नेताओं की उठापटक से कांग्रेस का आम कार्यकर्ता सबसे ज्यादा परेशान है

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ANI
कांग्रेस से विचारधारा व दिल से जुड़ा हुआ आम कार्यकर्ता दुविधा में है कि आखिरकार पार्टी में यह किस तरह का माहौल चल रहा है और भविष्य में ऐसा माहौल कब तक चलता रहेगा। लेकिन अफसोस की बात यह है कि कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता अपने ठाठबाट में ही मस्त हैं।

कांग्रेस पार्टी के सितारे पिछले कुछ वर्षों से लगातार गर्दिश में चल रहे हैं, पहले तो वह केंद्र की सत्ता से बाहर हुई फिर एक-एक करके उससे राज्यों की सत्ता भी छिनती चली गई। वहीं रही-सही कसर उन राजनेताओं ने पूरी कर दी जो कांग्रेस पार्टी में कभी सत्ता का प्रमुख केन्द्र व नीति निर्माता होते थे, वह राजनेता भी पिछले कुछ वर्षों से एक-एक करके ना जाने क्यों कांग्रेस पार्टी को छोड़ते जा रहे हैं। कांग्रेस पार्टी के हालात को देखकर अब तो देश के आम जनमानस को भी यह लगने लगा है कि कांग्रेस मुक्त भारत का जो सपना कभी भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने देखा था, उसको कांग्रेस पार्टी के अंदर के कुछ नेता व पार्टी छोड़कर बाहर जाने वाले नेता ही पूरा करने पर तुले हुए हैं। 

आज कांग्रेस पार्टी अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है, पार्टी के पास लंबे समय से अपना पूर्ण कालिक अध्यक्ष तक नहीं है, कांग्रेस के दिग्गज नेता पार्टी छोड़कर भाग रहे हैं, वहीं कांग्रेस पार्टी से दशकों से विचारधारा व दिल से जुड़ा हुआ आम कार्यकर्ता दुविधा में है कि आखिरकार पार्टी में यह किस तरह का माहौल चल रहा है और भविष्य में ऐसा माहौल कब तक चलता रहेगा। लेकिन अफसोस की बात यह है कि कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता अपने ठाठबाट में ही मस्त हैं, उन्हें ना तो वास्तव में कांग्रेस पार्टी की कोई चिंता है और ना ही पार्टी के आम कार्यकर्ताओं की भावनाओं की कोई चिंता है, कांग्रेस की बेहद चिंताजनक स्थिति होने के बाद भी पार्टी के दिग्गज राजनेता आरोप लगाने में तो मस्त हैं, लेकिन ना जाने क्यों कांग्रेस पार्टी के हित में कभी भी यह चंद ताकतवर राजनेता अपने गिरेबान में झांक कर आत्ममंथन करने के लिए तैयार नहीं हैं।

कांग्रेस पार्टी के दिग्गज राजनेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री गुलाब नबी आजाद ने भी 26 अगस्त शुक्रवार के दिन पांच पन्नों का लंबा पत्र सोनिया गांधी को लिखकर के कांग्रेस पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देते हुए, कांग्रेस में अपनी बेहद लंबी चली पारी को विराम दे दिया। हालांकि अब उन पर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने दशकों तक कांग्रेस राज का आनंद लेकर आज जरूरत के समय कांग्रेस पार्टी का साथ छोड़ दिया, जो सैद्धांतिक रूप से ठीक नहीं है। हालांकि यह भी कटु सत्य है कि कांग्रेस पार्टी में गुलाम नबी आज़ाद बहुत लंबे समय तक एक नीति निर्माता व रणनीतिकार की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका में कार्य करते रहे थे, राहुल गांधी के दौर में वह इस सिस्टम से बाहर हुए तो शायद उनको भी छटपटाहट हुई और बहुत बुरा लगा, जिसके चलते ही उन्होंने कांग्रेस पार्टी के अन्य शीर्ष राजनेताओं के साथ सोनिया गांधी को पार्टी में अंदरूनी लोकतंत्र स्थापित करने के लिए व पार्टी की कमजोरियों पर ध्यान आकर्षित करने के लिए एक लंबी चौड़ी चिट्ठी लिख डाली थी। चिट्ठी लिखने वाले इस समूह को बाद में जी-23 नाम दिया गया था। इस ग्रुप पर कांग्रेस पार्टी के राहुल गांधी के नजदीकी विभिन्न बड़े राजनेताओं से लेकर के आम कार्यकर्ताओं तक ने भी बहुत गंभीर आरोप लगाये थे, जिसके चलते अन्य राजनेताओं के साथ-साथ गुलाम नबी आज़ाद भी बेहद आहत हुए थे।

पिछले कुछ वर्षों से गुलाम नबी आज़ाद ने भी खुलेआम बागी तेवर अपना कर कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व के लिए बहुत बड़ी मुश्किल खड़ी कर रखी थी। हाल में उनको जम्मू-कश्मीर में संगठनात्मक दायित्व दिया गया था, जिसको उन्होंने लेने से इंकार कर दिया था। तब से ही देश के विभिन्न राजनीतिक गलियारों में यह कयास लगाए जाने शुरू हो गये थे कि अब कांग्रेस पार्टी में गुलाम नबी आज़ाद चंद दिनों के मेहमान हैं। इन अटकलों पर उन्होंने 26 अगस्त शुक्रवार को पांच पन्नों के अपने इस्तीफे पत्र के साथ ही मुहर लगा दी। कांग्रेस पार्टी में गुलाम नबी आजाद ने वर्ष 1973 से जो सफ़र शुरू किया था, उसमें उन्होंने सफलता के विभिन्न मुकामों को हासिल करने का कार्य किया, अब गुलाम नबी आज़ाद का कांग्रेस पार्टी के साथ का यह लंबा सफ़र 26 अगस्त 2022 को समाप्त हो गया है। जिसके बाद से मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्मों पर कांग्रेस के छोटे-बड़े राजनेताओं के द्वारा भी गुलाम नबी आज़ाद के खिलाफ जमकर अपनी भड़ास निकाली जा रही है, आज़ाद पर तथ्यहीन आरोपों की एक बहुत लंबी लिस्ट अब जबरन थोपी जा रही है। आम जनमानस के लिए विचारणीय तथ्य यह है कि अगर वास्तव में आज़ाद ऐसे व्यक्ति थे, तो कांग्रेस पार्टी ने उन्हें दशकों तक महत्वपूर्ण पदों पर आसीन क्यों रखा।

लेकिन आज कांग्रेस पार्टी को देश व जन हित में स्वयं की खामी ढूंढ़ने के लिए तत्काल आत्ममंथन करने की आवश्यकता है, जिसके लिए कोई भी तैयार नहीं है। ना ही कोई भी कांग्रेस का नेता यह आत्ममंथन करने के लिए तैयार है कि कहीं गुलाम नबी आज़ाद ने यह कदम पार्टी की जनता के बीच तेजी से गिरती साख को देखकर तो नहीं लिया है, क्योंकि शायद गुलाम नबी आज़ाद कांग्रेस पार्टी की दिन प्रतिदिन जनता के बीच हो रही खस्ताहाल के चुपचाप गवाह नहीं बनना चाहते थे, इसलिए उन्होंने कांग्रेस पार्टी को छोड़ना उचित समझा।

गुलाम नबी आज़ाद के इस निर्णय पर ताली पीट पीटकर खुशियां मना रहे कुछ नादान कांग्रेसियों को यह समझना होगा कि गुलाम नबी आज़ाद का पार्टी छोड़ना कांग्रेस पार्टी के लिए एक बहुत बड़ा झटका है, वह एक ऐसे राजनेता हैं जिन्होंने देश के चार प्रधानमंत्रियों- इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पी.वी. नरसिंह राव व मनमोहन सिंह के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सफलतापूर्वक कार्य किया था। सबसे अहम बात यह है कि गुलाम नबी आज़ाद को सरकार या संगठनात्मक स्तर जो भी जिम्मेदारी दी जाती थी, वह उसको पूरी मेहनत से निभाने का कार्य करते थे। आज कांग्रेस पार्टी के कर्ताधर्ताओं को पार्टी के बेहद खस्ताहाल पर आत्ममंथन करना चाहिए, उन्हें समझना चाहिए कि देश के सर्वांगीण विकास के लिए मजबूत सत्ता पक्ष व मजबूत विपक्ष दोनों की ही जरूरत होती है, इसलिए जल्द ही राहुल गांधी को एक बार फिर कांग्रेस पार्टी की कमान संभाल लेनी चाहिए और कांग्रेस पार्टी को पुनः अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए दिन रात एक करके मेहनत करनी चाहिए, तब ही भविष्य में कांग्रेस पार्टी गुलाम नबी आज़ाद जैसे नेताओं के कांग्रेस छोड़ने के झटकों से उबर सकती है।

-दीपक कुमार त्यागी

(वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक)

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