मुस्लिम देशों के बीच इस्लामिक जगत की सत्ता हासिल करने की होड़

मुस्लिम देशों के बीच इस्लामिक जगत की सत्ता हासिल करने की होड़

इजराइल का विरोध करने के साथ ही इन देशों में इस्लामिक जगत का नेतृत्व करने की होड़ शुरू हो गयी है। इसीलिए यह देखना ज़रूरी है कि इन देशों के दावों में कितना दम है। तुर्की और ईरान ये दोनों देश सऊदी अरब और यूएई के विरोधी माने जाते हैं।

हाल ही में इजराइल और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच शान्ति समझौता हुआ। भारत सहित कई देशों ने इस समझौते का स्वागत किया और यह उम्मीद जताई की इससे मध्य पूर्व में शान्ति प्रस्थापित होने में मदद होगी। यूएई के बाद सऊदी अरब, ओमान और बहरीन के भी इजराइल से अपने रिश्ते सामान्य करने की संभावना है। लेकिन साथ ही कुछ इस्लामिक देशों ने इसका विरोध भी किया। इन देशों में तुर्की, ईरान और पाकिस्तान प्रमुख हैं।

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इजराइल का विरोध करने के साथ ही इन देशों में इस्लामिक जगत का नेतृत्व करने की होड़ शुरू हो गयी है। इसीलिए यह देखना ज़रूरी है कि इन देशों के दावों में कितना दम है। तुर्की और ईरान ये दोनों देश सऊदी अरब और यूएई के विरोधी माने जाते हैं। तुर्की एक तरफ़ इस्लाम के नाम पर मध्य पूर्व से लेकर उत्तर अफ्रीका तक अपना सामरिक प्रभाव बढ़ाने में लगा हुआ है तो वहीं शिया ईरान मुख्या रूप से सुन्नी देशों पर वर्चस्व बनाने की कोशिश कर रहा है। अरब-इजराइल समझौते का विरोध दोनों ने एक साथ किया है। लेकिन इस्लामिक देशों के नेतृत्व के विषय में दोनों में संघर्ष होने के आसार ज़्यादा हैं। सीरिया और लीबिया में चल रहे गृह युद्ध में तुर्की की भूमिका विवादास्पद रही है। सीरिया में तो ईरान और तुर्की एक दूसरे के सामने खड़े हैं। तुर्की मध्य पूर्व में विस्तारवाद की कोशिश कर रहा है जिसकी वजह से कई देशों से उसके विवाद चल रहें हैं। मध्य पूर्व के साथ अब तुर्की पूर्व भूमध्य सागर में भी ग्रीस के साथ टकराव की स्थिति में है। कुल मिलाकर सामरिक तौर पर ईरान का प्रभाव क्षेत्र एक हद तक सीमित है तो वहीं तुर्की एक साथ कई मोर्चों पर टकराव की वजह से मुश्क़िल में फंसता जा रहा है।

अगर पाकिस्तान की बात करें तो पिछले कुछ समय से अरब देशों से उसके रिश्ते अच्छे नहीं चल रहें हैं। सऊदी अरब और यूएई का भारत की ओर झुकाव बढ़ने से उन देशों की पाकिस्तान से दूरियां बढ़ीं हैं। पाकिस्तान ने अरब देशों को चुनौती देने की कोशिश पहली बार दिसंबर 2019 में की। उस वक़्त मलेशिया ने कुआला लुम्पुर में इस्लामिक देशों के शिखर सम्मेलन का आयोजन किया था। इस सम्मेलन को इस्लामी सहयोग संगठन को चुनौती के तौर पर देखा जा रहा था। अरब देशों से नाराज़ चल रहे पाकिस्तान ने इस सम्मेलन को समर्थन दिया था। लेकिन सऊदी अरब की नाराज़गी का असर पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक मदद पर पड़ सकता था इसीलिए पाकिस्तान ने आख़िरी वक़्त पर इस सम्मेलन से दूरी बना ली।

हाल ही में सऊदी अरब ने पाकिस्तान से एक अरब डॉलर का क़र्ज़ लौटाने की मांग की। इस मांग को पूरा करने के लिए पाकिस्तान को चीन से क़र्ज़ लेना पड़ा था। पाकिस्तान ने जब सऊदी अरब से फिर से कश्मीर मामले पर इस्लामी सहयोग संगठन की बैठक बुलाने की मांग की तो वह भी सऊदी अरब ने नामंज़ूर कर दी। अरब देश और इजराइल में समझौते का यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि अब अरब देशों ने इस्लामिक जगत का नेतृत्व छोड़ दिया है। तुर्की, ईरान और पाकिस्तान को इस वास्तविकता को स्वीकार करना होगा कि सिर्फ धर्म के नाम पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपने हितों की रक्षा करना हर वक़्त संभव नहीं है। अरब देशों ने अब इन परिस्थितियों को स्वीकार करना शुरू किया है। इजराइल से समझौता करने से अरब और इजराइल क्षेत्रीय स्तर पर और भी मज़बूत होंगे। वर्तमान परिस्थितियों में सिर्फ तेल के व्यापार से अर्थव्यवस्था मज़बूत नहीं हो सकती। इसीलिए अरब देश अपनी विदेश नीति को इस्लाम से अलग करने की कोशिश कर रहे हैं। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में अरब देशों से भारत के रिश्ते भी काफ़ी मज़बूत हुए हैं। कश्मीर मामले पर सऊदी अरब और यूएई ने भारत का साथ दिया न कि पाकिस्तान का।

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इस्लामिक जगत की सत्ता पाने की चाह रखने वाले देशों के सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं। एक तो अंदरूनी हालत और झूझती हुयी अर्थव्यवस्था। दूसरी चुनौती है इस्लामिक विश्व का बंटा होना। ऐसे में तुर्की, ईरान और पाकिस्तान का अपना-अपना प्रभाव क्षेत्र काफी सीमित हो जाता है। दूसरी ओर फ़िलहाल इजराइल से समझौता करने से और अमेरिका का साथ होने की वजह से अरब देशों की ताक़त तुर्की, ईरान और पाकिस्तान के मुक़ाबले ज़्यादा है। ऐसे में इन तीनों देशों की इस्लामिक जगत का नेतृत्व करने की इच्छा पूरी होती दिखाई नहीं दे रही।

-निरंजन मार्जनी