखा तो बसपा सुप्रीमो मायावती ने तो भारत बंद के खिलाफ ही बयान देकर चौंका दिया। जिसकी उम्मीद कांग्रेस सहित किसी को नहीं थी। वैसे बंद को लेकर पूरे देश में भी कमोवेश यही स्थिति रही। बंद को सफल बनाने के लिये कई राज्यों में कांग्रेस सहित कुछ छोटे−छोटे दल आगजनी और तोड़फोड़ करते भी नजर आये, लेकिन ऐसे उत्पाती लोगों की संख्या कहीं भी 40−50 से अधिक नहीं नजर आई।
 
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या भारत बंद गुजारे जमाने की बात होकर रह गई है या फिर जनता जानती−समझती है कि कब ऐसे बंद उनके हितों के लिये और कब राजनैतिक स्वार्थवश बुलाए जाते हैं। भारत बंद का उत्तर प्रदेश में जो हश्र हुआ, वह सभी राजनीतिक दलों के लिए सबक है। बंद नाकामयाब होने का यह मतलब नहीं है कि जनता के लिये पेट्रोल−डीजल के दामों में बढ़ोत्तरी कोई समस्या नहीं है, लेकिन वह ऐसे गंभीर मसलों पर राजनीति भी नहीं पसंद करती है। आम आदमी जब ऐसे बंद के पीछे की असली मंशा समझने लगता है तो वह इसमें शामिल होना पसंद नहीं करता। राजनैतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिये देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, बीमार और बुजुर्ग लोगों के लिए समस्याएं खड़ी कराना, हिंसा, आगजनी, नागरिकों के साथ अभद्रता की घटनाओं के बीच राजनीतिक दलों को ऐसे किसी बंद या आंदोलन में नागरिकों की भागीदारी या समर्थन की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए।
 
अफसोसजनक है कि भारत बंद की वजह से बिहार में एक बीमार बच्ची की अस्पताल न पहुंच पाने के परिणामस्वरूप मौत हो जाती है, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी या उनके प्रवक्ता खेद में एक शब्द भी नहीं बोलते हैं, जबकि भारत बंद के आयोजकों को पीड़ित परिवार से न सिर्फ मांफी मांगनी चाहिए बल्कि उनकी मदद भी करनी चाहिए।
 
कांग्रेस और उसके बंद समर्थक सहयोगी दलों को स्पष्ट करना चाहिए था कि क्या पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्य वृद्धि का विरोध बंद के अलावा किसी अन्य लोकतांत्रिक ढंग से नहीं किया जा सकता था। आज कांग्रेस पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत बढ़ने पर इनको जीएसटी के दायरे में लाने की मांग मोदी सरकार से कर रही है, लेकिन जब वह सत्ता में थी तो वह भी पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी में लाने को सहमत नहीं थी। इसके अलावा कांग्रेस को इस बात का भी जवाब देना होगा कि उसने भारत बंद के लिये 10 सितंबर का ही दिन क्यों चुना जिस दिन नेशनल हेराल्ड केस में अदालत में सुनवाई होनी थी। कहीं इसके पीछे की मंशा यह तो नहीं थी कि भारत बंद के शोर में अदालत की कार्रवाई अखबारों की सुर्खियां न बटोर पाये। अगर ऐसा था तो कांग्रेस इसमें काफी सफल रही। कांग्रेस को इस बात पर भी जवाब देना चाहिए कि जब उसके अध्यक्ष राहुल गांधी बार−बार कह रहे हैं कि मोदी सरकार से जनता ऊब चुकी है तो जनता उनमें (राहुल गांधी) विश्वास क्यों नहीं दिखा रही है।
 
बहरहाल, उत्तर प्रदेश में भारत बंद विफल रहने का सबक कांग्रेस के अलावा उन सभी दलों के लिए है जो समय−समय पर अपनी राजनीति चमकाने के लिए ऐसे हथकंडों का सहारा लेते हैं। लोकतंत्र में कोई भी आंदोलन जन−समर्थन के बिना सफल नहीं हो सकता। यदि आम आदमी आंदोलन के साथ नहीं तो ऐसे आंदोलन का क्या मतलब ? राजनीतिक दलों को चाहिए कि भविष्य में कोई भी आंदोलन करने से पहले यह विचार जरूर करें कि उनकी रणनीति जनता को पसंद आएगी या नहीं।
 
यहां समाजवादी पार्टी और बसपा की भी चर्चा जरूरी है, जिनके सहारे कांग्रेस उत्तर प्रदेश में बंद सफल होने की उम्मीद लगाये बैठी थी। पहले बाद समाजवादी पार्टी की कि जाये तो सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का शायद आंदोलनों में विश्वास ही नहीं है। वह आंदोलन के नाम पर लकीर पीटते ही दिखाई देते हैं। इस बात को उनके चाचा और समाजवादी सेक्युलर मोर्चा के अध्यक्ष शिवपाल यादव द्वारा गत दिनों दिये गये एक बयान से भी समझा जा सकता है, जब शिवपाल ने एक सामाजिक संगठन के कार्यक्रम में भतीजे अखिलेश पर तंज कसते हुए कहा, 'जब हाईस्कूल में था, तब से नेताजी के साथ काम करने लगा था। चुनाव में 90-90 किलोमीटर साइकिल चलाकर नेताजी का प्रचार करता था। आज लोग एक घंटा साइकिल चला देते हैं तो बताते हैं कि बड़ा काम कर दिया।' शिवपाल यहीं नहीं रूके और बोले, 'महाभारत धर्म युद्ध था। कंस ने धर्म का पालन नहीं किया। बहन, बहनोई और पिता को कैद में डाल दिया। आज भी बहुत से कंस पैदा हो जाते हैं। एक कंस आज भी है।' उनके अंदाजे बयां से यह समझना मुश्किल नहीं था कि उनका निशाना कहां था।
 
खैर, बसपा सुप्रीम मायावती ने भारत बंद के दूसरे दिन यानी 11 सितंबर को जो बयान दिया। उसने उत्तर प्रदेश की सियासत में नयी गर्मी पैदा करके लोगों को यह सोचने को भी मजबूर कर दिया कि क्या उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अलग−थलग पड़ रही है। महागठंबधन की बात अभी बेमानी है। मायावती का कहना था कि पेट्रोल−डीजल की आसमान छूती कीमतों के लिए कांग्रेस और भाजपा की सरकारें बराबर की कसूरवार हैं, दोनों की नीतियां एक जैसी हैं। कांग्रेस की संप्रग सरकार ने जून 2010 में पेट्रोल को सरकारी नियंत्रण से मुक्त किया था। मोदी सरकार ने सत्ता हासिल करने के कुछ माह बाद ही 18 अक्टूबर, 2014 को डीजल को भी सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया। इन गरीब व किसान विरोधी फैसलों को बड़े आर्थिक सुधार के रूप में दुनिया के सामने पेश किया गया, जिसका नतीजा सब के सामने है। बसपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ना केवल कांग्रेस की गलत आर्थिक नीतियों को लागू करती रही, वरन इनसे आगे बढ़ नोटबंदी और जीएसटी को अपरिपक्व ढंग से देश पर थोपा दिया। इसी कारण सवा करोड़ देशवासियों का जीवन नारकीय होता जा रहा है। मायावती ने चेताया कि जिस तरह से जनता ने वर्ष 2014 में कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया था उसी तरह भाजपा को भी 2019 में सजा देगी।
 
उधर, नोटबंदी तथा जीएसटी और मोदी−योगी सरकार पर बसपा अध्यक्ष मायावती की टिप्पणी पर भाजपा उत्तर प्रदेश अध्यक्ष डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय ने कहा कि नोटबंदी लागू होने के बाद उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में जनता ने इसका विरोध करने की सजा बसपा को 19 सीट पर समेट कर दी थी। वहीं, कांग्रेस के साथ मिलकर कुशासन और भ्रष्टाचार का भागीदारी करने की सजा बसपा को 2014 में शून्य पर पहुंचने के जरिये मिली थी। डॉ. पांडेय ने कहा कि किसानों के लेकर बहन जी के बहाये जा रहे घड़ियाली आंसू की हकीकत जनता को पता है। भट्टा पारसौल में निर्दोष किसानों पर उन्होंने ही अपने शासन में गोलियां चलवाई थीं।
 
लब्बोलुआब यह है कि बीजेपी विरोधी दलों के बीच अभी भी एकजुटता का अभाव नजर आ रहा है। इसके पीछे के कारण छिपे हुए भी नहीं हैं, जबकि सपा के बागी नेता शिवपाल यादव ने समाजवादी सेक्युलर मोर्चे का गठन करके बीजेपी विरोधियों की गोलबंदी में एक नया एंगल जोड़ दिया है। इससे समाजवादी पार्टी प्रभावित होने से बच नहीं पायेगी। इस बात का अहसास मायावती को भी है। इसी के बल पर वह सपा से चुनावी गठबंधन होने की दशा में अपने हिसाब से सीटों के लिये मोलभाव कर सकती हैं। कांग्रेस से बसपा की दूरी बनाकर चलना भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है। वह सीटों में ज्यादा बंदरबांट नहीं चाहती है।
 
-अजय कुमार

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