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विश्लेषण

स्वदेशी के पक्षधर रहे भाजपाई भी विदेशी कंपनियों को भारत ला रहे

By राकेश सैन | Publish Date: May 15 2018 8:12AM

स्वदेशी के पक्षधर रहे भाजपाई भी विदेशी कंपनियों को भारत ला रहे
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ब्रिटिश इंडिया कंपनी जब भारत आई तो हम इसको पहचान नहीं पाए। सर्कस के जोकरों की तरह यह अपने शरीर पर पहना एक कपड़ा उतारती तो नीचे से बदलते स्वरूप वाली दूसरी वर्दी निकलती। पहले-पहले इसके लोग व्यापारी लगे परंतु जिस तरीके से इन्होंने देसी राजाओं से संधियां कीं इससे ये राजनयिक लगने लगे और प्लासी की लड़ाई के बाद हम इन्हें सैनिक मानने लगे परंतु 1850 आते-आते कंपनी शासक के असली रूप में सामने आई। इतिहास अपने को दोहरा रहा लगता है। अमेरिका की सबसे बड़ी कारपोरेशन वालमार्ट इंक ने घरेलू ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट का अधिग्रहण किया है। कंपनी अगले चार-पांच वर्ष में 50 नये स्टोर खोलेगी।

ई-कॉमर्स क्षेत्र में हुए इस सबसे बड़े अधिग्रहण के तहत वालमार्ट ने फ्लिपकार्ट समूह की 77 प्रतिशत हिस्सेदारी 16 अरब डॉलर में खरीदी है। फ्लिपकार्ट समूह में फ्लिपकार्ट के अलावा जाबोंग, मिंत्रा, वी-रीड, लेट्सबाय, एफएक्स मार्ट और फोनपे जैसी अन्य कंपनियां भी शामिल हैं। वालमार्ट वर्तमान में राज्यों के 19 शहरों में कारोबार कर रही है। कंपनी की योजना के अनुसार पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। कहने को यह किसी स्वदेशी कंपनी का अधिग्रहण है परंतु इसका उद्देश्य वालमार्ट द्वारा देश के खुदरा व्यापार में प्रवेश पाना है जिसकी कि वर्तमान में अनुमति नहीं है। वालमार्ट के सीईओ डग मैकमिलन ने इसे छुपाया भी नहीं और कहा कि फ्लिपकार्ट एक अलग कंपनी के रूप में परिचालन जारी रखेगी। इसका निदेशक मंडल भी अलग होगा। उन्होंने कहा कि फ्लिपकार्ट से वालमार्ट को आनलाइन बाजार में दखल मिलेगी। घरेलू खुदरा नीति के कारण वालमार्ट यहां उपभोक्ताओं को सीधे सामान नहीं बेच सकती है। नीति के तहत विदेशी कंपनियां (थोक कैश एंड कैरी श्रेणी को छोड़कर) ग्राहकों को सीधे सामान नहीं बेच सकती हैं। हालांकि ई-कॉमर्स क्षेत्र में विदेशी कंपनियों को कारोबार की अनुमति है क्योंकि इस क्षेत्र में सौ प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश स्वीकृत है। यानि इस अधिग्रहण से किसी विदेशी कंपनी को देश के खुदरा व्यापार में प्रवेश करने का मौका मिल गया है जो अत्यंत खतरनाक है।
 
भारत में आनलाइन खुदरा व्यापार एक दशक के भीतर 200 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है और यही कारण है कि वालमार्ट ने अपेक्षा से अधिक धन निवेश कर फ्लिपकार्ट को खरीदने का जोखिम उठाया है। भारतीय बाजार में उसका मुकाबला एक अन्य प्रमुख कंपनी अमेजन से होगा। वालमार्ट के खुदरा व्यापार में प्रवेश करने से देश के 4.5 करोड़ छोटे व मध्यम उद्योगों और इससे जुड़े 10 करोड़ लोगों के भविष्य पर अंधकार छा जाएगा। देश का निर्यात भी काफी सीमा तक इन्हीं उद्योगों पर निर्भर करता है। चीन के साथ व्यापारिक असंतुलन के कारण पहले ही भारतीय बाजार चीनी सामान से अटे पड़े हैं और इसने हमारे छोटे-मध्यम व मझौले उद्योगों की कमर तोड़ कर रख दी है और अब वालमार्ट के आने से चीनी सामान के लिए दूसरे और मार्ग भी खुल जाएंगे। वालमार्ट के आरंभ में यह कंपनी अमेरिकी सामान बेचती रही है परंतु वर्तमान में सस्ता होने के कारण वालमार्ट 70-80 प्रतिशत सामान चीन से ही मंगवाता है। चीन में श्रम कानून मजबूत न होने व लोकतंत्र के अभाव में श्रमिकों को बहुत कम परिश्रम दिया जाता है और उसके सामान की गुणवत्ता भी निम्न स्तर की होती है। इसी कारण चीन का बना सामान दूसरे देशों के मुकाबले अत्यधिक सस्ता पड़ता है। वालमार्ट के माध्यम से चीनी सामान का एक और बड़ा खरीद केंद्र शुरू हो जाएगा जो हमारे उद्योगों के लिए प्राणघातक साबित हो सकता है। नीति विश्लेषक मोहन गुरुस्वामी ने पूरे सौदे की व्याख्या करते हुए कहा है कि फ्लिपकार्ट के अधिग्रहण से मुनाफा वालमार्ट कमाएगा और सामान चीन का बिकेगा और भारत के हिस्से केवल और केवल नुकसान आएगा।
 
वालमार्ट के सीईओ डग मैकमिलन ने संभावना जताई है कि कंपनी के खुदरा व्यापार में आने से एक करोड़ रोजगार के अवसर पैदा होंगे परंतु उन्होंने इसकी समय सीमा तय नहीं की है। दावों के विपरीत खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश का इतिहास भी साक्षी है कि इससे रोजगार के अवसर कम पैदा होते हैं और बेरोजगारी अधिक फैलती है। हो सकता है कि कंपनी कुछ सौ या हजार लोगों को नौकरियां दे परंतु इसकी पूरी आशंका है कि इससे स्वरोजगार, स्वदेशी उद्योगों के बहुत से केंद्रों पर तालाबंदी हो सकती है। देश में कड़े श्रम कानूनों, महंगी व्यापारिक आधारभूत सुविधाओं व जटिल और भारी टैक्स नीति के चलते स्वदेशी उद्योग सस्ते चीनी सामान का मुकाबला नहीं कर पाएंगे।
 
खुदरा कंपनियों की थोक खरीद नीति से किसानों के हित भी बुरी तरह से प्रभावित होते हैं। आक्सफैम की रिपोर्ट बताती है कि कुछ समय पहले तक 30 अरब डॉलर के वैश्विक कॉफी बाजार में किसानों को 10 अरब डॉलर की कमाई होती थी। आज यह बाजार बढ़ कर 60 अरब डॉलर हो गया है और किसानों की कमाई घट कर केवल 6 अरब डॉलर रह गई अर्थात किसानों का लाभांश 33.3 प्रतिशत से कम हो कर मात्र 10 प्रतिशत रह गया। इसका लाभ अंतत: कंपनी को मिलता है जैसे कि घाना में किसानों को मिल्क चाकलेट की कमाई का केवल 3.9 प्रतिशत हिस्सा मिलता है जबकि कंपनी का लाभांश 34.1 तक बढ़ गया। विगत यूपीए सरकार व वर्तमान में एनडीए सरकार ने भी खुदरा बाजार में विदेशी पूंजी निवेश को मंजूरी देने का प्रयास किया था परंतु स्थानीय विरोध के चलते ऐसा संभव नहीं हो पाया। हालांकि ई-कामर्स में विदेशी निवेश को स्वीकृति दे दी गई। अब फ्लिपकार्ट के अधिग्रहण के चलते वालमार्ट को पिछले दरवाजे से खुदरा बाजार में प्रवेश का अवसर मिल गया है जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण है।
 
-राकेश सैन

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